सुकरात की पत्नी जेंथीप बहुत झगड़ालू थी। एक दिन सुकरात अपने शिष्यों के साथ किसी विषय पर चर्चा कर रहे थे। वे घर के बाहर धूप में बैठे हुए थे। भीतर से जेंथीप ने उन्हें कुछ कहने के लिए आवाज लगाई। सुकरात ज्ञानचर्चा में इतने खोये हुए थे कि जेंथीप के बुलाने पर उनका ध्यान नहीं गया।
दो-तीन बार आवाज लगाने पर भी जब सुकरात घर में नहीं आए तो जेंथीप भीतर से एक घड़ा भर पानी लाई और सुकरात पर उड़ेल दिया। यह देख सभी स्तब्ध रह गए, लेकिन सुकरात पानी से तरबतर मुस्कुरा रहे थे। वे बोले- "मेरी पत्नी मुझसे इतना प्रेम करती है कि उसने इतनी गर्मी से मुझे राहत देने के लिए मुझ पर पानी डाल दिया है।" सुकरात का एक शिष्य इस पशोपेश में था कि उसे विवाह करना चाहिए या नहीं। वह सुकरात से इस विषय पर सलाह लेने के लिए आया। सुकरात ने उससे कहा कि उसे विवाह कर लेना चाहिए।
शिष्य यह सुनकर हैरान था। वह बोला- "आपकी पत्नी तो इतनी झगड़ालू है कि उसने आपका जीना दूभर कर रखा है, फिर भी आप मुझे विवाह कर लेने की सलाह दे रहे हैं?" सुकरात ने कहा-"यदि विवाह के बाद तुम्हें बहुत अच्छी पत्नी मिलती है तो तुम्हारा जीवन संवर जाएगा, क्योंकि वह तुम्हारे जीवन में खुशियां लाएगी। तुम खुश रहोगे तो जीवन में उन्नति करोगे और रचनाशील बनोगे। यदि तुम्हें जेंथीप की तरह पत्नी मिली तो तुम भी मेरी तरह कम से कम दार्शनिक तो बन ही जाओगे! किसी भी परिस्थिति में विवाह करना तुम्हारे लिए घाटे का सौदा नहीं होगा।
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