श्रद्धा से शून्य जीवन शुष्क है। उसमें न कोई माधुर्य होता है और न ही सौंदर्य। वह एक ऎसी लोहे की मशीन की तरह है, जिसके पुर्जों में वर्षों से तेल नहीं डाला गया हो। श्रद्धावान व्यक्ति ही अपने जीवन के लक्ष्य परम आनंद की प्राप्ति कर सकता है। जीवन में माधुर्य और सौंदर्य श्रद्धा की भावना से उत्पन्न होता है। शारीरिक साधना, मानसिक साधना और आत्मिक साधना के मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति के अंदर सात्विक श्रद्धा जाग उठती है।
इसके जागने के बाद सबसे पहले उसे अपने ही ऊपर श्रद्धा होने लगती है। तब वह आत्मविश्वासी बनकर अपने प्यारे प्रभु की खोज में जुट जाता है। आत्मविश्वास और ईश्वर विश्वास ही श्रद्धा है। यह श्रद्धा साधक में एक दिव्य शक्ति, दिव्य सहनशीलता, दिव्य साहस तथा उल्लास की सृष्टि रच देती है। अश्रद्धा सबसे बड़ा पाप है और श्रद्धा मनुष्य को पाप से छुटकारा दिलाती है। यदि श्रद्धा अटूट हो और एकरस बनी रहे, तो भव सागर पार करने में कोई संदेह नहीं रहता। श्रद्धा देवी धर्म की पुत्री है। यह विश्व को पवित्र और अभ्युदय शील बनाती है। यह सावित्री के समान पावन, जगत को उत्पन्न करने वाली तथा मनुष्य का संसार सागर से उद्धार करने वाली है। श्रद्धा का अर्थ यह नहीं कि आप किसी भी झूठी बात पर श्रद्धा कर बैठे। श्रद्धा का वास्तविक अर्थ है सत्य और यथार्थ पर श्रद्धा करना।
सत्य का धारण श्रद्धा से होता है और तभी मनुष्य के मन में साहस और ह्वदय में प्रसन्नता की लहर दौड़ जाती है। श्रद्धा का वास्तविक अर्थ है सत्य को धारण करना। इससे पता चलता है कि हमें किसी भी बात पर विश्वास करने से पूर्व उसकी सत्यता के बारे में पूरी जांच कर लेनी चाहिए। सत्य में पूर्ण विश्वास और अटूट श्रद्धा के साथ मनुष्य में भगवान की अनन्य भक्ति का होना भी आवश्यक है। तभी मनुष्य जीवन के वास्तविक लक्ष्य को पा सकता है।
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