इस संसार में हर व्यक्ति पीडित है, कोई दुख से पीडित है, कोई सुख से। कोई व्यस्तता के बोझ तले दबा हुआ है, तो कोई दुश्मनों के षड्यंत्रों में घिर कर कराह रहा है। इस प्रकार की बातों से लगता है पीड़ा के जहर को पीते रहना ही इस जीवन का पर्याय है, पीड़ा और पश्चाताप का नाम ही जिंदगी है। संभवत: इसी प्रकार की मानसिकता कुछ लोगों को आत्महत्या करने के लिए भी मजबूर कर देती है। ऎसे लोग सोचते हैं कि जीवित रहना ही सभी समस्याओं की बुनियाद है। हमारे जीवित रहने की वजह से ही तरह-तरह की परेशानियां और समस्याएं हमें प्रतिपल व्यग्र व पीडित करती रहती हैं। अत: मर जाना ही बेहतर है। मरने के बाद हमें हर प्रकार की समस्याओं से मुक्ति मिल जाएगी, किंतु इस प्रकार की सोच तथ्य से सर्वथा परे है। यह एक मानसिक विकृति है, जो मनुष्य की निराशावादी सोच को अभिव्यक्त करती है। जरा सोचिए, मरने के बाद हमें हर प्रकार की समस्याओं से मुक्ति मिल जाएगी, इस बात को पूरी गारंटी के साथ कैसे कहा जा सकता है, क्योंकि मरने के बाद क्या होता है, यह कोई नहीं जानता। आज तक मरने के बाद कोई लौट कर आया नहीं, जो बयान दे सके कि मरने के बाद ऎसा-ऎसा होता है। सही तो यह कि मृत्यु के बाद ही जिंदगी का अंत नहीं हो जाता। मृत्यु के बाद भी जीव को उसके पिछले संस्कार घेरे रहते हैं और उसे अपनी करनी का फल भोगना पड़ता है। अत: समस्याओं से मुक्ति पाने के लिए आत्महत्या की बात सोचना पूरी तरह बेवकूफी है। इसलिए परिस्थितियां चाहे जैसी हों, मनुष्य को उनसे घबराना नहीं चाहिए, बल्कि उनका डटकर मुकाबला करना चाहिए। प्रारब्धवश हमें जो भी सुख-दुख का उपहार प्राप्त हो रहा है, उसे अपने ही कर्मो का फल मानते हुए उसे सहज ही स्वीकार कर लेना चाहिए और आगे के लिए भी हमेशा सचेत रहना चाहिए।
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