रक्षाबंधन आत्मीयता और स्नेह के बंधन से रिश्तों को मजबूती प्रदान करने का पर्व है। यही कारण है कि इस अवसर पर केवल बहन भाई के ही नहीं अन्य संबंधों में भी राखी बांधने का प्रचलन है। गुरू शिष्य को रक्षासूत्र बांधता है, तो शिष्य गुरू को। भारत में प्राचीन काल में जब स्नातक अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद गुरूकुल से विदा लेता था, तो वह गुरू का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए उसे रक्षासूत्र बांधता था, जबकि गुरू अपने विद्यार्थी को इस कामना के साथ रक्षासूत्र बांधता था कि उसने जो ज्ञान प्राप्त किया है, वह अपने भावी जीवन में उसका समुचित ढंग से प्रयोग करे, ताकि वह अपने ज्ञान के साथ-साथ गुरू की गरिमा की रक्षा करने में भी सफल हो सके। इसी परंपरा के अनुरूप आज भी किसी धार्मिक विधि-विधान से पूर्व पुरोहित यजमान को रक्षासूत्र बांधता है और यजमान पुरोहित को। इस प्रकार दोनों एक-दूसरे के सम्मान की रक्षा करने के लिए परस्पर एक-दूसरे को अपने बंधन में बांधते हैं। रक्षाबंधन का पावन पर्व सामाजिक व पारिवारिक एकबद्धता और एकसूत्रता का सांस्कृतिक उपाय रहा है। यह पर्व आत्मीय बंधन को मजबूती प्रदान करने के साथ-साथ हमारे भीतर सामाजिकता का विकास करता है। इतना ही नहीं यह त्योहार परिवार, समाज, देश और विश्व के प्रति अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूकता भी बढ़ाता है। इस पावन पर्व के सहारे जो कड़ी टूट गई है, उसे फिर से जागृत किया जा सकता है। इस पर्व पर हम सबको राष्ट्र रक्षा का संकल्प लेना चाहिए। यह पर्व हमें समाज के असहाय एवं वंचितों की सेवा करने की तथा उन्हे सामाजिक सुरक्षा देने की शिक्षा देता है। वास्तव में हमें अपने सामथ्र्य अनुसार इस पर्व पर लोक कल्याण के कार्य करने का संकल्प लेना चाहिए। रक्षाबंधन अनादि काल से वसुधैव कुटुम्बकम की स्नेहमयी भावना का मंत्र फूंक रहा है।
|
|
|
|
|
|
|