आज हम सभी को शांति की तलाश है। कुछ लोग मन की शांति भगवत भजन में ढूंढ़ते हैं। कुछ सत्संग का हिस्सा बनकर, तो कुछ लोग घंटों पूजा करते हैं तथा कुछ गुरू के चरणों में बैठ कर शांति की तलाश करते हैं, पर शांति नहीं मिलती। वजह यह है कि मन तो आंतरिक रूप से अशांत है, एक बवंडर सा चल रहा है वहां, और जब तक वह शांत नहीं होगा, मानसिक शांति कैसे मिलेगी। लाख जतन कर लें। मन भटकता ही रहेगा। पूजा-पाठ व्यर्थ हो जाएंगे।
भौतिकवादी चीजों से कभी किसी के मन को शांति नही मिल सकती है। हां, ये एक तरह का संतोष जरूर देती हैं, जिनसे आप शीघ्र ही ऊब भी जाते हैं। अगर वास्तव में आपको आंतरिक शांति चाहिए, तो आपको स्वयं को बाहरी दिखावों से मुक्त करना होगा। वह करना होगा, जो आप करना चाहते हैं, वह नहीं जो दुनिया आपसे करवाना चाहती है। इस बनावटी संसार से निकल कर प्रकृति के निकट जाइए। पक्षियों का कलरव और नदियों का कलकल निनाद सुनिए। ऎसा करने से आहिस्ता-आहिस्ता आपके और उस अदृश्य शक्ति जिसे आप भगवान, प्रकृति, ईश्वर, अल्लाह जो भी कहना चाहे, के मध्य एक रिश्ता कायम होने लगेगा। एक आवाज जिसे आत्मा की आवाज भी कहा जाता है, पुन: आपको दिशा निर्देशित करने लगेगी और संभव है कि आपको वो आंतरिक शांति भी मिल जाए, जिसकी आपको तलाश है।
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