महाभारत के तीन कारण बताए जाते हैं। शांतनु का काम, दुर्योधन की ईष्र्या और द्रौपदी का क्रोध। शांतनु का काम भीष्म-प्रतिज्ञा का कारण बना। दुर्योधन की ईष्र्या पाण्डवों को 5 गांव भी न दे सकी। द्रौपदी का क्रोध विनाश पत्र के ऊपर अंतिम हस्ताक्षर था। इनमें से केवल दुर्योधन की ईष्र्या ही थी, जो लम्बे समय तक इस विनाश बीज को पल्लवित किए रही, शेष दोनों कारण तो तात्कालिक थे। ईष्र्या हिंदू शास्त्रों में वर्णित 6 दोषों में एक है। बाइबिल में बताए 7 पापों में इसका स्थान है, जैन और बौद्ध ग्रंथों में इस पर विस्तार से चर्चा की गई है। कहीं इसे आग के समान, तो कहीं दीमक के समान और कहीं इसे ठीक नहीं होने वाली बीमारी बताया है।
जो व्यक्ति बहुत ऊपर उठे हुए हंै, वे अधिक दिखावा न करे। न धन का, न ज्ञान का, न सम्मान का, न अभिमान का। ऊंचाइयां छूने के बाद भी "मैं तो बड़ा तुच्छ सा प्राणी हूं और आप के ऎश्वर्य के आगे यह उपलब्धि तो कुछ भी नहीं।" जैसे वाक्य बोलकर ईष्र्या का शमन किया जा सकता है। भारत में दान को बहुत महत्वपूर्ण माना गया है। कम से कम जिन्हें दान मिलेगा, वे ईष्र्या न करके आशीर्वाद देंगे। आपके प्रति ईष्र्या की मात्रा कम हो जाएगी और इसी बहाने आपका धन के प्रति मोह भी कम हो जाएगा। कई लोग स्वयं तोप चलाने के बाद भी के्रडिट अपनी टीम को ही देते हैं। इससे सद् भावना बनी रहती है और इससे उसके साथियों में ईष्र्या का भाव कम हो जाता है।
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