सभी आत्मीयता से डरते हैं। यह बात और है कि इसके बारे में तुम सचेत हो या नहीं। आत्मीयता का मतलब होता है कि किसी अजनबी के सामने स्वयं को पूरी तरह से उघाड़ना। हम सभी अजनबी हैं। कोई भी किसी को नहीं जानता। हम स्वयं के प्रति भी अजनबी हैं, क्योंकि हम नहीं जानते कि हम हैं कौन। आत्मीयता तुम्हें अजनबी के करीब लाती है। तुम्हें अपने सारे सुरक्षा कवच गिराने हैं। सिर्फ तभी, आत्मीयता संभव है। हर कोई चाहता है कि दूसरा व्यक्ति आत्मीय हो। यदि तुम सामान्य जीवन जीते, प्राकृतिक जीवन जीते, तो आत्मीयता से कोई भय नहीं होता, बल्कि बहुत आनंद होता, लेकिन इसके पहले कि तुम आत्मीयता पाओ, तुम्हें अपना घर पूरी तरह से साफ करना होगा। सिर्फ ध्यानी व्यक्ति ही आत्मीयता को घटने दे सकता है। आत्मीयता का सामान्य-सा अर्थ यही होता है कि तुम्हारे लिए ह्वदय के सारे द्वार खुल गए, तुम्हारा भीतर स्वागत है और तुम मेहमान बन सकते हो, लेकिन यह तभी संभव है जब तुम्हारे पास ह्वदय हो और जो हर तरह के विकारों से उबल नहीं रहा हो, जो कि प्राकृतिक है, जैसे कि वृक्ष, जो इतना निर्दोष है, जितना कि एक बच्चा। तब आत्मीयता का कोई भय नहीं होगा। विश्रांत होओ। वही कहो, जो तुम कहना चाहते हो। बिना फल की चिंता किए अपनी सहजता के द्वारा कर्म करो। यह छोटा-सा जीवन है। इसे यहां और वहां के फलों की चिंता करके नष्ट नहीं किया जाना चाहिए। आत्मीयता के द्वारा, प्रेम के द्वारा, दूसरें लोगों के प्रति खुल कर, तुम समृद्ध होते हो। और यदि तुम बहुत सारे लोगों के साथ गहन प्रेम, मित्रता, आत्मीयता में जी सको, तो तुमने जीवन सही ढंग से जीया और जहां कहीं तुम हो तुमने यह कला सीख ली, तुम वहां भी प्रसन्नतापूर्वक जीओगे। आत्मीयता के प्रति भयरहित होओ। - ओशो
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