अपनी कमी का अनुभव करना और उसे मिटाने का प्रयत्न करना, यही मानव-जीवन का आरंभ है। किसी प्रकार की कमी शेष न रहे, अर्थात पूर्णता का अनुभव करना यही मानव जीवन की पराकाष्ठा है। जब व्यक्ति अपनी दृष्टि से अपने में कमी का अनुभव करता है, तब सबसे बड़ा दुख होता है। अत्यंत दुख होने पर दुखी अपनी वर्तमान परिस्थिति से ऊपर उठ जाता है, अर्थात उसे बदल देता है। उन्नतिशील मानव के लिए अपनी कमी का अनुभव करना सबसे पहले आवश्यक है। यदि कमी का अनुभव करके उसे मिटाने का प्रयत्न न किया, तो मानवता नहीं कही जा सकती। मानवता व्यक्ति नहीं, बल्कि जीवन की एक अवस्था है, जो उन्नति के लिए एकमात्र सर्वोत्तम अवस्था है। यदि जीवन में पूर्णता न मिले, तो जीवन का मूल्य ही कुछ नहीं। पूर्णता जीवन में ही मिल सकती है। इसमें लेशमात्र भी संदेह नहीं है। कमी का रहना किसी को प्रिय नहीं है। कमी को दूर करने के लिए ही हमें यह मानव जीवन मिला है। इस पृथ्वी पर वे सभी साधन विद्यमान हैं, जिनसे कि इस जीवन में ही जीवन की पूर्णता का अनुभव हो सकता है। परंतु बाहरी रंगों से अपने को रंग लेने से वे छिप जाते हैं। व्याकुलता के प्रभाव से बाहरी रंग घुल जाते हैं। व्याकुलता सभी में है, परंतु वही उसे अनुभव करता है, जो पूर्णता के लिए व्याकुल होता है। पूर्णता की निराशा व्याकुलता को दबा देती है, पर मिटा नहीं पाती। दबी हुई व्याकुलता बार-बार उत्पन्न होती है, इसलिए उसे पूर्ण कर दो। व्याकुलता के समान कोई भी हितैषी मित्र जीवन में नहीं है। उसका आदर करो, ह्वदय में स्थान दो, जीवन का अंग बनाओ। व्याकुलता रहित जीवन व्यर्थ है, जो मृत्यु के समान है। जीवन का सदुपयोग करने पर इच्छाओं का अंत जीवन में ही हो जाता है। उसी काल में ही जीवन में पूर्णता अनुभव होती है, मृत्यु होने पर नहीं।
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