भक्ति नम्रता, सच्चाई व दीनता से प्राप्त होती है। यह गुण संतों की संगति से मिलता है। संसार में दो प्रकार की विचारधाराओं के प्राणी हैं। एक वे जीव जो सिर्फ माया प्राप्त करने के इच्छुक होते हैं, तो दूसरे वे प्रभु प्रेमी होते हैं, जो अपना मन प्रभु की भक्ति में लगाए रहते हैं। पहले प्रकार के प्राणी ऎसे होते हैं, जिनके मन में सदैव माया को पाने के विचार और संकल्प उठते रहते हैं। वे सोचते हैं कि उन्हें अधिक से अधिक माया मिल जाए और वे संसार में बड़े आदमी कहलाएं। इसी इच्छा को लेकर वे पुरूषार्थ करते हैं और अपनी संपूर्ण आयु माया को प्राप्त करने के प्रयास व संकल्पों में ही व्यतीत कर देते हैं। माया को एकत्र करने की कामना के तहत उन्हें चाहे-अनचाहे कई प्रकार के उचित एवं अनुचित कार्य करने पड़ते हैं, जबकि माया का यह गुण है कि मनुष्य भले ही अपना संपूर्ण जीवन इसे एकत्र करने और संभालने में व्यतीत कर देता है, परंतु यह फिर भी कभी स्थिर नहीं रहती है और न ही सदैव जीव का साथ देती है। जिस माया के एकत्र करने में जीव ने उचित और अनुचित कर्म किए, वह माया तो मृत्यु उपरांत यहीं इसी लोक में रह जाती है, परंतु उस माया को पाने के लिए किए कर्म तो जीव के साथ ही जाते हैं और उन कर्मों का फल जीवात्मा को परलोक में जाकर भोगना पड़ता है। माया की विचारधारा रखने वाले व माया को पाने के लिए प्रयत्नशील जीवों का यही परिणाम होता है। दूसरी विचारधारा रखने वाले वे जीव हैं, जिनके मन में भक्ति के संकल्प उठते रहते हैं। वे यही सोचते हैं कि कब उन्हें उनके ईश मिलेंगे। उनके मन में भजन, सेवा, ध्यान व दर्शन आदि के भाव उठते रहते हैं। माया को पाने के मोह में अधिकतर जीव उलझे रहते हैं, जबकि माया से विमुख और भगवान के अस्तित्व को मानने वाले व उसकी भक्ति करने वाले भले ही कम हंै, मगर उन्हीं के आधार पर संसार सुचारू है।
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