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Wednesday, 08 February, 2012
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सेन, सेन और सेन
Thursday, August 19, 2010, 15:24 hrs IST
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मुनमुन सेन कहती हैं, जब मैंने पहली बार हबी (भरत देव बर्मन जो हबी के नाम से जाने जाते हैं) को देखा, तब मैं स्कूल में थी। वह रेस में जाते और हमेशा çस्त्रयों से घिरे रहते। मुझे आज भी याद है कि मेरी तरफ उनकी पीठ ही होती, और जब वह मुड़ते तो मुझे उनके जैकेट और उसके अंदर रेड सिल्क लाइनिंग शर्ट की झलक दिख जाती। मैं खुद से ही कहती, ओह! ये कितने दिलदार हैं, मैं इनसे शादी कर सकती हूं।
भरत देव बर्मन त्रिपुरा के पूर्व शाही घराने से ताल्लुक रखते हंै। 60-70 के दशक में वे कोलकाता में भी बड़े शाही अंदाज से जिंदगी कालुत्फ उठा रहे थे। खूबसूरत लड़कियां उनके कदमों पर बिछी जाती थीं। ऎसे में मुनमुन की तमन्ना थी कि वह उनसे शादी करे।
हम दोनों की उम्र में बहुत अंतर था और मुझे नहीं लगता था कि वो मेरे प्रस्ताव को जरा-भी गंभीरता से लेंगे। मैं तो बस उन्हें प्रपोज करने वाली खूबसूरत çस्त्रयों में से एक थी और वह ऎसे में न तो हां कहने की स्थिति में थे और ना ही इनकार करने की। मैंने कुछ समय उनके जवाब का इंतजार किया। लेकिन वह मुझे बॉयफ्रेंड्स बनाने से नहीं रोक सके थे, वह हंसते हुए कहती हैं।
उनकी शादी को तीन दशक से ज्यादा हो चुके हैं और हबी न केवल अच्छे पति साबित हुए हैं, बल्कि अच्छे पिता भी। मुनमुन की मां और अभिनेत्री सुचित्रा सेन के लिए भी वह केअरिंग सन इन लॉ रहे। जब सुचित्रा हॉस्पिटल में थीं तब भी वह उनकी खैरियत जानने के लिए हमेशा मुनमुन के संपर्क में रहे। मां की बीमारी को लेकर मुनमुन बहुत परेशान रहती थीं, लेकिन ऎसी हालत में भी जब उन्हें कैमरे के सामने जाना पड़ता था, तो मुनमुन को एक नकली मुस्कुराहट चेहरे पर ओढ़नी पड़ती थी।
उन्हीं की तरह उनकी दो खूबसूरत बेटियां है राइमा और रिया। दोनों अपनी मां से बेहद प्रभावित हैं। मां की तरह ही उनकी भी लाइट्स और मेकअप में आसक्ति है साथ ही अपने पिता से भी उनकी साझेदारी बहुत अच्छी है। दोनों बहनों के लिए मुनमुन और हबी पेरेन्ट्स कम फ्रेंड ज्यादा हैं। अपने माता-पिता के रिश्ते में माधुर्य को देखती हुए दोनों बेटियां भी ऎसी ही शादी की कल्पना करती हैं। दोनों में से बड़ी बेटी राइमा कहती हैं, मेरे माता-पिता ने अपनी जीवन में कई उतार-चढ़ाव देखे, लेकिन बावजूद इसके उनकी शादी आज भी कायम है। मैं परियों की कहानी में यकीन नहीं रखती और शादी के लिए बहुत व्यावहारिक धरातल पर रहकर ही सोचती हूं। मैं इतना चाहती हूं कि जो मेरी जिंदगी में आए वो सभ्य होने के साथ ही उदारमना भी हो। मैंने इस बारे में अपनी कोई राय नहीं बनाई कि मेरा पार्टनर भी रॉयल बैकग्राउंड से हो। लेकिन हां अभी तो इतना ही कहूंगी कि अभी में किसी रिश्ते में बंधने के लिए तैयार नहीं हूं और आजादी का लुत्फ उठाना चाहती हूं।
रिया कहती हैं, अगर कोई सुयोग्य रॉयल्स हैं तो वे मुझसे संपर्क कर सकते हैं, हंसते हुए। लेकिन मजाक से इतर सोचें तो मेरा मानना है कि पति-पत्नी एक जैसे सोशल स्टेटस के हो तो सामंजस्य आसान हो जाता है।
राइमा और रिया दोनों ही कहती हैं कि वे अभी सिंगल हैं और उनकी जिंदगी मुंबई और कोलकाता के बीच गुजर रही है। कोलकाता वो जगह है, जहां उनका बचपन बीता और बचपन की यादें और दोस्त हैं वहां और मुंबई में उनकी आजाद जिंदगी। लेकिन मुनमुन ने बेटियों की देखभाल के लिए ढेर सारा स्टाफ नियुक्त कर रखा है। अभिभावक होने के गौरवपूर्ण अंदाज में वह कहती हैं, मैं बस यह जानना चाहती हूं कि मेरी बेटियां शरारतें तो नहीं कर रहीं।
जब मुनमुन बेटियों को लेकर थोड़ी सख्त हो जाती थीं तो नानी हमेशा उनका पक्ष लेती। राइमा कहती हैं, मेरी नानी की राय में हम दोनों बहुत अच्छी लड़कियां हैं। वे हमेशा हमारा बचाव करतीं वो कभी ऎसा सोच ही नहीं सकती कि हम शरारती हैं। उनके साथ हम बहुत वक्त बिताते और वे हमें मेकअप के टिप्स भी दिया करतीं। उन्हें चौड़ी आईब्रो पसंद थी।
मुनमुन कहती हैं, कोई मेरी बेटियों की आलोचना करे, मुझे कतई बर्दाश्त नहीं। वे जो भी करती हैं, उसके लिए वे खुद ही जवाबदेह हैं। वे जो करना चाहती हैं, कर सकती हैं। जीवनसाथी भी अपनी पंसद से चुन सकती हैं, लेकिन मैं बस इतना ही चाहती हूं कि उन्हें ऎसा जीवन साथी मिले जो उनका अच्छे से खयाल रख सके। मैंने उन्हें बहुत ही सुरक्षित और लग्जीरियस लाइफ दी है और मुझे लगता है कि उन्हें ऎसी ही देखभाल की जरूरत भी है।
राइमा और रिया को विरासत में बहुत कुछ मिला है। मां और नानी की खूबसूरती, अभिनय के प्रति उनका लगाव, बंगाली तौर-तरीके तो दादी के राजसी अंदाज। राइमा और रिया की दादी इला देवी कूच बिहार की पूर्व राजकुमारी और जयपुर की पूर्व राजमाता गायत्री देवी की बहन थीं। मुनमुन सेन कहती हैं कि सास के साथ वक्त बिताने का सौभाग्य उन्हें नहीं मिला, लेकिन मौसी सास गायत्री देवी के साथ बहुत वक्त बिताया। राइमा और रिया कहती हैं, हम भी उन्हें मौसी मां ही कहते थे। हम उनसे बहुत प्रभावित थे और वे हमारे बंगाली अंदाज से प्यार करतीं। अभिवादन के रूप में राजस्थानी खम्माघणी सुनने की बजाय वह बंगाली अभिवादन "प्रोणाम" सुनना पसंद करतीं। पूर्व शाही घराने के तौर-तरीके और बंगाली खूबसूरती के मेल-जोल ने सेन बहनों को कुछ खास बना दिया है, बावजूद इसके वो अपना सफर अपने हिसाब से तय करना पसंद करती हैं।
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