मॉडलिंग से बॉलीवुड बॉलीवुड में आने का मेरा सपना कभी नहीं रहा। मैं पत्रकार बनना चाहती थी। युद्ध क्षेत्र से सीधे लाइव रिर्पोटिंग का सपना था मेरा, लेकिन दिल्ली में पढ़ाई के दौरान मॉडलिंग का शौक लगा और कुछ ही दिनों में यह मेरा फुल टाइम प्रोफेशन बन गया। वह बताती हैं, इसी दौरान मुझे कैडबरीज, एअरटेल, एलजी, सोनी और सनसिल्क जैसे कई कॉमर्शियल प्रोजेक्ट्स मिले। इन विज्ञापनों ने मुझमें फिल्मों में काम करने के प्रति जिज्ञासा पैदा की और मैं मुंबई आ गई। शुजित सरकार के निर्देशन में बनने वाली फिल्म "यहां" मिली। पंजाबी जाट परिवार से होने की वजह से पेरेंट्स को समझाने में काफी वक्त लगा, लेकिन मैंने हमेशा उनको अपने साथ खड़ा पाया है। वे मेरी सबसे बड़ी ताकत हैं, क्योंकि परिवार के सपोर्ट के बिना कुछ भी कर पाना बेहद मुश्किल है। हालांकि मिनिषा की पहली फिल्म "यहां" बॉक्स ऑफिस पर कोई धमाल नहीं मचा पाई, लेकिन इसके बाद उन्हें काफी फिल्में मिली। कारपोरेट, एंथोनी कौन है, हनीमून टे्रवल्स प्राइवेट लिमिटेड, बचना ए हसीनो और किडनैप। इन फिल्मों ने उनके करिअर ग्राफ को ऊंचाइयों पर पहुंचाया और फिल्म सर्किट में वह पहचानी जाने लगीं। घूमना पसंद बचपन से सपना था रिपोर्टर बनने का। इसके पूरा न हो पाने का मलाल है मिनिषा को। ईरान की पत्रकार क्रिस्टीन अमनपॉर उनकी आदर्श रही हैं। वह बताती हैं, फारस की खाड़ी के युद्ध और बोस्निया युद्ध के दौरान क्रिस्टीन की रिपोट्र्स मुझे अपील करती। एक साक्षात्कार में मिनिषा ने कहा था कि उन्हें पत्रकार बनने का मौका मिला होता तो वे सोनिया गांधी, मार्टिन लूथर किंग, जॉन लेनिन व जेम्स डीन आदि का इंटरव्यू जरूर करतीं। वह बताती हैं, मैं बचपन से ही काफी एडवेंचरस स्वभाव की रही हूं और बाहर घूमना पसंद है। पत्रकारिता काम के साथ शौक को पूरा करने का बेहतर तरीका हो सकता था। तो क्या हुआ, जो उन्हें यह मौका नहीं मिल पाया? फिल्म शौर्य ने मिनिष्ाा की यह चाहत पूरी कर दी। इस फिल्म में वह युद्ध संवाददाता है। काम को किया है एंजॉय पहली फिल्म यहां से लेकर हाल ही रिलीज वेलडन अब्बा तक काम के अनुभव बेहद रोचक रहे हैं। अब तक का सफर कहीं बहुत खूबसूरत रहा तो कहीं काफी थका देने वाला। यह आपको प्रेरणा देता है। एक्टर बनने के बाद मेरी हर अभिलाषा पूरी हो गई है और इससे ज्यादा मुझे कुछ नहीं चाहिए। वह बताती हैं, यह चीजें मुझमें हिम्मत देती हैं। वह कहती हैं, मैंने रूपए-पैसे से भरपूर ऎसे ऑफर्स अस्वीकार कर दिए, जिनमें करने को कुछ नहीं होता था, क्योंकि मुझे लगता है कि दर्शक अपनी खून-पसीने से कमाए पैसे खर्च कर फिल्म देखने आता है, इसलिए निरर्थक फिल्मों में काम करने का क्या औचित्य है। सूचि लंबी है शुजित सरकार, श्याम बेनेगल, मधुर भंडारकर और सिद्धार्थ आनंद के साथ काम के अनुभवों को कभी भुलाया नहीं जा सकता। श्याम बेनेगल से काफी कुछ सीखने को मिला। मैं भाग्यशाली हूं कि उनके साथ काम करने का मौका मिला। कमाल के डायरेक्टर हैं वे। मैं इम्तियाज अली, विशाल भारद्वाज, आशुतोष्ा गोवारीकर और मणिरत्नम जैसे निर्देशकों के साथ काम करने की इच्छुक हूं। भलमनसाहत में बहुत शक्ति होती है। अच्छे इंसान के रूप में आप हमेशा याद किए जाते हैं। मैं बीस साल पहले की जिंदगी पर पलटकर नहीं देखना चाहती। नादानी में बहुत लोगों का दिल दुखाया था। मुझे उसका अफसोस है। मन से आध्यात्मिक हूं और ईश्वर की सत्ता में पूरा भरोसा है मुझे। प्रोफेशनल हूं यहां सबसे ज्यादा कुछ महत्वपूर्ण है तो वह है आपकी समयबद्धता और मेहनत। दूसरों का सम्मान करने वाले और काम पर समय से आने वालों को सब पसंद करते हैं पूछते हैं। वह कहती हैं, अपना किरदार निभाते वक्त मैं उसे जीने की कोशिश करती हूं। खुद हंसना आसान है, लेकिन दूसरों को हंसा पाना उतना ही मुश्किल।
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