गुजरात के पूर्व गृह राज्य मंत्री अमित शाह की गिरफ्तारी के साथ ही सीबीआई के दुरूपयोग के आरोप एक बार फिर से लग रहे हैं। शाह पर आरोप है कि उन्होंने सोहराबुद्दीन शेख और उसकी पत्नी कौसर बी की एक फर्जी पुलिस मुठभेड़ में हत्या कराने में अहम भूमिका निभाई। गुजरात में सत्तारूढ़ भाजपा इन आरोपों को बेबुनियाद और सीबीआई की भूमिका को राजनीति से प्रेरित बता रही है। जहां तक सीबीआई के दुरूपयोग का सवाल है, विपक्ष हमेशा से ऎसे आरोप लगाता रहा है। जब एनडीए की सरकार थी, तो कांग्रेस ने भी ऎसे ही आरोप लगाए थे। आरापों के इस सिलसिले के बाद यह आम धारणा बन चुकी है कि केंद्र में सत्तारूढ़ हर दल अपने राजनीतिक हितों की रक्षा के लिए सीबीआई का दुरूपयोग करता है। आजादी के बाद कांग्रेस ने देश पर सबसे अधिक समय राज किया है, इसलिए उसने इस आरोप को सबसे ज्यादा झेला है। देश की सर्वाधिक प्रतिष्ठित जांच एजेंसी कही जाने वाली सीबीआई में दुरूपयोग के किस्सों की कमी नहीं है, लेकिन यह कहना गलत होगा कि वह केंद्र सरकार की कठपुतली है। सीबीआई का काम करने का अपना तरीका है और उसमें किसी के बहुत ज्यादा दखल की गुंजाइश बनती नहीं है। असल में सीबीआई की सख्ती हमारे राजनेताओं को रास नहीं आती है। उल्टे-सीधे काम करने के बाद जब ये सीबीआई के शिकंजे में फंस जाते हैं और बच निकलने का कोई रास्ता नहीं दिखाई देता है, तो ये अपने राजनीतिक हित साधने के लिए सीबीआई पर पूर्वाग्रह का आरोप जड़ देते हैं। हां, यह जरूर है कि सत्ताधारी दल के नेता अपने राजनीतिक विरोधियों के मामलों को खंगालने में ज्यादा दिलचस्पी लेते हैं, लेकिन इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि उन्हें जबरदस्ती फंसाया जाता है। सोहराबुद्दीन मामले को ही लें। बिना जांच और अदालती प्रक्रिया के ही अमित शाह को निर्दोष और सीबीआई की कार्रवाई को राजनीतिक प्रतिशोध से प्रेरित मान लेना तर्कसंगत नहीं है। यह सही है कि सोहराबुद्दीन एक शातिर अपराधी था और गुजरात समेत कई राज्यों में उसका आतंक था। उसके पास एके-47 सरीखे खतरनाक हथियार भी मिले। फिर भी उसे फर्जी मुठभेड़ में मार गिराना कानूनन अपराध ही है। यही नहीं उसकी पत्नी को भी मार दिया गया। यदि सीबीआई यह पता कर रही है कि कानून को किनारे कर यह वहशी हरकत किसने की, तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है। यहां गौर करने लायक बात यह भी है कि सोहराबुद्दीन मुठभेड़ कांड की जांच सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर सीबीआई कर रही है। गुजरात पुलिस द्वारा जांच पूरी करने बाद भी अगर सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सीबीआई से जांच कराने की जरूरत समझी, तो संकेत यही है कि कहीं न कहीं गड़बड़ जरूर है। सीबीआई केंद्र सरकार के इशारे पर कुछ गलत करती भी है, तो अंतिम फैसला तो सुप्रीम कोर्ट में ही होगा। दरअसल, विडंबना यही है कि सीबीआई जांच और अदालत के अंतिम निर्णय की प्रतीक्षा करने को कांग्रेस या भाजपा, दोनों में से कोई भी तैयार नहीं है। शायद इसलिए भी कि दोनों की ही दिलचस्पी सच के बजाय मामले का राजनीतिक लाभ उठाने में है। इसीलिए गुजरात दंगों के लिए मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को घेरते रहने के बावजूद गुजरात में चुनाव-दर-चुनाव मात खाती रही कांग्रेस को सोहराबुद्दीन मुठभेड़ प्रकरण के रूप में भाजपा और मोदी को कठघरे में खड़ा करने का एक और मनवांछित मौका मिल गया है। वहीं कांग्रेस पर मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप लगाने वाली भाजपा को भी अपने आरोप के समर्थन में एक और उदाहरण मिल गया है। राजनीतिक रस्साकशी के बीच सीबीआई को घसीटना दुर्भाग्यपूर्ण है। इसलिए कानून में विश्वास रखने का दावा करने वाली कांग्रेस और भाजपा दोनों को ही चाहिए कि वे इस मुद्दे पर राजनीति करने के बजाय कानून को अपना काम करने दें, क्योंकि ऎसी करतूतों के छींटे कमोबेश सभी राजनीतिक दलों के दामन पर नजर आते हैं। सीबीआई पर आरोप लगाने की बजाय राजनीतिक दलों को उन तरकीबों के बारे में सोचना चाहिए, जो देश की सर्वोच्च जांच एजेंसी की स्वायत्तता व निष्पक्षता में अभिवृद्धि कर सके। बेसिर-पैर के आरोप लगाने का अर्थ नहीं है, क्योंकि जो विपक्ष में रहते हुए सीबीआई पर अंगुलियां उठा रहे हैं, वे भी उसे वैसे ही काम लेते हैं, जैसे अब लिया जा रहा है। जोगिंदर सिंह (लेखक सीबीआई के पूर्व निदेशक हैं) दुरूपयोग नहीं तो और क्या? यह दुर्भाग्यजनक है कि कि सीबीआई केंद्र के इशारे पर सोहराबुद्दीन मामले में अमित शाह को फंसा रही है। सीबीआई की कार्रवाई साफतौर पर राजनीति से प्रेरित है। कांग्रेस इस मामले में गंदी राजनीति का नमूना पेश कर रही है। लालकृष्ण आडवाणी ने 19 जुलाई को ही वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी के सामने सीबीआई के दुरूपयोग का मुद्दा उठाया था, लेकिन सरकार इस ओर ध्यान नहीं दे रही है। यूपीए सरकार तीन तरह से सीबीआई का दुरूपयोग कर रही है। पहला- विपक्ष के नेताओं पर शिकंजा कसने में, दूसरा- यूपीए में शामिल नेताओं को बचाने व उनके खिलाफ मामलों को खत्म करने और तीसरा- बसपा, सपा और राजद जैसे गैर कांग्रेसी दलों के नेताओं के खिलाफ दर्ज मामलों में तलवार लटकाए रखने में। सरकार की खुशामद करते-करते आज स्थिति यह है कि सीबीआई अपनी विश्वसनीयता और निष्पक्षता खो चुकी है। सोहराबुद्दीन मामले की बात करें, तो जांच के जरिए यह अहसास कराने की कोशिश की जा रही है कि जा रही है कि अमित शाह के बाद मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की भी घेरेबंदी होगी। आखिर यह किसी फर्जी मुठभेड़ की जांच हो रही है या फिर गुजरात सरकार की छवि को नए सिरे से खराब करने का कोई अभियान छेड़ा जा रहा है? कांग्रेसी नेता जिस तरह यह मांग कर रहे हैं कि इस मामले में सीबीआई को नरेंद्र मोदी के खिलाफ भी जांच करनी चाहिए, उससे यह साफ है कि गुजरात को एक खास नजरिए से देखा जा रहा है। सवाल यह भी है कि गुजरात दंगों और सोहराबुद्दीन मुठभेड़ के मामले में जैसा रवैया अपना जा रहा है, वैसा अन्य राज्यों में हुए दंगों, मुठभेड़ों आदि के मामले में क्यों नहीं अपनाया जाता? जब 1984 के दंगों का मामला उठता है, तब सब कुछ भूलकर आगे बढ़ने या फिर कानून को अपना काम करने की दुहाई दी जाती है, लेकिन गुजरात के मामले में नरेंद्र मोदी पर चहंु ओर से आक्रमण कर दिया जाता है। हम किसी अपराधी का बचाव नहीं कर रहे हैं। हम देश के कानून का पूरा सम्मान करते हैं। जिसने अपराध किया उसे दंड मिलना चाहिए, लेकिन विधिसम्मत तरीके से, न कि राजनीतिक आधार पर। सचाई यह है कि अन्य बुराइयों की तरह सरकारी मशीनरी के दुरूपयोग में भी कांग्रेस सिद्धहस्त हो गई है। यदि सीबीआई केंद्र सरकार के इशारों पर काम नहीं करती, तो यह चमत्कार कैसे होता कि संसद के पिछले ही बजट सत्र में धुर राजनीतिक विरोधी मायावती और मुलायम सिंह यादव कटौती प्रस्ताव पर मनमोहन सिंह सरकार के बचाव की भूमिका निभाते नजर आए। यह इन दोनों के विरूद्ध आय से अधिक संपत्ति समेत भ्रष्टाचार के मामलों की जांच सीबीआई के हाथ होने का परिणाम रहा कि एक-दूसरे को फूटी आंख नहीं सुहाने वाले इन दोनों नेताओं के दलों ने संसद के बाहर महंगाई के लिए सरकार को जमकर कोसा, लेकिन संसद में कटौती प्रस्ताव पर उसी सरकार को संजीवनी दी। इन दोनों नेताओं के विरूद्ध अदालत में चल रहे मामलों में कांग्रेस और केंद्र की सुविधानुसार सीबीआई का बदलता रूख भी इसी धारणा को पुष्ट करता है। 1997 में उच्चतम न्यायालय ने हवाला कांड में ऎतिहासिक फैसले में सीबीआई की निष्पक्षता और स्वायत्तता का स्तर ऊंचा उठाने के लिए दिशा-निर्देश तय कर दिए थे। इसके बाद सीबीआई पर कार्मिक विभाग का नियंत्रण खत्म हो गया और वह केंद्रीय सतर्कता आयोग की सीधी निगरानी में आ गई थी। देश की सर्वोच्च जांच एजेंसी का राजनीतिक रूप से उपयोग बंद होना चाहिए। सीबीआई को स्वायत्त और निष्पक्ष बनाने के लिए उच्चतम न्यायालय भी मंशा जाहिर कर चुका है। सीबीआई एक्ट 2003 में उच्चतम न्यायालय के अन्य दिशा-निर्देशों को तो सम्मिलित कर दिया गया, लेकिन धारा 26 के तहत कार्यपालिका का वह अधिकार बहाल कर दिया गया, जिसमें संयुक्त सचिव और उससे ऊपर के अधिकारियों के खिलाफ शिकायतों या भ्रष्टाचार की सूचना की जांच शुरू करने से पहले सरकार की अनुमति आवश्यक है। सीबीआई की खुद की विधिक परामर्श इकाई बनाने पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है, लेकिन सरकार की इसमें दिलचस्पी नहीं दिखती। शायद इसकी वजह यही है कि वह एक ऎसे हथियार को खोना नहीं चाहती, जिससे वह अपने राजनीतिक विरोधियों को डरा-धमका सके। आई.डी. स्वामी (लेखक पूर्व गृह राज्य मंत्री हैं)
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