भले ही महंगाई ने आम आदमी का जीना मुहाल कर रखा हो, लेकिन विपक्ष और बुद्धिजीवियों के लिए इससे अच्छा कोई विषय नहीं है। जहां विपक्ष के नेता इसके जरिए अपनी सियासत चमकाने की फिराक में हैं, वहीं बुद्धिजीवी अपनी मेधा का लोहा मनवाना चाहते हैं। यह संभव है कि वे अपने मकसद में कामयाब हो जाएं, लेकिन क्या यह जायज होगा? क्या विपक्ष और देश के तथाकथित बुद्धिजीवियों का फर्ज सिर्फ यही है कि वे महंगाई के मुद्दे पर केंद्र सरकार को भला-बुरा कहकर सनसनी पैदा करें? असल में समस्या यह है कि अब तक किसी ने महंगाई के मर्ज को ढंग से समझा ही नहीं है या यूं कहें कि समझने की कोशिश ही नहीं की है। केंद्र की यूपीए सरकार इन सब में शीर्ष पर है और यह देखकर हैरानी भी होती है। सरकार में ऎसे लोगों की भरमार है, जिन्हें आर्थिक मामलों का विशेषज्ञ माना जाता है। पूरी दुनिया इनकी प्रतिभा का लोहा मानती है। लेकिन महंगाई पर इनकी विवशता देखकर न सिर्फ इन धुरंधरों की प्रतिष्ठा पर शक होता है, बल्कि इनकी विद्वता पर हंसी भी आती है। कोई दो महीने बाद महंगाई कम होने का दावा करता है, तो कोई चार महीने बाद। कोई महंगाई को अर्थव्यवस्था का स्वाभाविक लक्षण मानता है, तो कोई ऊंची विकास दर हासिल करने के लिए इसे जरूरी बताता है। और अब ज्यादातर यह राग आलाप रहे हैं कि अच्छा मानसून महंगाई को विदा कर देगा। संभवत: वे ऎसा इसलिए कर रहे हैं, क्योंकि प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने भी ऎसी ही उम्मीद जताई है। जब मानसून ही महंगाई को नियंत्रित करेगा, तो फिर सरकार को यह दिखावा करने की आवश्यकता कहां थी कि वह कीमतें कम करने के लिए जी तोड़ कोशिश कर रही है? दरअसल, महंगाई के कारणों और उपायों को खोजने की बजाय केंद्र सरकार के नुमाइंदे इस कोशिश में ज्यादा दिखे कि इसका ठीकरा उनके सिर पर नहीं फूटे। यहां तक कि कृषि मंत्री शरद पवार ने भी कह दिया कि सरकार के मुखिया होने के नाते महंगाई के लिए प्रधानमंत्री जिम्मेदार हैं। प्रधानमंत्री ने इससे बचने के लिए तुरंत मुख्यमंत्रियों की बैठक बुला ली और बोले- खाद्य उत्पादन बढ़ाओ, कालाबाजारियों के खिलाफ कार्रवाई करो और सार्वजनिक वितरण प्रणाली मजबूत करो। जब इन बयानों से भी बात नहीं बनी, तो कहा कि पूरी दुनिया में खाद्यान्न उत्पादन कम हुआ है, इसलिए महंगाई बढ़ रही है। योजना आयोग भी प्रधानमंत्री की पैरवी में खड़ा हो गया। आयोग के उपाध्यक्ष अहलूवालिया ने कहा कि रबी की फसल आने दीजिए, सब ठीक हो जाएगा। अब बारी वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी की थी। उन्होंने तो कृषि मंत्री और प्रधानमंत्री से एक कदम आगे जाते हुए संसद में बयान दे दिया कि एक अरब 20 करोड़ लोगों को खाद्यान्न उपलब्ध कराने के लिए अमेरिका जितनी बड़ी अर्थव्यवस्था चाहिए। इस बीच बढ़ती कीमतों से जूझते आम आदमी की कमर सरकार ने पेट्रोलियम उत्पादों के दाम बढ़ाकर तोड़ दी। प्रधानमंत्री ने बयान दिया कि लोगों को इसे संकीर्ण नजरिए से नहीं देखना चाहिए। अगर सरकार हमेशा ही लोकलुभावन फैसले लेती रहेगी, तो देश की अर्थव्यवस्था कभी भी मजबूती से खड़ी नहीं हो पाएगी। जब इस पर यूपीए में शामिल तृणमूल और डीएमके ने दिखाने भर के लिए त्यौरियां चढ़ाई, तो प्रधानमंत्री ने तर्क दिया कि इससे मुद्रास्फीति में मात्र 0.64 फीसदी का इजाफा होगा। हद तो तब हो गई, जब मार्च के अंत में प्रधानमंत्री ने संसद में कहा कि वे नहीं चाहते की मुद्रास्फीति कम हो। मुद्रास्फीति ज्यादा होगी, तब ही देश का विकास होगा। सरकार के पास पैसा आएगा। यदि पैसा नहीं आया तो देश में गरीबों के उत्थान के लिए योजनाएं और कार्यक्रम नहीं चल पाएंगे। क्या यह तर्क भरोसे के लायक है? जब प्रधानमंत्री ने ही महंगाई को विकास के लिए अपरिहार्य बता दिया, तो उनके सिपहसालार तो इसे जायज ठहराते ही। उन्होंने तो यहां तक कह दिया कि यदि देश की अर्थव्यवस्था को 10 फीसदी की विकास दर से दौड़ाना है, तो लोगों को 100 रूपये किलो के हिसाब से दाल खानी ही होगी। इन दिग्गज अर्थशाçस्त्रयों ने यह तर्क भी दिया कि महंगाई के साथ-साथ लोगों की आमदनी भी बढ़ी है। छठे वेतन आयोग की सिफारिशों के लागू होने के बाद कर्मचारियों की जेबों में करीब 27 हजार करोड़ रूपये आए हैं। गांव और गरीब का तो विशेष रूप से ध्यान रखा गया है। महानरेगा के माध्यम से गांवों में 40 हजार करोड़ रूपये पहुंचे हैं। किसानों के 70 हजार करोड़ रूपये के ऋण माफ किए हैं। फिर महंगाई बढ़ने का फायदा किसानों को भी तो हो रहा है। जो किसान पांच साल पहले एक क्विंटल गेहूं को 500 रूपये में बेच रहा था, आज उसे इसके बदले 1300 रूपये मिल रहे हैं। महंगाई पर इन सब बहानों के बाद आखिर में सरकार अब मानसून पर अटक गई है। ऎसे में इस बार अच्छा मानसून देश के किसानों के लिए ही नहीं, बल्कि सरकार के लिए भी उतना ही जरूरी है। महंगाई के मुद्दे पर विपक्ष की नाकामी तो सरकार से भी बड़ी है। आम जरूरत की लगभग सभी चीजों के दाम आसमान छू रहे हैं, लेकिन विपक्ष की औकात सिर्फ इतनी सी रह गई है कि उसके पास संसद का बहिष्कार और एक दिन के भारत बंद के अलावा कुछ नहीं बचा है। महंगाई से जन-जन त्राहि-त्राहि कर रहा है, लेकिन इसके बावजूद विपक्षी पार्टियां इसे जन-आंदोलन का रूप देने में नाकाम रही हैं। आम आदमी को कोई राहत दिलाना तो दूर उल्टे उस पर बोझ ही लाद रही हैं। संसद का मानसून सत्र शुरू हुए चार दिन हो गए, लेकिन अब तक एक धेले का काम नहीं हुआ है। पता नहीं विपक्ष दल संसद में हंगामा कर किस तरह से महंगाई को कम करना चाहता है। क्या उन्हें पता नहीं है कि संसद की कार्यवाही बाधित होने से रोजाना लाखों रूपये का नुकसान हो रहा है? जहां तक बुद्धिजीवियों का सवाल है, महंगाई के मसले पर इनके दो वर्ग बन गए हैं। एक सरकार के विरोध में और दूसरा सरकार के समर्थन में है। जो तथाकथित बुद्धिजीवी सरकार का विरोध कर रहे हैं, उनका तरीका भी वैसा ही जैसा विपक्षी दलों का। वे सरकार को पानी पी-पीकर कोस तो रहे हैं, लेकिन यह शायद उन्हें भी नहीं पता कि महंगाई की वजह क्या है और इस पर लगाम कैसे लगाई जा सकती है। फिर भी इन्हें ज्यादा दोष नहीं दिया जा सकता, क्योंकि बुद्धिजीवियों का एक ऎसा बड़ा वर्ग हमेशा से रहा है, जो सरकार के विरोध में होता है। यहां आपत्तिजनक भूमिका में वे बुद्धिजीवी हैं, जो महंगाई के मुद्दे पर सरकार के साथ खड़े हैं। इनमें से ही कुछ ऎसे हैं, जो खुद को बड़ा अर्थशास्त्री बताते हैं। पिछले कुछ समय से ये सब महंगाई के पक्ष में एक बेहद खतरनाक तर्क पेश कर रहे हैं। इनका कहना है कि महानरेगा के कारण देश में महंगाई बढ़ी है। विदेशी संस्थानों में पढ़े-लिखे और पांच सितारा जीवन-शैली वाले इन विद्वानों को शायद पता नहीं है कि इसी महानरेगा ने देश को मंदी से बचा लिया। कोई बात नहीं आपने उन्हें इसका कोई श्रेय नहीं दिया, लेकिन कम से कम अब उन्हें व्यर्थ में बदनाम तो मत करिए। अवधेश आकोदिया
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