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Sunday, 05 September, 2010
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आस्था को जकड़ता पाखंड
Thursday, July 29, 2010, 11:42 hrs IST
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Opinion
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आषाढ़ की पूर्णिमा को पूरे देश में आध्यात्मिक भावना के प्रत्यक्ष प्रेरक के रूप में गुरू की पूजा की गई। गुरूओं, मठाधीशों और बाबाओं का पूजन वैदिक सनातन धर्म की सुदीर्घ परंपरा के अनुसार उनके भक्तों ने की। क्या कारण है कि हमारे देश में धर्म में शास्त्रों के माध्यम से उत्सवों का प्रवर्तन हुआ? ऎसा लगता है कि यहां ही शिष्य अपने गुरू को आदर देता है, उनका पूजन करता है। गुरू के माध्यम से ही अज्ञानरूपी अंधकार को मिटाने का प्रयास करता है, लेकिन बात यह है कि सारे संसार के लोग अज्ञान के निवारण के लिए निरंतर प्रयासरत हैं। हमारी संस्कृति अनादिकाल से गुरू का पूजन परमेश्वर के प्रतिनिधि के रूप में करती आ रही है।
गुरू व शिष्य की परंपरा के बारे में अब एक धूमिल-सी धारणा है। इसकी शास्त्रीय परंपरा जो भी रही हो, पर आम आदमी अब इसे एक रूढ़ी से ज्यादा नहीं मानता। गुरू परंपरा की यह अपनी समस्या है, जिसे अग्रणी संत हल करेंगे। यह जरूरी है कि इस परंपरा के बारे में भ्रम ना रहे। यह वैदिक काल से आज तक शिष्य व आचार्य की बिना क्रम टूटे एक गहरे संबंध की परंपरा है। भारत की धार्मिक, ऎतिहासिक व सांस्कृतिक जानकारियां इसी संबंध पर टिकी हुई हंै। पहले विद्या प्राप्ति का मुख्य साधन श्रवण था। इसीलिए अक्षय वैदिक साहित्य को श्रुति कहा जाता है। इस प्रक्रिया में सर्वाधिक महत्वपूर्ण गुरू ही होता था। संस्कृत के लाखों ग्रंथ इसी परंपरा से आज तक जीवित हंै। मगर अब किसी विद्वान से इसका इतिहास मत पूछिए। मतलब यह है कि इस परंपरा का इतिहास पूछने कि जरूरत नहीं है, क्योंकि यह सनातन है। ठीक उसी तरह जैसे सनातन धर्म है। भला कौन जानता है कि सनातन धर्म कब से है? इन्हीं दिनों भारतीय संन्यास परंपरा का चातुर्मास भी प्रारंभ हो गया है। चातुर्मास के लिए अपनी अलग आचार संहिता है। यह अनुष्ठान हमारी परंपरा का मिलन बिंदु है। उसे याद दिलाने के लिए स्वामी रामनरेशाचार्य पूरे देश में घूमकर इस वैदिक व पौराणिक महत्व के चातुर्मास की महिमा लोगों को समझा रहे हैं। आप जानते है कि वे रामानंद संप्रदाय के जगदगुरू हंै, पर उनके चातुर्मास का संबंध राजनीति से नहीं दिखता है। अगर ऎसा होता, तो उन्होंने इस बार सूरत को छोड़कर दिल्ली के आस-पास ही अपना डेरा डाला होता।
धार्मिक व आध्यात्मिक दुनिया में इन दिनों जिस तरह का वातावरण बना हुआ है और जो लोग इस वातावरण में सुनियोजित तरीके से अपनी स्वार्थ परायणता की सिद्धि में लगे हुए हैं, बेशक उनकी संख्या बहुत अधिक है। चारों और अज्ञान का सृजन करने वाले बरसाती कुकुरमुत्तों की भांति धार्मिक आतंकियों की बाढ़-सी आई हुई है। अज्ञान के संपूर्ण प्रत्यावर्तन के लिए ग्रहण की गई गुरू की शरणागति ही अधिकाधिक अज्ञान का निर्माण कर रही है। धन व प्रतिष्ठा की चाहत में इन धार्मिक नेताओं ने ऋषि-महर्षियों के बनाए सिद्धांतों से बहुत दूरी बना ली है। ईश्वर की प्राप्ति के लिए साधन के रूप में स्वीकार की गई गुरू की शरण न केवल ईश्वर से बहुत दूर ले जा रही है, बल्कि लोग अपने गुरूओं के चमत्कारों के झंडे और बैनरों में उलझकर धर्म से कोसों दूर भी जा रहे हैं। अनेक ऎसे स्वयंभू गुरूओं के नाम इन दिनों देखे व सुने जा सकते हंै, जो वैदिक शास्त्रों के ज्ञान से तो दूर अध्यात्म के वर्णन में सर्वाधिक प्रयुक्त संस्कृत के सामान्य ज्ञान से भी अनभिज्ञ है। वस्तुत: जो सही तरीके से अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा के संवर्धन में लगे रहते हैं, वे न केवल अपने लिए बल्कि समाज व राष्ट्र के लिए प्रेरणादायी व असंख्य लोगों के आकर्षण के केंद्र हो जाते हैं। इसके ठीक विपरीत जो गलत तरीके से भौतिकीय संसाधनों के विकास में लगे रहते हैं, वे अपने तथा धर्म के लिए कलंकभूत हो जाते हैं। ऎसे गुरूओं के भी लाखों शिष्य हैं। जरा सोचिए, उनका पारलौकिक जीवन क्या होगा? निश्चित रूप से ऎसे लोग वैदिक सनातन धर्म के धार्मिक आतंकवादी हैं, जिनका पूरा निदान चिंतनीय है।
माया का अपना खेल है और उसे समझने वाले उसमें कभी फंसते नहीं। फंस जाएं, तो गेरूए वस्त्र पहनने वाले भी फंस जाएं और न फंसे तो आध्यात्मिक भाव संपदा से बहुत कम जुड़ा आदमी भी बच सकता है। अधिकतर आधुनिक व्यावसायिक संतों ने गीता के अपने समझे ज्ञान से कितनों को प्रभावित या संतुष्ट किया, यह तो ठीक से किसी को पता नहीं है, पर ऎसा करते हुए उन्होंने अपने विशाल आर्थिक साम्राज्य को अवश्य खड़ा किया है। सीधी बात करें, तो माया के शिखर पर बैठकर माया से दूरी की बात की है। माया का शिखर न कभी बेदाग होता है और न कभी निरापद होता है। विशाल आश्रमों में सज्जन-दुर्जन, धर्मात्मा-दुरात्मा, नेता-प्रजा सबके लिए वातानुकुलित व्यवस्था होती है। जैसा भक्त वैसी बात। तय बात है कि जहां सांसारिक कार्य है, वहां राग-द्वेष और सम्मान-अपमान भी है। फिर धर्म ध्वजा उठाए ये संत कैसा नेतृत्व करते हैं, जहां ऊपरी तौर पर ही धर्म के अलावा सब कुछ दिखाई पड़ता है।
हमारे सभी ग्रंथों में भगवान के जो अवतार वर्णित हंै, वे सब सांसारिक कार्यो में सक्रियता के प्रतीक हैं। उनमें कहीं न कहीं योद्धा का रूप दिखाई पड़ता है। कहीं वे दशानन रावण के अत्याचार से वेद धर्म को बचाते हैं, कहीं कपटी दुर्योधन के लिए अर्जुन को रथी व स्वयं सारथी बनते हैं। सामाजिक संकटों के निवारण के लिए ईश्वर भी सदैव तत्पर हैं। उसी नाते ईश्वर के प्रतिनिधि होने से संत भी सामाजिक समस्याओं के समाधान में शामिल हों, पर ऎसा कहीं नहीं दिखता। जहां दिखता है, वहां अर्थ व सामथ्र्य का अभाव है। जहां पैसा व ताकत है, वहां घोर कुंभकर्णी निद्रा है। हिंदू धर्म के सामान्य मुद्दे भी इन गुरूओं की आत्मा को स्पंदित नहीं कर पा रहे। गंगा की सफाई, गौ हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध, संस्कृत की गंभीर स्थिति के साथ ही हिंदूविहीन कश्मीर इन गुरूओं की दृष्टि से पूरी तरह ओझल है। अपने-अपने झंडे, अपने-अपने पद। अभी कुंभ में लोग पैसे के बदले उपाधियां लेने में लगे रहे। जगदगुरू, महामंडलेश्वर, मंडलेश्वर, महंत न जाने क्या-क्या! अपने कीर्तिस्तंभ खड़े करने व किसी भी तरह से धन एकत्रित करने की हरकते। बाद में अपने चेलों से अपनी बड़ाई में बैनर। साथ ही, मीडिया में बड़ी हेडलाइन में अपना नाम। अभिनंदन, बधाइयां और सम्मान समारोह। ये लोग उस सोए हुए हिंदू समाज की थक-टूट चुकी दृष्टिविहीन हताशा से उपजते हंै, जिनके पास कहने को बस एक लाइन है कि क्या करें, आजकल ऎसे ही चलता है! वे कौन हैं, जो धर्म के लिए रात-दिन गांव व ढाणियों में काम करते हैं? उनको तो धर्म का ज्ञान ही नहीं है, यह कहकर ये श्वेत-भगवा वस्त्रधारी दशाननी अट्टहास करते चमचमाते कैमरों के सामने माला पहनते दिखाई पड़ते हैं। खुद ने धर्म को सिर्फ लूटा, दिया कुछ नहीं। न ज्ञान, न विज्ञान। केवल चेलों व आश्रमों पर दृष्टि। गंदे मंदिर, टूटते धर्मस्थान। समाप्त होती संस्कृत के शास्त्रों की लंबी परंपरा। धर्म केवल मुंह छिपाने की या अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने की जगह मात्र नहीं है। काया में प्राण हैं, तो अहर्निश धर्म के लिए खड़ा होना पडेगा, वरना तो सिवाय अभिनय के ओर कुछ नहीं है।
जहां से धर्म गायब होता है, वहीं से पाखंड शुरू होता है। ये सब पाखंडी धर्म पर चोट करते हैं। धर्म के इन नाटककारों व राजनीति के नेताओं मे क्या फर्क है? दोनों ही भारत और भारतीयता पर चोट करते हैं और धन इकटे करने के अपने निर्धारित लक्ष्य पर चलते हैं। अत: आवश्यकता अपने भीतर छिपे पाखंड से लड़ने की है। उसी कठोरता व निर्ममता के साथ प्रहार करना होगा, जो कभी धर्म व अधर्म को न जानने वाले कौरवों पर कुरूक्षेत्र में भीम और अर्जुन ने किया था। प्रहार करने से भागने पर पांचजन्य की ध्वनि फंूककर श्रीकृष्ण ने अर्जुन का आह्वान करते हुए कहा था कि यदि तुम धर्म की रक्षा के लिए पाखंड के संपूर्ण विनाश हेतु इस युद्ध को नहीं लड़ोगे, तो हमेशा अपनी कीर्ति व धर्म की हत्या करने वाले पापी कहलाओगे।
शास्त्री कोसलेन्द्रदास
(लेखक संस्कृत विद्वान हैं)
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