आज से संसद का मानसून सत्र शुरू हो रहा है। जहां भाजपा ने महंगाई के मुद्दे पर सरकार को घेरने की पूरी तैयारी कर रखी है, वहीं कांग्रेस हिंदू आतंकवाद के मुद्दे पर विपक्ष को विभाजित करना चाहती है। जब से आतंकवाद के साथ "हिंदू" शब्द जुड़ा है, देश की राजनीति में एक नए तरह का उबाल आया हुआ हैै। आतंकी किसी धर्म की पैदाइश नहीं हो सकते, लेकिन दुर्भाग्य से इसे धर्म से जोड़ा जा रहा है। इस दिशा में नित नए खुलासे हो रहे हैं और संघ परिवार अपनी तरफ से प्रतिरोध भी (एक न्यूज चैनल के दफ्तर में तोड़ फोड़ कर) जता चुका है। मंहगाई के मुद्दे पर मनमोहन सिंह सरकार को घेरने वाली भाजपा, मानसून सत्र में फिर विपक्ष को एक कर सरकार को संसद में घेरने की तैयारी कर ही रही थी कि अचानक उसे बैकफुट पर आना पड़ा है। पिछले कुछ दिनों में संघ से जुड़े पदाधिकारियों के नाम कथित तौर हिंदू आतंकवाद से जुड़े हैं। इस पर राम माधव तक को कहना पड़ा है कि हिंदू आंतकवाद से संघ से कोई सदस्य जुड़ा हुआ नहीं है। अजमेर की दरगाह और हैदराबाद की मक्का मस्जिद में हुए बम विस्फोट में संघ से जुड़े एक प्रांत प्रचारक अशोक वाष्र्णेय की अरूण जेटली से मुलाकात को भाजपा एक वकील और मिलने आने वाले सैकड़ों लोगों में से एक मुलाकात की संज्ञा देने पर जोर दे रही है। पता चला है कि संघ की पिछले दिनों जोधपुर में हुई कार्यकारी मंडल की बैठक में यही मुद्दा छाया रहा। अयोध्या में विश्व हिंदू परिषद और राम मंदिर निर्माण से जुड़े मार्गदर्शक मंडल की बैठक में भी चर्चा का केंद्र बिंदु यही विषय रहा। आरएसएस, बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद के बीच भी सहमति बनी कि अगर सीबीआई हिंदू आंतकवाद से संघ परिवार के सदस्यों को इसी तरह जोड़ती रही तो उसका सियासी तोड़ क्या और कैसे निकाला जाए। बताया जा रहा है इसके बाद ही संघ और भाजपा के बड़े पदाधिकारियों के बीच बैठक हुई है और इसमें कांग्रेस की सीबीआई को आगे रखकर हिंदू आंतकवाद से संघ परिवार को जोड़ने की कथित रणनीति की काट निकाले जाने पर चर्चा हुई। संघ को लगता है इस मुद्दे पर राष्ट्रीय स्तर पर कोई देशव्यापी आंदोलन चलाने की जरूरत पेश आई तो ये काम भाजपा के नेतृत्व में ही किया जा सकता है। सीबीआई इस समय देश के चार अलग-अलग राज्यों में हुए विस्फोटो की जांच में लगी है, जिसमें कथित हिंदू आतंकवाद का हाथ बताया जा रहा है। महाराष्ट्र के मालेगांव में 8 सितंबर 2006 को एक मस्जिद के बाहर हुए विस्फोट में 37 लोग मारे गए थे और करीब सवा सौ घायल हुए थे। 18 फरवरी 2007 को समझौता एक्सप्रेस में हरियाणा में विस्फोट हुआ था, जिसमें 68 लोग मारे गये थे। इसी साल 11 अक्टूबर को अजमेर में ख्वाजा साहब की दरगाह में रोजा खोलने के दौरान बम फटा था, जिसमें तीन लोग मारे गए थे। सात दिन बाद ही हैदराबाद की मक्का मस्जिद में सेल फोन की मदद से हुए विस्फोट में चौदह लोगों की जान गई थी। पिछले साल गोवा में एक स्कूटर में लाए जा रहे विस्फोट फटने से एक कथित हिंदूवादी संगठन से जुड़े दोनों स्कूटर सवार मारे गए थे। समझौता एक्सप्रेस मामले में सेना के रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत प्रसाद पुरोहित, मालेगांव में प्रज्ञा सिंह ठाकुर और राजेश धवादे और अजमेर ब्लास्ट में देवेन्द्र गुप्ता, लोकेश शर्मा, चंद्रशेखर और अशोक वाष्र्णेय का नाम प्रमुख रूप से सामने आ रहा है। सीबीआई सूत्रों के अनुसार ये सभी लोग किसी न किसी हिंदूवादी संगठन या फिर संघ परिवार से जुड़े रहे हैं। यही खुलासा संघ परिवार को परेशानी में डाल रहा है। विश्व हिंदू परिषद से जुड़े कानपुर के एक व्यक्ति और अयोध्या के साधु से नेता बने एक शख्स का नाम भी सामने आ रहा है। इसके आलावा कुछ ऎसे भी संघ परिवार से जुड़े व्यक्ति हैं, जो अजमेर, मालेगांव और हैदराबाद के बम विस्फोटों में लिप्त लोगों को ठहराने या फिर पैसों की मदद करते रहे हैं। सीबीआई की जांच तेजी से आगे बढ़ने और पकड़े गए व्यक्तियों से पूछताछ में नए लोगों पर शक का घेरा कसने से भी संघ परिवार सकते में है। यह सही है कि इनमें से कुछ कभी संघ से सीधे तौर पर जूनियर स्तर पर जुड़े हुए थे और अब अभिनव भारत या किसी अन्य संगठन के अंग हैं। लिहाजा इनसे तो संघ पल्ला झाड़ सकता है, लेकिन खुद को सीबीआई से क्लीन चिट दिलवाने में पापड़ बेलने पड़ सकते हैं। वैसे भाजपा समेत संघ परिवार सीबीआई की जांच में अचानक आई तेजी से हैरत में है। इसके पीछे ही कांग्रेस की नई रणनीति पर शक जा रहा है। नांदेड़ में 2006 में एक घर में हुए विस्फोट के सिलसिले में खुफिया विभाग के एक रिटायर्ड अधिकारी का नाम सामने आया था, जिस पर बजरंग दल के कार्यकर्ताओं को बम बनाने की ट्रेनिंग देने का आरोप लगा था। सीबीआई आज तक उस अधिकारी को पकड़ नहीं सकी है। इसी तरह हैदराबाद के मक्का मस्जिद ब्लास्ट में पहले कुछ मुसलमानों को पकड़ा गया और फिर सुनील जोशी, संदीप डांगे और रामचंद्र कलसांगरा के नाम सामने आए। सुनील की हत्या हो गई और बाकी दो फरार हैं। अब पुलिस खामोश है। मालेगांव ब्लास्ट के मुख्य आरोपी पुरोहित और साध्वी प्रज्ञा का मामला भी कानूनी पचड़ों में उलझा हुआ है। कुछ मुस्लिम संगठनों ने तो आरोप लगाया है कि पुलिस हो या सीबीआई दोनों ही हिंदूवादी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई में जानबूझकर देरी कर रही हैं। अजमेर ब्लास्ट में गिरफ्तार लोगों से पूछताछ में कथित रूप से संघ से सक्रिय रूप से जुड़े अशोक बेरी और अशोक वाष्र्णेय के नाम सामने आए हैं। हैरत की बात है जब तक सीबीआई हवा में हाथ पैर मार रही थी, तब तक संघ के मोहन भागवत से लेकर भाजपा के तमाम बड़े नेता कह रहे हैं कि आतंकवाद तो सिर्फ आतंकवाद होता है और कानून को अपना काम करना चाहिए। अब नामों के सामने आने पर भी दोनों अपने शब्दों पर कायम तो हैं, लेकिन अब साथ में लेकिन-किंतु-परंतु लगाने लगे हैं। भाजपा के सामने ऊहापोह की स्थिति है। वह सीबीआई पर कांग्रेस के इशारे पर काम करने का आरोप तो आसानी से लगा सकती है। वह कांग्रेस पर वोट की राजनीति करने का भी आरोप जड़ सकती है, लेकिन मामले कोर्ट में चलेंगे, जहां सबूतों को ही आधार बनाकर अदालत आगे की कार्रवाई करेगी। अगर अदालत में फैसले संघ परिवार के खिलाफ गए तो भाजपा को एक राष्ट्रीय पार्टी के तौर पर प्रतिक्रिया देने से पहले सोचना होगा। हिंदू संगठनों को भाजपा मझधार में भी नहीं छोड़ सकती। अगर बम विस्फोट में आरोपी किसी सदस्य ने भाजपा से कानूनी मदद मांगी तो फिर भाजपा का पक्ष क्या होगा? साल के अंत में बिहार और अगले साल पश्चिम बंगाल में चुनाव होने हैं, जहां मुस्लिम वोट ठीक तादाद में हैं। बिहार में नीतीश कुमार मुस्लिम वोटों पर पकड़ बनाने में लगे हैं। ऎसे में भाजपा का एक भी बयान दोनों के रिश्तों में नई दरार डाल सकता है। कुल मिलाकर संघ हो या भाजपा दोनों ही हर तरह के आतंकवाद को विरोध करने की नीति पर कायम हैं, लेकिन घर को लोगों के फंसने का डर उसे सता रहा है। कांग्रेस की बात करें तो उसकी इस पूरे मसले से बल्ले-बल्ले हो गई है। बैठे बिठाए उसे एक ऎसा मुद्दा मिल गया है, जिस पर उसे कुछ कह बिना ही सियासी फायदा हो रहा है। उसे कथित धर्मनिरपेक्ष ताकतों को एक कर भाजपा को अलग-थलग करने का मौका मिला है। आज से संसद का मानसून सत्र शुरू हो रहा है और कांग्रेस को लग रहा है कि महंगाई के मुद्दे पर एक हुए विपक्ष को हिंदू आतंकवाद के मुद्दे पर आसानी से विभाजित कर दिया जाएगा। भाजपा सवाल उठा रही है कि सीबीआई जानबूझकर खबरें लीक कर रही है और वास्तव में उसके पास अगर तथ्य हैं तो उन्हें अदालत के सामने रखा जाना चाहिए, लेकिन उसकी इस दलील का फिलहाल कोई खरीददार नहीं है। विजय विद्रोही (लेखक स्टार न्यूज के कार्यकारी संपादक हैं)
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