जब देश के प्रधानमंत्री का खाना ही मिलावट से नहीं बचा है, तो यह अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है कि आम आदमी कितनी शुद्ध चीजों का उपभोग कर रहा होगा। वर्तमान में मिलावट का कारोबार खतरनाक स्तर पर जा पहुंचा है। शायद ही कोई चीज ऎसी हो, जिसके बारे में यह दावा किया जा सके कि वह पूरी तरह से शुद्ध है। मिलावट पर अंकुश लगाना मूल रूप से राज्य का विषय है, लेकिन सरकारें इसमें सफल नहीं हो रही हैं। मिलावटखोर बखौफ होकर अपना कारोबार कर रहे हैं और सरकार कुछ नहीं कर पा रही है। शासन की यह विवशता दुर्भाग्यजनक है। खाद्य पदार्थोü में मिलावट तो हमारे देश में तब से चल रही है, जब से व्यापारियों को मुनाफे का चस्का लगा है, लेकिन अब यह मर्ज सर्वत्र फैल गया है। ज्यादा परेशानी की बात यह है कि आजकल मिलावट के लिए जिन चीजों का इस्तेमाल किया जा रहा है, वे हमारे स्वास्थ्य के लिए बेहद नुकसानदायक हैं। मावे में यूरिया और आलू, तो मिठाइयों में अरारोट व केमिकल वाले रंगों का धड़ल्ले से इस्तेमाल किया जाता है। हल्दी में मक्के का पाउडर, पीला रंग और चावल की कनकी मिलाई जा रही है। मिर्च में लाल रंग, फटकी, चावल की भूसी मिली होती है। धनिये में हरा रंग और धनिए की सींक का मेल है। अमचूर में अरारोट, कैंथ और चावल की कनकी मिली होती है। गरम मसाला के साथ लौंग की लकड़ी को पीसा जा रहा है। किशमिश में हरा रंग और गंधक का धुआं मिल रहा है। सरसों तेल में राइस ब्रान ऑयल की मिलावट है, तो घी में बटर ऑइल, वनस्पति और रिफाइंड तेल मिला होता है। और तो और जिन सब्जियों को हम बड़े चाव से यह सोचकर खाते हैं कि ये तो पूरी तरह से शुद्ध हंै और इनमें तो मिलावट की कहीं कोई गुंजाइश ही नहीं है, वे भी शुद्ध नहीं हैं। सब्जियों को वक्त से पहले बड़ा करने के लिए उनमें ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन लगाए जा रहे हैं। इन सबका हमारी सेहत पर क्या असर पड़ता होगा, इसका अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है। मिलावट के गोरखधंधे में सारी हदें तब पार हो गई, जब लोग दवाइयों में भी मिलावट करने लगे। भारत में नकली दवाओं का कारोबार बेहद खतरनाक ढंग से बढ़ता जा रहा है। पहले यह लाइफस्टाइल दवाओं और सर्दी-जुकाम-बुखार की पारंपरिक दवाओं तक सीमित था, लेकिन पिछले कुछ वर्षो से नकली जीवनरक्षक दवाएं भी बाजार में आने लगी हैं। आज देश के 85,000 करोड़ रूपये के दवा उद्योग में 20 से 25 फीसदी नकली दवाओं की उपस्थिति मानी जाती है। यानी हर चौथी या पांचवी दवा नकली बिक रही है। दूसरे, इससे विश्व बाजार में भारत की प्रतिष्ठा को धक्का लग रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट में दुनिया भर में सप्लाई होने वाली नकली दवाओं में से 85 फीसदी का कारोबार भारत में बताया गया था। किसी भी अन्य उत्पाद की नकल संभवत: उतनी खतरनाक नहीं है, जितनी दवाओं की, क्योंकि यह जीवन रक्षा की उम्मीद में दवा लेने वाले मरीज से उसका जीवन छीन सकती हैं। जीवन रक्षक दवाओं के नाम पर मौत बांटना मानवता के प्रति जघन्य अपराध है। इसके बावजूद नकली दवाओं का कारोबार फल-फूल रहा है तो इसीलिए कि कुछ लोगों ने जीवन और मानवता की बुनियादी नैतिकता को लोभ और मुनाफे के उद्योग में तब्दील कर लिया है। भारत जैसे देश में मिलावट और नकल का कारोबार इतनी जटिलताओं के साथ फैल रहा है कि इसकी वजह से सरकारें इसे कानून के कठघरे में लाने में कामयाब नहीं हो पा रही हैं। मसलन दवाइयों में हो रही मिलावट की ही बात करें, तो देशभर में फैली करीब छह लाख दवा की दुकानों पर नजर रख पाना आसान नहीं है। इसीलिए सरकार जनसाधारण की मदद चाहती है। यही बाकी वस्तुओं और उत्पादों में हो रही मिलावट के बारे में भी है। जनता जागरूक हो जाए, तो इस गोरखधंधे पर लगाम लगाई जा सकती है। मिलावट की पहचान करने के तरीकों को जानने के साथ ही लोगों को इसका पता चलने पर संबंधित विभाग से शिकायत करनी चाहिए। इसके बाद कार्रवाई की जानकारी भी लेनी चाहिए। राज्य सरकारों को यह देखना होगा कि दुकानों से नमूने उठाने की कार्रवाई हर साल की जाती है, मिलावटखोरी साबित भी होती है। फिर भी मुनाफाखोर बाज क्यों नहीं आते? डॉ. सी.पी.ठाकुर (लेखक पूर्व केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हैं) सख्ती से ही हमें मिलेगी सुरक्षा उत्तर प्रदेश की एक फास्ट ट्रैक अदालत ने पिछले दिनों मिलावटी दूध बेचने वाले एक व्यक्ति को दस साल का कारावास और आर्थिक जुर्माने की सजा सुनाई है। खाद्य पदार्थोü में मिलावट के जरिए लोगों के जीवन के साथ खिलवाड़ कर रहे तत्वों के खिलाफ ऎसी ही कड़ी कार्रवाई अपेक्षित है। अदालत का यह फैसला इसलिए और अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि हाल के वर्षो में ऎसे दो-तीन उदाहरण ही सामने आए हैं, जिनमें मिलावट करने वाले लोगों को दंडित किया गया हो। जहां तक मुझे याद है किसी मिलावटखोर को अब तक मिली यह सबसे बड़ी सजा है। यदि हमें मिलावट के कारोबार पर अंकुश लगाना है, तो ऎसे ही सख्त फैसले लेने होंगे। ऎसा नहीं है कि मिलावट की रोकथाम के लिए हमारे यहां काूनन नहीं है, लेकिन कुछ तो लोगों के कम जागरूक होने और कुछ सरकारी स्तर पर सक्रियता में कमी के चलते मिलावट करने वालों के हौसले बुलंद हैं। सरकारी मशीनरी की चुस्ती का आलम यह है कि उन्हें कभी-कभार ही मिलावट की याद आती है। सालभर सोने वाले विभाग एकाध बार आंखें मलते हुए उठते हैं और खानापूर्ति के नाम पर अभियान चलाने के लिए सक्रिय हो जाते हैं। अभियानों की हकीकत भी आंखें खोलने वाली है। विभागों के पास न अस्त्र है और न ही शस्त्र, बस खाली हाथ दिलासा दे रहे हैं। अभियानों के नाम पर सैंपल लिए जाते हैं, लेकिन इन सैंपल का क्या होता है, कोई नहीं जानता। सैंपलों की जांच के लिए देश के ज्यादातर राज्यों में एक अदद लैब तक नहीं है। यही नहीं, नियमित मोनीटरिंग के लिए सरकारी महकमों के पास पर्याप्त स्टाफ भी नहीं है। सैंपल दूसरी जगह भेजे जाते हैं, तो वहां से रिपोर्ट आने में महीने बीत जाते हैं। इस दौरान मिलावट करने वाले बचने के न जाने कितने रास्ते तलाश लेते हैं। इन हालात में जनस्वास्थ्य रामभरोसे ही है। ऎसा नहीं है कि मिलावट करने वालों के खिलाफ सरकार सक्रियता नहीं दिखाती है। बाकायदा अभियान चलाए जाते हैं। मिलावट करने वाले व्यापारियों पर कार्रवाई की जाती है। माल जब्त किया जाता है और सैंपल लिए जाते हैं, लेकिन दुर्भाग्य से कुछ दिन बाद ही यह सजगता स्वत: ही समाप्त हो जाती है और मिलावट का धंधा पहले की तरह चलने लगता है। शायद यही कारण है कि मिलावट के घिनौने कारोबार पर अंकुश लगना तो दूर रहा, वह दिन-प्रतिदिन फलता-फूलता जा रहा है। चूंकि मिलावटखोरों को दंडित नहीं किया जा रहा, इसलिए उन तत्वों का दुस्साहस बढ़ता ही जा रहा है, जो खाने-पीने की चीजों में गड़बड़ी करने में लगे हैं। अब तो खाने-पीने की शायद ही कोई ऎसी वस्तु हो, जिसमें मिलावट न की जा रही हो। हैरत की बात तो यह है कि मिलावट का यह धंधा शासन-प्रशासन की नाक के नीचे यानी प्रदेश की राजधानियों में भी उसी तरह चल रहा है जैसा कि देश के अन्य स्थानों पर। मिलावट पर अंकुश के लिए न केवल सरकार को गंभीर होना होगा, बल्कि विभागों को भी ईमानदारी से सक्रियता दिखानी होगी। साथ ही संबंधित विभाग को इस पर भी सोचना चाहिए कि मिलावट रोकना केवल अभियानों से ही संभव नहीं है। सतत निगरानी की एक सुचारू व्यवस्था बनानी होगी, तभी हम कुछ कामयाबी हासिल कर पाएंगे। अब जरूरत है कि सालभर अभियान चलाकर मिलावटखोरों पर नकेल कसी जाए। अभियानों को महज औपचारिकता के तौर पर संचालित नहीं किया जाना चाहिए। इन अभियानों की भी सार्थकता तभी सिद्ध हो पाएगी, जब इनमें जनभागीदारी सुनिश्चित की जाएगी। जिन प्रदेशों में सैंपल जांच के लिए लैब नहीं हैं, वहां इन्हें शीघ्र खोला जाना चाहिए। इसके अलावा जिम्मेदार महकमों को भी जनस्वास्थ्य का अहसास करना होगा, तभी मिलावट के महादानव से मुक्ति मिल सकती है। आवश्यक केवल यही नहीं है कि मिलावट के धंधे में लिप्त तत्वों की धरपकड़ के लिए सघन अभियान छेड़ा जाए अथवा इस घिनौने कारोबार में लगे लोगों की सतत निगरानी की जाए, बल्कि यह भी है कि उन्हें यथाशीघ्र दंड दिलाने की हरसंभव कोशिश की जाए। वस्तुत: यही वह तरीका है, जिससे उन तत्वों पर अंकुश लगाया जा सकता है, जो चंद पैसों के लालच में लोगों को बीमारियां और मौत बेचने का घिनौना कृत्य कर रहे हैं। जस्टिस डी.पी. वधवा (लेखक एनसीडीआरसी के अध्यक्ष रहे हैं)
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