जटिल द्विपक्षीय संबंधों वाले भारत पाकिस्तान-चीन त्रिकोण के बीच वार्ताओं का दौर अचानक तेजी पकड़ रहा है। परमाणु आपूर्ति समूह की सहमति के बिना ही चीन द्वारा पाकिस्तान को अतिरिक्त परमाणु रिएक्टरों की आपूर्ति किए जाने के प्रस्ताव ने दुनिया के कई देशों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। भारत और पाकिस्तान के बीच जटिल और कटु संबंध नवंबर 2008 में मुंबई हमले से और बिगड़ गए हैं। फिलहाल चल रही उच्च स्तरीय राजनीतिक गतिविधियों से इनमें सुधार की प्रक्रिया शुरू होती नजर आ रही है। कृष्णा-कुरैशी वार्ता में आए गतिरोध के बाद भी इस दिशा में काफी तरक्की हुई है। दोनों विदेश मंत्रियों के बीच बातचीत से पहले इस्लामाबाद में आयोजित सार्क देशों के गृह मंत्रियों की बैठक के दौरान 25-26 जून को भारत के गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने पाकिस्तानी समकक्ष रहमान मलिक से मुलाकात की थी। मुख्य रूप से यह वार्ता आतंकवाद पर केंद्रित रही। इसके साथ-साथ भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन 3 से 6 जुलाई को बीजिंग दौरे पर रहे। दिलचस्प बात यह है कि पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी भी 6 जुलाई को चीन की यात्रा पर बीजिंग पहुंचे थे। दक्षिण एशिया के प्रमुख देशों की नियमित बैठकें बराबर चल रही हैं। भारतीय परिप्रेक्ष्य में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के चीन दौरे की तारीखें जरदारी के दौरे से टकराने के अपने निहितार्थ हैं। चीनी मीडिया के अनुसार चीन में मेनन की यात्रा को सकारात्मक सावधानी के तौर पर लिया गया। 5 जुलाई की रिपोर्ट के अनुसार चीनी प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ ने चीन के सामरिक साझेदार के तौर पर भारत की अहमियत को रेखांकित किया। इसके अलावा वेन ने यह भी कहा कि वह भारत के साथ मिलकर काम करेंगे और एक-दूसरे के हितों और प्रमुख चिंताओं का ध्यान रखेंगे। वेन द्वारा इन शब्दों के चुनाव से नए समीकरण उभरते हैं। इससे भारत का ध्यान चीन की ओर खिंचता है, खासकर पाकिस्तान के संदर्भ में। जरदारी की यात्रा का मकसद विशेष दर्जा था। इस पर भी ध्यान देना जरूरी है कि जरदारी यात्रा के बाद चीन से जारी आधिकारिक रिपोर्टो में पाकिस्तान के परमाणु रिएक्टरों का कहीं सीधा उल्लेख नहीं मिलता। चीनी राष्ट्रपति हू जिनताओ ने कहा, चीन पाकिस्तान का मित्र और सामरिक साझेदार है, जो वहां स्थिरता और आर्थिक प्रगति के लिए समर्पित है। राष्ट्रपति जरदारी ने भावुक उद्बोधन में चीन को पाकिस्तान की ताकत बताया। जहां तक भारत का संबंध है, तो इस बयान की विवेचना कई रूपों में की जा सकती है। भारत-पाक के कटु द्विपक्षीय संबंधों के संदर्भ में चिदंबरम-मलिक के बीच जून बैठक में सद्भाव रिसता नजर आया। कुछ दिन पहले कृष्णा-कुरैशी वार्ता को भी पूरी तरह से असफल नहीं कहा जा सकता है। कुरैशी के मीडिया को दिए बयानों को अलग कर दिया जाए, तो इस वार्ता से वह सब हासिल हुआ, जिसकी उम्मीद की जा रही थी। दोनों दक्षिण एशियाई पड़ोसियों के बीच द्विपक्षीय वार्ता में सीमा विवाद की अनदेखी नहीं की जा सकती। इस संदर्भ में चीन की प्रतिक्रिया बहुत महत्वपूर्ण रही। 1998 में भारत और पाकिस्तान के परमाणु दर्जे के बाद 1999 में कारगिल में पाकिस्तान की दुस्साहसिक हरकत के बावजूद दोनों देशों ने आधिकारिक तौर पर वार्ताएं जारी रखीं। हालांकि इसकी संभावना नहीं है कि केंद्रीय मुद्दे पर दोनों पड़ोसी किसी नतीजे पर पहुंच सकते हैं, जो दोनों तरफ की राजनीति और नीति निर्माताओं की ढाल बना हुआ है। दोनों देश इन्हेे नहीं छोड़ना चाहते। भारत के लिए केंद्रीय मुद्दा आतंकवाद और पाकिस्तानी प्रतिष्ठान द्वारा इसे दिया जा रहा प्रोत्साहन है। यह जनवरी 2004 में भारत-पाकिस्तान के बीच हुई समग्र संधि का केंद्र बिंदु था। तब जनरल मुशर्रफ ने वचन दिया था कि पाकिस्तान आतंकी कार्रवाइयों को सहयोग नहीं देगा। नवंबर 2008 में मुंबई हमले के बाद दिल्ली में वर्तमान सरकार पर इस बात का दबाव है कि वह हमले के पीडितों को त्वरित न्याय दिलाए और पाकिस्तान से आतंकवाद और मजहबी कट्टरता को मिलने वाले समर्थन पर अंकुश लगाए। चिदंबरम ने विनम्रता और दृढ़ता से इस मुद्दे को उठाया। कृष्णा से भी उम्मीद की जा रही है कि वह भी इसी मुद्दे पर जोर देंगे। भारत ने पाकिस्तान के परमाणु हथियारों और इस संबंध में चीन से मिलने वाले सहयोग पर कभी सवाल नहीं उठाया। भारत की चिंता का विषय मई 1990 के बाद आतंकवाद और सीमा पार से इसे मिलने वाला समर्थन रहा है, जिसकी वजह से कश्मीर में हिंसक घटनाओं में वृद्धि हुई। इसके अलावा पाकिस्तानी सेना ने अपनी परमाणु क्षमताओं का इस्तेमाल भारत के खिलाफ एजेंडे के तौर पर किया। पाकिस्तानी सेना ने जम्मू-कश्मीर में आतंक और मजहबी कट्टरता फैलाई और ताकत के बल पर सीमाओं को बदलने का प्रयास किया। इसी का नतीजा था मई 1999 में कारगिल दुस्साहस। इस संबंध में यह स्मरण जरूरी है कि 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान चीन ने तटस्थता का व्यवहार बनाए रखा और भारत के खिलाफ सैन्य दबाव बनाने का प्रयास नहीं किया। दूसरी ओर अमेरिका ने दो परमाणु हथियारों से लैस पड़ोसियों के बीच तनावपूर्ण संधि की मध्यस्थता की। इस पृष्ठभूमि में पाकिस्तान के साथ वार्ता के लिए इच्छुक भारत को अपना ध्यान इस मूल विषय पर केंद्रित रखना चाहिए कि जुलाई 2011 में अफगानिस्तान से अमेरिकी फौजों की विदाई के बाद पाकिस्तान सामरिक लाभ हासिल करने के लिए लश्करे-तैयबा जैसे आतंकी समूहों में अपना निवेश करना बंद करे और भारत व अफगानिस्तान के खिलाफ आतंकी हमलों की कमान न संभाले। अफगानिस्तान में अशांति की पृष्ठभूमि में अमेरिका व नाटो सेना द्वारा अपने विकल्पों पर पुनर्विचार करने की घोषणा भारत, पाकिस्तान और चीन के लिए बहुत अहमियत रखती है। यह भी उल्लेखनीय है कि चीन भी कुछ राज्यों में मजहबी कट्टरता को लेकर चिंतित है। जुलाई के शुरू में हू जिनताओ-आसिफ अली जरदारी वार्ता में यह मुद्दा भी उठाया गया था। आसिफ अली जरदारी चीन को तो आश्वस्त कर सकते हैं, लेकिन जनरल कियानी पाकिस्तानी सेना की इस सोच को नहीं बदल सकते कि पाकिस्तान के लिए भारत एक बड़ा खतरा है। इसलिए वह लश्करे-तैयबा जैसे आतंकी समूहों पर वार करना नहीं चाहेंगे। भारत की ओर से वार्ता के दौरान कितनी भी कोशिश की जाए, यह संभव नहीं लगता कि इस्लामाबाद में सरकार-सैन्य गठजोड़ आतंकवाद के मुद्दे पर अपनी धारणा में कोई बदलाव लाएगा। न ही यह उम्मीद की जा सकती है कि भारत को पाकिस्तान के लिए सबसे बड़े खतरे के रूप में देखने के अपने दुराग्रह में परिवर्तन करेगा। लाहौर दाता दरबार मस्जिद में हुए हमले के बावजूद पाकिस्तान अपने संकीर्ण हितों की पूर्ति के लिए प्रयास करता रहेगा। शायद चीन ही अकेला ऎसा देश है, जो पाकिस्तान को रास्ते पर ला सकता है, लेकिन इससे सर्वाधिक लाभ भारत और अमेरिका को होगा। इसलिए ऎसा प्रतीत नहीं होता कि चीन इस दिशा में कोई कदम उठाएगा। सी. उदयभास्कर (लेखक सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं)
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