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विशिष्टता पर आया संकट
Thursday, July 22, 2010, 11:51 hrs IST
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प्रवेश परीक्षा को लेकर जवाहर नवोदय विद्यालय समिति तथा राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग आमने-सामने हैं। जवाहर नवोदय विद्यालय, केन्द्रीय विद्यालय तथा सैनिक स्कूल जैसे विशिष्ट सरकारी स्कूलों सहित सभी प्रकार के सरकारी अथवा प्राइवेट विद्यालय नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा कानून के दायरे में आते हैं। कानून में स्पष्ट प्रावधान है कि आठवीं कक्षा तक दाखिले के लिए किसी प्रकार की परीक्षा नहीं ली जा सकती है। इसलिए आयोग चाहता है कि नवोदय विद्यालय समिति कक्षा छह के लिए आयोजित की गई प्रवेश परीक्षा निरस्त कर कानून के प्रावधानों के मुताबिक प्रवेश प्रक्रिया अपनाए, लेकिन नवोदय विद्यालय समिति इसके लिए तैयार नहीं है।
नवोदय विद्यालय समिति ने आयोग के नोटिस के भेजे जवाब में साफ लिखा- "नवोदय विद्यालयों में दाखिले की इस प्रक्रिया में बदलाव संभव ही नहीं है, क्योंकि 75 प्रतिशत ग्रामीण और 25 प्रतिशत शहरी बच्चों की दर्जनभर अलग-अलग श्रेणियों के तहत नवोदय विद्यालयों में छठी कक्षा में होने वाले इन दाखिलों के लिए प्रवेश परीक्षा के अलावा दूसरा रास्ता अख्तियार ही नहीं किया जा सकता। एक सीट के लिए औसतन 42 आवेदक होते हैं। इन स्कूलों की स्थापना का उद्देश्य सभी समुदायों के प्रतिभाशाली बच्चों को सामान्य पढ़ाई से अलग गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मुहैया कराना है। ऎसे में यह संभव ही नहीं है कि नवोदय विद्यालयों में दाखिले के लिए आवेदकों में से औचक चयन किया जाए, जैसा कि शिक्षा का अधिकार कानून में प्रावधान है।" यही नहीं, समिति के आयुक्त ने तो मानव संसाधन मंत्रालय को बाकायदा पत्र लिखकर नवोदय विद्यालयों की विशिष्ट पहचान और विशिष्ट उद्देश्य का हवाला देते हुए शिक्षा के अधिकार कानून के दायरे से बाहर रखे जाने की मांग कर डाली है। हो सकता है, इसी आधार पर केन्द्रीय विद्यालय संगठन और सैनिक स्कूल सोसायटी की ओर से भी इस तरह की मांग आए। यही नहीं, इसी आधार पर अपनी अलग पहचान और विशिष्टता कायम रखने के लिए प्रतिष्ठित प्राइवेट स्कूल संचालक भी संगठित होकर इस एक्ट के दायरे से बाहर निकालने की लंबे अरसे से मांग कर रहे हैं। इस बहस में एक अहम सवाल यह उभर रहा है कि प्रारंभिक शिक्षा को सुदृढ़ और सर्वव्यापी बनाने के इस कानून से स्कूल शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ेगी अथवा जो विद्यालय गुणवत्तायुक्त शिक्षा दे रहे हैं, उनमें भी पढ़ाई चौपट हो जाएगी?
इन विशिष्ट सरकारी स्कूलों की स्थापना निश्चित रूप से एक विशिष्ट उद्देश्य को लेकर की गई थी और काफी हद तक ये विद्यालय अपने उद्देश्यों की पूर्ति भी कर रहे हैं। वर्ष 1961 में तत्कालीन रक्षा मंत्री वी.के. कृष्ण मेनन की पहल पर सेना की मांग के अनुरूप प्रतिभा तराशने के लिए सैनिक स्कूलों की स्थापना की गई। अब तक देश में 25 सैनिक स्कूल हैं, जहां से हर साल सैन्य सेवाओं में बेहतर प्रतिभाएं आ रही हैं। इन स्कूलों में दाखिला भी कक्षा छह और नौ में प्रतियोगी परीक्षा के जरिए ही होता है। शिक्षा का अधिकार कानून के मुताबिक आठवीं तक किसी प्रकार की प्रवेश परीक्षा नहीं करवाई जा सकती है। ऎसे में सैनिक स्कूलों को भी प्रवेश प्रणाली बदलनी पड़ेगी। केन्द्रीय विद्यालयों की स्थापना ट्रांसफरेबल कर्मचारियों के बच्चों की पढ़ाई सुचारू जारी रखने के ध्येय से 1965 में की गई। अब तक देश-विदेश में 981 केन्द्रीय विद्यालय हैं। केन्द्रीय विद्यालय पहली कक्षा से बारहवीं तक हैं। इनमें विभिन्न श्रेणियों के आधार पर लॉटरी से पहली कक्षा में प्रवेश दिया जाता है और शेष कक्षाओं में सीट रिक्त होने की स्थिति में परीक्षा आधारित मैरिट के आधार पर दिया जाता है। हालांकि केन्द्रीय विद्यालय संगठन ने आधिकारिक तौर पर एक आदेश जारी कर सभी विद्यालयों में शिक्षा का अधिकार अधिनियम लागू करने के निर्देश दे रखे हैं, लेकिन इसमें यह नहीं बताया गया कि इसकी पालना कैसे सुनिश्चित करनी है। आस-पास के वंचित तबके और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के बच्चों के दाखिले में 25 प्रतिशत आरक्षण को सुनिश्चित करने के लिए सीटें बढ़ाई जा रही हंै, लेकिन आठवीं तक सभी के लिए मुफ्त शिक्षा देने का अभी कोई आदेश जारी नहीं हुआ है। आठवीं तक के विद्यार्थियों से फीस भी ली जा रही है, जबकि कानून के प्रावधानों के मुताबिक फीस नहीं ली जा सकती है।
राजीव गांधी की पहल में नई शिक्षा नीति के तहत मॉडल स्कूलों के रूप में 1986 में नवोदय विद्यालयों की स्थापना की गई। इस समय देश में 565 नवोदय विद्यालय हैं। ग्रामीण क्षेत्र में स्थित इन विद्यालयों में राजीव गांधी के सपनों का पंथ निरपेक्ष भारत तैयार हो रहा है। बाल्यावस्था में मिले संस्कार जीवन का आधार बनते हैं। ऎसे में कक्षा छह से बारह तक सभी जाति-वर्ग के विद्यार्थी साथ खाते-पीते-रहते और पढ़ते हुए जो सीखते हैं, यही वर्ग आगे चलकर जाति-पांति रहित समाज का निर्माण करता है। इन विद्यालयों में दाखिला प्रवेश परीक्षा की मैरिट के आधार पर छठी कक्षा में होता है। इनमें पढ़ाई, आवास और भोजन पूरी तरह नि:शुल्क है। छठी कक्षा में शिक्षा का अधिकार कानून के प्रावधानों के मुताबिक प्रवेश परीक्षा अवैध है। इसलिए नवोदय विद्यालय समिति को भी दाखिले का कोई नया तरीका ढूंढ़ना होगा। आठवीं तक आस-पास के वंचित और कमजोर तबके के बच्चों के लिए 25 प्रतिशत आरक्षण के प्रावधान का भी रास्ता खोजना होगा।
सरकार के इन विशिष्ट विद्यालयों की गुणवत्ता और बेहतर परीक्षा परिणाम के कारण एक विशिष्ट ख्याति भी है। स्कूल शिक्षा में प्रतिस्पर्द्धा के इस दौर में प्रतिष्ठित प्राइवेट स्कूलों की तुलना में सरकार की साख बची हुई है, तो सिर्फ इन्हीं विद्यालयों के कारण। बाकी राज्य सरकार के स्कूलों में उनमें पढ़ाने वाले शिक्षक खुद अपने बच्चे ही पढ़ाना पसंद नहीं करते हैं। ऎसे में अपनी विशिष्ट पहचान को लेकर इन विद्यालयों को संचालित करने वाले संगठनों की चिंता अकारण नहीं है। बिना प्रवेश परीक्षा के यदि इंटे्रक्शन के आधार पर इन विशिष्ट विद्यालयों में दाखिला दिया गया, तो तय मानिए जुगाड़ से सिफारिशी बच्चे भर जाएंगे और उससे गुणवत्ता पर अव्यवस्था हावी होते देर नहीं लगेगी। प्रवेश में प्रतियोगी परीक्षा गरीब और प्रतिभाओं के हक में है, लेकिन कानून इसकी इजाजत नहीं देता है। ऎसे में इन विद्यालयों की गुणवत्ता और विशिष्ट पहचान बचाने के विशेष प्रयास नहीं किए गए, तो तय मानिए कि हम शिक्षा में सुधार का सपना साकार कर पाएं अथवा नहीं, लेकिन अच्छी गुणवत्ता और विशिष्ट पहचान वाले विद्यालयों का बंटाधार करने के पाप के जरूर भागीदार हो जाएंगे। यही पीड़ा प्रतिष्ठित प्राइवेट स्कूलों की भी है। हमें उनकी व्यथा को इसलिए भी समझना चाहिए, क्योंकि उनमें दाखिले के लिए लगने वाली लंबी कतारें केवल भवन और सुविधाएं देखकर कतई नहीं लग रही हैं, बल्कि हर अभिभावक को इनमें अपने सपने पूरे होेते दिख रहे हैं। इन स्कूलों की गुणवत्ता के पीछे भी रियायती दरों में जमीन आवंटन नहीं, बल्कि संचालकों का कठोर परिश्रम है, जो सरकारी स्कूलों की तुलना में कम प्रशिक्षित स्टाफ से बेहतर परिणाम दे रहे हैं।
शिक्षा का अधिकार कानून की पालना सुनिश्चित करने के लिए इन विशिष्ट विद्यालयों को अपनी प्रवेश प्रक्रिया बदलनी होगी। इसके लिए इनके विधान और प्रवेश गाइडलाइन में संशोधन करना होगा। यह अचानक संभव नहीं है। प्रवेश परीक्षा के स्थान पर वैकल्पिक प्रवेश प्रणाली पर भी कानून बनाते समय ही सोचा जाता तो बेहतर होता। वंचित और पिछड़े तबके के 25 प्रतिशत सीटों पर दाखिला लेने वाले बच्चों का आठवीं पास करने के बाद भविष्य क्या होगा, कानून में कहीं कोई उल्लेख नहीं है। ऎसे में आठवीं तक यदि ऎसे बच्चे प्राइवेट अथवा इन विशिष्ट विद्यालयों में पढ़ भी लेंगे, तो उन्हें क्या हासिल हो जाएगा? उनके सामने बाद में विकल्पहीनता की स्थिति आ जाएगी। ऎसे में उचित यही है कि हमारे प्रयास शैक्षिक गुणवत्ता के उच्च मानदंडों को बनाए रखने के साथ अन्य विद्यालयों के स्तर को इनके समकक्ष लाने के होने चाहिए।
डॉ. हनुमान गालवा
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