भारत और पाकिस्तान के बीच चल रही बातचीत की रेल एक बार फिर वहीं आ गई है, जहां से रवाना हुई थी। इसे रेलवे की भाषा में डिरेलमेंट कहा जाना चाहिए, यानी भारत और पाकिस्तान के बीच बहुत ही धीमी रफ्तार से चलने वाली ट्रेन भी डिरेल हो गई या यूं कहें पटरी से उतर गई। इस डिरेलमेंट के लिए कौन जिम्मेदार है, इस पर लंबी बहस हो सकती है। हिंदुस्तानियों के हिसाब से तो पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी की वजह से ट्रेन पटरी से उतरी है। हालांकि कुरैशी इसके लिए हिंदुस्तान के विदेश मंत्री एस.एम. कृष्णा को जिम्मेदार बता रहे हैं। यह दोनों ओर से माना जा रहा है कि गाड़ी पटरी से उतर गई है और जैसा कि हम हिंदुस्तानियों को अनुभव है कि जब गाड़ी एक बार पटरी से उतर जाती है, तो उसे फिर से पटरी पर लाने में काफी वक्त लगता है। कई बार इस दोरान रास्ता भी बदलना पड़ता है और कभी-कभी ड्राईवर भी। भारतीय विदेश मंत्री कृष्णा और पाकिस्तानी विदेश मंत्री कुरैशी के बीच इस्लामाबाद में बातचीत शुरू हुई। बातचीत का पहला दौर खत्म हुआ, लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला। जब कुछ भी मनमाफिक नहीं चल रहा था तो ब्रेक के बाद फिर से बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ। करीब छह घंटे दोनों नेताओं के बीच बैठक हुई। कुरैशी बातचीत को जिस रास्ते पर ले जाना चाहते थे, कृष्णा उस रास्ते जाने को तैयार नहीं थे। वे आतंकवाद पर बात करना चाहते थे, पाकिस्तान से आतंकवादियों को मिलने वाली मदद और शह पर बात करना चाहते थे, जो कुरैशी को पसंद नहीं आई। बातचीत के बाद हुई प्रेस कांफ्रेंस में यह बात खुलकर सामने आ गई। जब कुरैशी ने हाफिज सईद और हमारे गृह सचिव जी.के. पिल्लई को एक तराजू में रखने की कोशिश की। बात इसलिए हमें और रास नहीं आई, क्योंकि एस.एम. कृष्णा इस दौरान चुप रहे। उन्होंने कुरैशी का विरोध नहीं किया। इस पर भारत में तीखी प्रतिक्रिया हुई, लेकिन अगले दिन तो बात और बिगड़ गई। जब कृष्णा देश लौटने की तैयारी कर रहे थे तब कुरैशी ने उन पर हमला बोल दिया। वे बोल कि कृष्णा तैयारी करके नहीं आए थे, वे बार-बार दिल्ली से निर्देश ले रहे थे। इससे यह पूरी तरह से साफ हो गया कि पाकिस्तान बातचीत को आगे बढ़ाने के मूड में नहीं है और वो फिर से कश्मीर का राग अलापने लगा। कुरैशी यह भी कहा कि पाकिस्तान यह कैसे नजरअंदाज कर सकता है कि कश्मीर में सेना तैनात कर दी गई और लोग मारे जा रहे हैं। पूरे माहौल से यह स्पष्ट होता है कि भारत और पाकिस्तान के बीच पहले से ही ठहरी पड़ी बातचीत अब और बिगड़ गई है। लेकिन, यह बिगाड़ बयानों से नहीं, बातचीत के बीच से ही पैदा हुआ है। भारत पहले ही साफ कर चुका है कि वो हर मुद्दे पर बात करने को तैयार है बशर्ते मुंबई के गुनहगारों पर ठोस कार्रवाई हो, लेकिन कुरैशी का कहना था कि आप सिर्फ उन्हीं मुद्दों पर अड़े रहें जो आप चाहते हों, बाकी को छोड़ दें तो मेरे हिसाब से बात नहीं बनेगी। अब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी का कहना है कि भारतीय प्रधानमंत्री ने उन्हें सभी मुद्दों पर बातचीत का भरोसा दिलाया था। कुछ लोगों का कहना है कि ये प्रधानमंत्री का कोई पुराना वादा रहा होगा। वैसे इसे एक संयोग ही कहा जाएगा कि इस बार जिस दिन बातचीत शुरू हुई, उससे ठीक तीस साल पहले भी दोनों मुल्कों के बीच बातचीत शुरू हुई थी। उस वक्त पाकिस्तान के विदेश मंत्री आगाशाही थे और भारत के विदेश मंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव थे। पाकिस्तान के डेलीगेशन में आगाशाही के साथ पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के ए. शाहनवाज, दिल्ली में पाकिस्तान के सफीर अब्दुल सत्तार और काजी हुमायूं शामिल थे, तब बातचीत दिल्ली में हुई थी। बैठक से एक दिन पहले प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने एक बैठक में बातचीत के मुद्दों को अंतिम रूप दिया था। यह बात अलग है कि उस समय भी बातचीत परवान नहीं चढ़ पाई थी और तय किए गए मुद्दों में से ज्यादातर पर कोई खास सहमति नहीं बन पाई थी। यह कहा जा रहा है कि कुरैशी ने पाकिस्तानी फौज के दबाव में वार्ता में अडंगा लगाया। इस बात का सुबूत यह है कि पहले दौर की वार्ता के बाद पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष जनरल अशफाक कयानी ने राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी और प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी से भेंट की थी। इसी के बाद दूसरे दौर की शाम को हुई वार्ता के दौरान दोनों पक्षों में कड़वाहट घुली। यह किसी से नहीं छिपा है कि पाकिस्तान में सत्ता की शक्ति का केंद्र सेना ही है। राष्ट्रपति जरदारी और प्रधानमंत्री गिलानी से कयानी की मुलाकात का मकसद तो उन्हें अपने आस्ट्रेलिया दौरे का विवरण देना और देश के अंदरूनी हालात से अवगत करना था, लेकिन बताते हैं कि इस दौरान दोनों देशों के विदेश मंत्रियों की बातचीत का मुद्दा भी प्रमुखता से उठा। इसी के बाद दोनों देशों के बीच वार्ता का माहौल बिगड़ना शुरू हुआ, क्योंकि सुबह की बैठक में कृष्णा और कुरैशी वार्ता के प्रति काफी आशान्वित नजर आ रहे थे। जब वार्ता की अवधि को बढ़ाने का फैसला हुआ तो यही लग रहा था कि बातचीत सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रही है। इससे पहले विदेश सचिव और गृह मंत्री स्तर की बातचीत में दोनों देश बंदी मछुआरों को छोड़ने, व्यापार और लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने जैसे विश्वास बहाली के उपायों पर सहमत हो गए थे, लेकिन अचानक बात बिगड़ गई। पाकिस्तानी सेना कई कारणों से यह नहीं चाहती कि भारत के साथ बातचीत की प्रक्रिया आगे बढ़े। भारत के साथ खराब रिश्ते पाकिस्तानी सेना के लिए हमेशा फायदेमंद रहे हैं। अफगानिस्तान में सत्ता केंद्र में हो रहे बदलाव से भी पाक सेना के हौसले बुलंद हैं। अमेरिका 2011 तक अफगानिस्तान से अपनी सेना हटाने की योजना बना रहा है और तालिबान से सुलह योजना में पाकिस्तानी भूमिका को उसकी मौन स्वीकृति है। लिहाजा पाक सेना को भारत से रिश्ते सुधारने की कोई जल्दी नहीं है और कुरैशी खुद भी एक बार यह बात कह चुके हैं। हमारी सरहदों से लगे दो मुल्कों के साथ हमारा जंग का इतिहास है- चीन और पाकिस्तान। चीन हमारे लिए परेशानी रहा है, लेकिन पिछले कुछ सालों से उसने प्रत्यक्ष रूप से हमारे सामने कोई बड़ी चुनौती पेश नहीं की है। संभवत: वह आर्थिक मजबूरियों के चलते चुप है। वह चाहकर भी विशाल भारतीय बाजार की अनदेखी नहीं कर सकता। जहां तक पाकिस्तान का सवाल है, उसकी हकीकत यह है कि वह दुनिया के तो किसी काम आ नहीं रहा, बल्कि उसके यहां चल रही दहशत की फैक्ट्रियों से निकले दहशतगर्द दुनिया भर में दहशत फैला रहे हैं। दरअसल, पाकिस्तान की फौज और खुफिया एजेंसी आईएसआई ही पाकिस्तान की समस्या है। अपना वजूद बनाए रखने के लिए ये दोनों बातचीत के दौरान भी भारत के साथ जंग जैसा माहौल बनाए रखते हैं। यह मात्र संयोग नहीं है कि जिस वक्त विदेश मंत्री एस.एम. कृष्णा पाकिस्तान से रिश्ते सुधारने की बातचीत के लिए इस्लामाबाद रवाना होने की तैयारी कर रहे थे, उसी वक्त जम्मू कश्मीर के मेंढर में आतंकियों से मुठभेड़ चल रही थी। इसी दौरान पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर की राजधानी मुजफ्फराबाद में हिजबुल मुजाहिदीन की रैली चल रही थी, जिसमें कश्मीर में सेना की तैनाती का विरोध हो रहा था। यह वार्ता के लिए आदर्श माहौल नहीं है, फिर भी बातचीत बंद नहीं होनी चाहिए। कृष्णा-कुरैशी वार्ता मेे कम से कम यह तो सकारात्मक रहा ही कि मुंबई हमले के बाद दोनों देशों के बीच बातचीत का जो सिलसिला खत्म हो गया था, वह फिर से शुरू हो गया। भविष्य में भारत की कोशिश होनी चाहिए कि बातचीत आतंकवाद पर केंद्रित रहे और पाकिस्तान को ऎसा कोई मौका नहीं दिया जाए, जिससे वह हमारी कूटनीति को कमजोर कर सके। पाकिस्तान की नीयत में खोट में यह पूरी दुनिया जानती है, लेकिन बातचीत बंद करने से भी यह दुरूस्त होने वाली नहीं है। विजय त्रिवेदी (लेखक एनडीटीवी इंडिया में डिप्टी एडिटर हैं)
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