गत दो माह से अफगानिस्तान में तालिबान जिस तरह से नाटो सैनिकों को मौत की नींद सुला रहे हैं, उससे यह आशंका पैदा होने लगी है कि कहीं तालिबान अपनी रणनीति में सफल तो नहीं हो रहा है और कहीं अगानिस्तान फिर से इतिहास दोहराने की ओर तो नहीं बढ़ रहा है? इतिहास तो यही बताता है कि अफगानिस्तान में न तो ब्रिटेन असल लड़ाई जीत पाया और न सोवियत संघ। भावी परिणाम क्या होंगे, पता नहीं, लेकिन स्थितियां अमेरिका के खिलाफ हैं। जिस तरह से मैकक्रिस्टल गए हैं और जनरल डेविड पैट्रियस से अफगानिस्तान में अमेरिकी सेना की बागडोर संभालने से पहले सीनेट के समक्ष अपना बयान दिया है, वह खतरे के संकेत से कुछ कम नहीं है। मैकक्रिस्टल की अफगानिस्तान से वापसी के बाद अमेरिकी सेना के नेतृत्व की जिम्मेदारी जनरल डेविड पैट्रियस को सौंपी गई है। जनरल पैट्रियस 2007-08 के दौरान इराक युद्ध के समय बड़ी तेजी से उभर कर आए थे। इराक में विद्रोहियों से निबटने की उनकी रणनीति के अलावा उनके राजनीतिक और कूटनीतिक कौशल की इतनी सराहना हुई कि उन्हें कुछ समय के लिए अमेरिकी रिपब्लिकन पार्टी का संभावित राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के रूप में भी देखा जाने लगा था, लेकिन इस सबके बावजूद भी वे ओबामा प्रशासन में वह जगह नहीं बना पाए थे, जो उन्हें बुश प्रशासन में मिली हुई थी। अब उन्हें अफगानिस्तान में फिर से हुनर दिखाने का अवसर मिला है, लेकिन सीनेट के सामने दिए गए अपने बयान से वे पूरे विश्वास से लबरेज नहीं दिख रहे हैं। उन्होंने चेतावनी दी है कि अफगानिस्तान में अगले कुछ महीनों में हिंसा बढ़ सकती है। पैट्रियस के अनुमान को सही इसलिए भी माना जा सकता है, क्योंकि संयुक्त राष्ट्र महासचिव स्वयं इस बात को स्वीकार चुके हैं कि अफगानिस्तान में सुरक्षा हालात सुधरे नहीं हैं और 2009 से तुलना करें तो इस वर्ष शुरू के चार महीनों में सड़क किनारे होने वाले बम धमाकों में 94 फीसदी वृद्धि हुई है। ऎसे में जनरल पैट्रियस के बयान को किसी भी सूरत में हल्के में नहीं लिया जा सकता है। जनरल पैट्रियस यह मानते हैं कि आने वाले दिनों में संघर्ष और भीषण होगा। उनकी दृष्टि में इस उद्देश्य के लिए अफगान सेना और पुलिस का स्टैंडर्ड बढ़ाना होगा, लेकिन विपरीत परिस्थितियों में और सीमित समय में ऎसा कर पाना सबसे बड़ी चुनौती होगी। पैट्रियस न केवल अच्छे सैनिक हैं, बल्कि उनके पास राजनीतिक और कूटनीतिक समझ भी है, लेकिन तालिबान बुलंद है और बेहद चुनौतीपूर्ण स्थिति पैदा करने में सक्षम दिख रहा है। गौरतलब है कि जब अमेरिकी सैन्य कमांडरों और ब्रिटिश सेना प्रमुख जनरल डेविड रिचर्डस ने यह सुझाव रखा कि तालिबान के साथ बातचीत फायदेमंद हो सकती है तो तालिबान की तरफ से बयान आया कि वे किसी भी तरह के समझौते के खिलाफ है। उनका मानना है कि अमेरिकी खेमे में अफरातफरी का माहौल है, खासकर नाटो कमांडर जनरल मैकक्रिस्टल की बर्खास्तगी के बाद। आज वे बातचीत के किसी भी प्रस्ताव को नाटो की कमजोरी के रूप में देख रहे हैं। वे इस विश्वास से लबरेज हैं कि वे जीत रहे हैं। काबुल पहुंचने से पहले ही जनरल डेविड ने कमोबेश इस तथ्य को स्वीकार भी किया। उनका कहना था कि पिछले नौ साल से जारी इस लड़ाई के बावजूद तालिबान की ताकत कम नहीं हुई है, बल्कि भारी पैमाने पर बढ़ती नजर आ रही है। खास बात यह है कि नौ साल से जारी इस लड़ाई में पिछले महीने नाटो के सबसे ज्यादा अर्थात 102 (प्रतिदिन के हिसाब से तीन से अधिक) सैनिक मारे गए। यह स्थिति नाटो बलों पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने में कामयाब हो सकती है। ऎसा लगता है कि तालिबान जिस रणनीति पर काम कर रहा था, उसमें वह आज सफल हो रहा है। किसी जमाने में पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी के प्रमुख एजेंट रहे कर्नल इमाम, जिन्होंने 1980 के दौरान अफगानिस्तान के प्रमुख आतंकी सरगनाओं और लड़ाकों को प्रशिक्षण दिया था और अफगानिस्तान में सोवियत सेना के खिलाफ युद्ध लड़ा था, ने कुछ दिन पूर्व अपने एक बयान में कहा था कि तालिबान कभी नहीं थकेगा, उसे लड़ने की आदत है। यह सच भी है, कि जो तालिबान अस्सी के दशक से लगातार उसी भूमि पर लड़ रहा है, उसे अफगानिस्तान की भूमि पर युद्ध लड़ने का तजुर्बा अमेरिकी सेना से कहीं अधिक है। इस स्थिति में यह संभव है कि वे अमेरिकी फौजों को थका देने की रणनीति पर कार्य कर रहा हो। आज जो अमेरिकी कमांडरों की मनोदशा जीत के अनुकूल नहीं लगती। आज की जो स्थिति है, उससे तो यही लगता है कि अमेरिका किसी तरह से अफगानिस्तान से अपना पीछा छुड़ाना चाहता है और राष्ट्रपति करजई अमेरिका के ताजा रूख को देखते हुए तालिबानियों से लड़ने की बजाय उनसे समझौता करना ही बेहतर समझ रहे हैं। अमेरिकी सीनेट के समक्ष दिए गए जनलर पैट्रियस के बयान से भी यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि वे अफगान राष्ट्रपति करजई और तालिबानी हक्कानी गुट के बीच हो रही बातचीत को बढ़ावा देने के पक्षधर हैं। यहां पर एक अखरने वाला पक्ष यह है कि अमेरिका यह स्पष्ट तौर पर जानता है कि हक्कानी गुट का अलकायदा और पाकिस्तानी सेना से किस प्रकार का रिश्ता है। इसका इस बात से ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि पाकिस्तानी सेना ने वजीरिस्तान के उस क्षेत्र में कभी हमला नहीं किया, जिस क्षेत्र में हक्कानी गुट के छापामार रहते हैं। यदि जनरल पैट्रियस अफगानिस्तिान के सबसे निकटस्थ होने का बहाना बनाकर पाकिस्तान के बिना कोई हल नहीं निकालना चाहते हैं, तो फिर वे कम से कम दक्षिण एशिया के लिए एक नए खतरे की पौध लगाने का कार्य कर रहे हैं। चिंताजनक बात यह है कि अफगानिस्तान में पाकिस्तान और तालिबान को पांव जमाने से रोकने के लिए भारत के सामने कोई रणनीति नहीं दिख रही है। जिस तरह के हालातों की संभावनाएं दिख रही हैं, अगर वे वहां विकसित हो गई तो भारत को वहां से अपना बोरिया-बिस्तर समेटना पड़ सकता है। भारत ने वहां के विकास कार्यो में छह हजार करोड़ रूपये से अधिक का निवेश इसलिए किया है कि अफगानिस्तान में शांति व स्थिरता कायम हो, ताकि वह क्षेत्र आतंकवाद का गढ़ न बन सके। भारत को अफगानिस्तान में पैर जमाने से दूसरे लाभ यह मिलेगा कि वह मध्य एशिया में अपने सामरिक प्रभाव का विस्तार करने में सफल हो जाएगा। पाकिस्तान को यह फूटी आंखों नहीं सुहाता, इसलिए यदि पाकिस्तान परस्त तालिबानी काबुल में अपने पैर जमाने में सफल हो जाते हैं, तो पाकिस्तान के लिए यह एक बड़ी कूटनीतिक विजय का अवसर होगा। एक विशेष बात यह भी है चीन भी पाकिस्तान के जरिये अफगानिस्तान की संपदा पर गिद्ध दृष्टि जमा रहा है। चीन और पाकिस्तान की जिस तरह से निकटता बढ़ रही है, उस दृष्टि से पाकिस्तान उस स्थिति में, जब तालिबान काबुल पर काबिज हो जाएगा, तो चीन को अफगानिस्तान के लिए रास्ता दे देगा। खबरों के मुताबिक अफगानिस्तान में एक खरब डॉलर से भी अधिक की खनिज संपदा है और इसे हथियाने के लिए पाकिस्तान बेताब है। अमेरिका अफगानिस्तान से विदा हो जाए और भारत को वहां बाहर कर दिया जाए तो चीन को साथ लेकर पाकिस्तान अपने मंसूबों में आसानी से सफल हो जाएगा। इसके परिणाम क्या होंगे, यह अमेरिका सहित पूरी दुनिया के लिए गंभीर प्रश्न होना चाहिए। अगर ऎसा होता है तो यह स्थिति न तो अफगानिस्तान के लिए बेहतर होगी, न अमेरिका के लिए और न ही भारत व दक्षिण एशिया के लिए। पस्त हो रही अमेरिकी फौजों की मनोदशा को देखते हुए यही लगता है कि अमेरिका बहुत सारी स्थितियों से समझौता कर अफगानिस्तान से विदा हो चाहता है। डॉ. रहीस सिंह (लेखक विदेश मामलों के जानकार हैं)
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