पिछले एक दशक से भी अधिक समय से देश की सर्वाधिक प्रतिष्ठित परीक्षा पर सवाल उठते रहे हैं। कोचिंग संस्थानों के बढ़ते दखल और स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर निरंतर बहस चल रही है। इंजीनियरिंग में दाखिले के लिए 12वीं कक्षा के 40 प्रतिशत अंक जोड़े जाने के प्रस्ताव ने हलचल पैदा कर दी है। निश्चित तौर पर इसे अंतिम पड़ाव नही माना जा सकता हैं, लेकिन सरकारी स्तर पर भी बदलाव की जरूरत महसूस होने लगी है। आईआईटी जेईई के आज के मॉडल ने स्कूली शिक्षा के स्तर को गिराने का काम किया। पांच-दस हजार छात्रों को चुनने के प्रयास में देश के लाखों विद्यार्थी उस अमूल्य ज्ञान से वंचित होते रहे हैं, जो उन्हे अपने विद्यालय के अतिरिक्त कहीं भी नहीं मिल सकता था। नवीं या दसवीं कक्षा तक आते-आते उन्हें अपने विद्यालय से अनौपचारिक फेयरवेल लेना पड़ रहा था और एक ऎसी अंधी लड़ाई के सैनिक में परिवर्तित होना पड़ रहा था, जहां निन्यानवें प्रतिशत की हार पहले दिन ही तय होती है। केवल हारने वाले व्यक्तियों का चयन शेष होता हैं। ऎसे में छात्र दोहरी मार के शिकार हो रहे हैं। वे जिंदगी के उन महानतम क्षणों को खो रहे हैं, जो उनको बहुत कुछ सिखा सकते हैं। साथ ही साथ युवावस्था आने से भी पहले जीवन में निराशा प्रवेश कर रही है।
परीक्षा, समय के साथ ज्ञान की परीक्षा न रह कर विशेष प्रकार की तकनीक हासिल करने की चुनौती मात्र बनती जा रही है, जो दो से चार लाख रूपए में ही चुनिंदा कोंचिग संस्थानों से हासिल की जा सकती हैं। इतने रूपए देकर भी एक प्रतिशत से कम सफलता की संभावना है। चार लाख रूपए देकर भी लाखों उस तकनीक को पाने के लिए कई बरस न्यौछावर करने को तैयार हैं। आखिरकार उन्हें भविष्य में लाखों प्रतिमाह मिलने की उम्मीद है। यह प्रश्न है कि जो करोड़ों लोग अपनी जेब में दो से चार लाख रूपए रखकर चलने की हैसियत नहीं रखते, उनके ज्ञान की परीक्षा कब की जाएगी। कब तक वे अपने धैर्य की परीक्षा देते रहेंगे एवं उसमें पास होते रहेंगे। यदि कभी वे इस धैर्य की परीक्षा में पास होने से चूक गए तो?
वर्तमान व्यवस्था ने इस परीक्षा को ऎसा बना दिया कि स्कूली शिक्षा एक तरह से गौण सी हो गई और टीन-एज युवा वर्ग जिसे जीवन के इस मोड़ पर आदर्श एवं मूल्य सीखने समझने थे, नैतिकता के मापदंड परिभाषित करने थे, उसने जवीन के लिए पैसे से कही अधिक महत्वपूर्ण मूल्यपरक सिद्धांतो को सीखने का अवसर गंवा दिया और यही कारण हो सकता है कि देश का नौजवान नैतिकता के मूल्य पर धन के मूल्य को आंकने लगा हैं। शिक्षा के अधिकार के रहनुमाओं को कम से कम स्कूली शिक्षा को पूरा लेने के अधिकार की भी व्यवस्था करनी ही होगी, क्योंकर ऎसे हालात बनाए जाएं, जब दस बरस पढ़ने के बाद एक विद्यार्थी को अहसास हो कि यह शिक्षा उसके उत्कर्ष के लिए बेमानी है और उसके लिए कोंचिग सेंटर की ओर जाने वाली सड़कें सन्मार्ग है, "मोक्षद्वार" हैं। मानव संसाधन मंत्रालय पहले ही बारहवीं में साठ प्रतिशत अंक लाना इस परीक्षा के लिए अनिवार्य कर चुका है और अब बारहवीं की परीक्षा को "वेटेज" देना मानो लक्ष्य की ओर बढ़ते हुए "मिडवे" तक पहंुचने जैसा हैं। इसी तरह देश में एक तरह के अध्ययन के लिए एक परीक्षा की योजना भी विद्यार्थियों के लिए सुकून भरी होगी, जहां प्रतिस्पर्द्धा तो वैसी ही रहेगी, किंतु निराशा बारम्बार नहीं होगी। अनावश्यक धन एवं समय को बरबाद होने से रोका जा सकेगा। इससे विद्यार्थियों को फायदा होगा।
एनआईटी जैसे संस्थान जो अनावश्यक दूसरी वरीयता पर स्थापित हो गए हैं, अपनी श्रेष्ठता सिद्ध कर आईआईटी के समक्ष आ सकते हैं। राजकीय या निजी संस्थान भी स्वयं को प्रतिस्पर्द्धा में डालना चाहें तो दौड़ का मैदान उनके लिए भी उपलब्ध होगा। डॉ. सुधांशु (लेखक सुरेश ज्ञान विहार यूनिवर्सिटी में चीफ मेंटर हैं)
शिक्षा के स्तर में होगा सुधार इन कुछ सालों में इंजीनियरिंग और मेडिकल के नामी-गिरामी उच्च शिक्षण संस्थानों में दाखिले के नाम पर कोचिंग संस्थानों का जिस तरह जाल बिछा है, उससे शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित हुई है और बच्चों में पढ़ाई के प्रति गंभीरता भी कम हुई है। दुर्भाग्य से देश में गलाकाट प्रतिस्पर्द्धा के नाम पर शॉर्टकट का जो तनावपूर्ण माहौल बना है, उससे बच्चों में रटने की प्रवृत्ति बढ़ी है। जाहिर सी बात है कि जो विद्यार्थी तोते की तरह कुछ सवाल रटकर परीक्षा के जरिए अ“छे संस्थान में दाखिला लेने में कामयाब हो जाता है, वह अच्छा इंजीनियर या डॉक्टर कतई नहीं बन सकता है। दाखिले के दबाव के चलते कई अभिभावक कक्षा दसवीं उत्तीर्ण करने के साथ ही अपने लाडले के कोचिंग सेंटर भेजना शुरू कर देते हैं। ऎसे में होता यह है कि बच्चा सैकंडरी के बाद की अपनी स्कूली पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे पाता है। इससे क्लास रूप में गंभीरता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। अब इंजीनियरिंग एंट्रेस टेस्ट में 12वीं कक्षा के नंबरों को भी आधार बनाए जाने से क्लास रूम की गंभीरता पुन: लौट आने की उम्मीद बनी है। वैसे भी जो ज्ञान क्लास रूम में मिलता है, वह कोचिंग सेंटर पर कतई संभव नहीं है।
बारहवीं कक्षा के प्राप्तांकों को पूरा वजन मिलेगा, तो निश्चित रूप से प्रतिस्पर्द्धा के पागलपन से विद्यार्थी वर्ग को निजात मिल सकती है। कोचिंग फोबिया से भी बच्चों को निजात मिलेगी और कोचिंग के गोरखधंधे पर भी काफी कुछ अंकुश लगेगा। जो स्कूल टीचर क्लास रूम में ध्यान नहीं देते हैं और जिन्होंने कोचिंग सेंटर पर अपने पार्ट टाइम जॉब को कमाई का बड़ा जरिया बना रखा है, उन पर भी अंकुश लगाने की दिशा में सोचा जाना चाहिए। अधिकांश विश्वविद्यालय और कॉलेजों में जब दाखिले का आधार 12वंी कक्षा के प्राप्तांक हैं, तो मेडिकल और इंजीनियरिंग के उच्च शिक्षण संस्थानों में इसे आधार न बनाकर केवल प्रवेश परीक्षा की मैरिट को आधार बनाकर कोचिंग संस्थानों को क्यों फलने-फूलने दिया जा रहा है? यही नहीं, शॉर्टकट कामयाबी का दावा करने वाले इन कोचिंग संस्थानों के साथ पास बुकों और गाइडों के कारोबार का भी एक बाजार खड़ा हो गया। इस बाजार में रचनात्मकता और भावना के लिए कहीं कोई जगह नहीं है। शिक्षा की गुणवत्ता को बनाए रखने के लिए कोचिंग संस्थानों का हौव्वा हमें पूरी तरह खत्म करना होगा। परीक्षा पैटर्न में सुधार के प्रयास दूरगामी परिणाम देंगे।
प्रवेश परीक्षा के पैटर्न में बदलाव केवल उन लोगों को ही अखर रहा है, जो शिक्षा को मुनाफे के कारोबार में बदलने की कोशिश में लगे हुए हैं। शिक्षा समाज की बेहतरी का रास्ता है। इससे हमारी तरक्की और समाज का विकास जुड़ा हुआ है। आज दुनिया में भारतीय प्रतिभाओं को जो कद्र मिल रही है, उसकी वजह काबिलियत ही है। हमें यह ध्यान रखना होगा कि क्लास रूम की गंभीरता लौटाए बिना हम बच्चों को रचनात्मकता से नहीं जोड़ सकते हैं। इस दिशा में यह बदलाव काफी कारगर साबित होगा, ऎसी मुझे उम्मीद है। हमें शिक्षा के ताने-बाने को मजबूती प्रदान करनी होगा, जिससे किसी भी प्रतियोगी या प्रवेश परीक्षा के लिए कोचिंग की जरूरत ही नहीं पड़े। शिक्षा के प्रति लोगों में जागरूकता आई है। लोग अपना पेट काटकर अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा दिलाना चाहते हैं, इसे देखा और समझा जा सकता है, हर जगह महसूस भी किया जा सकता है। शिक्षा के प्रति आई चेतना के मद्देनजर गुणवत्तायुक्त शिक्षा की व्यवस्था सुनिश्चित नहीं कर पाना दुर्भाग्यपूर्ण है। हमें गुणवत्तायुक्त शिक्षा की उपलब्धता और पहुंच बढ़ाने के व्यावहारिक प्रयास करने चाहिए। निजी क्षेत्र में भी उच्च शिक्षा के जो संस्थान खुल रहे हैं, उनकी गुणवत्ता को नियंत्रित करने की भी समुचित व्यवस्था की जानी चाहिए। हमारे उच्च शिक्षण संस्थान केवल डिग्रियां बांटने और परीक्षा करवाने के केन्द्र तक सीमित नहीं रहने चाहिए। प्रो. के. एल शर्मा (लेखक जयपुर नेशनल यूनिवर्सिटी मे ंवीसी हैं)
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