नई दिल्ली । देश की सत्ता पर पुरूष वर्चस्व के दुर्गो को हिलाने वाले ऎतिहासिक कदम के रूप में संसद के ऊपरी सदन राज्यसभा ने मंगलवार को महिला आरक्षण विधेयक को पारित कर दिया। 14 साल की जद्दोजहद के बाद देश की महिलाओं की निगाहों में अब विधायिका में ज्यादा स्थान प्राप्त करने की मंजिल का रास्ता साफ होता दिख रहा है। यह स्वर्णिम पल आने से पहले सदन में अभूतपूर्व हंगामा हुआ, जिसमें तोड़फोड़, धक्का-मुक्की, सात सदस्यों के निलंबन व मार्शलों के सहारे उन्हें जबरन बाहर निकाले जाने की शर्मसार करने वाली नौबत भी देश को झेलनी पड़ी।
राष्ट्रीय जनता दल व समाजवादी पार्टी के सदस्यों ने भारी हंगामे के साथ अपना विरोध जाहिर किया जबकि बहुजन समाज पार्टी ने विधेयक पर हुई चर्चा में अपनी राय व्यक्त करने के बाद मत विभाजन का बहिष्कार करते हुए वाक आउट किया। इस ऎतिहासिक 108वें संविधान संशोधन विधेयक 2008 पर हुए अनिवार्य मत विभाजन में विधेयक के पक्ष में 186 और विरोध में मात्र एक मत पड़ा। विधेयक के पारित होने के बाद सदन में मौजूद करीब 20 महिला सदस्यों के चेहरों पर उल्लास देखने लायक था।
महिलाओं को सशक्त करने की दिशा में चली अब तक की यात्रा का आज एक यादगार दिन है। यह कदम मील का पत्थर साबित होगा। यह महिलाओं को सम्मान है। देश की महान महिला नेत्रियों कस्तूरबा, गांधी, सरोजनी नायडू, एनी बेसेंट, विजय लक्ष्मी पंडित व इंदिरा गांधी आदि के बलिदानों को यह छोटी-सी श्रद्धांजलि है। यह विधेयक अल्पसंख्यक, अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति विरोधी नहीं है। यह महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में अगला कदम है। यह ऎतिहासिक और लीक से हटकर है।
मनमोहन सिंह, प्रधानमंत्री
अनेक व्यवधानों के बावजूद सभापति हामिद अंसारी की दृढ़ इच्छाशक्ति के लिए हमें उन्हें धन्यवाद देना चाहिए। इस विधेयक को पारित कराकर हमने पूरी दुनिया में महिलाओं के बारे में अपनी राय को और पुख्ता की है।वीरप्पा मोइली, केंद्रीय विधि मंत्री
यह अवसर सभी के लिए ऎतिहासिक और अjुत है। जो लोग कहते हैं कि महिलाओं को उनका अधिकार दिलाने के लिए आरक्षण की आवश्यकता नहीं है, वे गलत हैं। स्वतंत्रता के 63 वर्षो बाद भी आज लोकसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व सिर्फ 10.7 फीसदी है। इससे महिलओं को उचित प्रतिनिधित्व मिल सकता है।अरूण जेटली, राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष
मैं बहुत खुश हूं। महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में उठाया गया यह कदम एक राजनीतिक खतरा मोल लेने जैसा था, जिसे सत्ताधारी गठबंधन ने स्वीकार किया।सोनिया गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष
यह विधेयक महिला संगठनों और आंदोलनों की जीत का नतीजा है। महिलाएं पंचायती राज व्यवस्था में बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रही हैं। पंचायतों ने गरीब महिलाओं को मौका दिया है और वे ग्रामीण इलाकों का विकास कर रही हैं। इस विधेयक पर राजनीति खत्म होनी चाहिए। वृंदा करात, माकपा
मैं महिला आरक्षण विधेयक का समर्थन करता हूंं। पिछड़ी जातियों को चिह्नित कर आरक्षण में शामिल किया जाता तो अच्छा होता। इससे देश का भला होता। बिहार में पंचायती राज व्यवस्था में इस प्रकार के आरक्षण को लागू करने से समाज का लोकतांत्रिकरण हुआ है।शिवानंद तिवारी, जदयू
हम सवर्ण और दलित वर्गो की आर्थिक रूप से पिछड़ी व कमजोर महिलाओं को आरक्षण देने के पक्ष में हैं। विधेयक में संशोधन कर उसमें दलितों के साथ सवर्ण वर्ग की कमजोर तबके की महिलाओं के लिए भी आरक्षण का प्रावधान किया जाए। सतीश चंद्र मिश्रा, बसपा
देश की महिलाओं को बहुत पहले ही यह राजनीतिक अधिकार मिल जाना चाहिए था। यह धारणा अब पुरानी हो चुकी है कि राजनीति औरतों के वश की बात नहीं है।तारिक अनवर, राकांपा
संप्रग सरकार ने जनता से किया अपना वादा निभाया है। इस वादे का पूरा करने का साहस सिर्फ और सिर्फ कांग्रेस पार्टी में ही है।जयंती नटराजन, कांग्रेस प्रवक्ता
..तो सदन में दिखेंगी महिलाएं ही महिलाएं!
नई दिल्ली। महिला आरक्षण बिल के समर्थन और विरोध को लेकर राजनीति गर्माई हुई है, लेकिन इसके विरोधियों ने अपने समर्थन में एक बड़ा तर्क खोज निकाला है। राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष अजित सिंह ने सवाल उठाया कि बिल में एक सीट पर यदि पुरूष सांसद है और अगली बार उस सीट को महिला के लिए रिजर्व हो जाना है तो भला वो सांसद काम क्यों करेगा, क्योंकि उसे पता है अगली बार वो उस सीट से नहीं जीतकर आने वाला।
बिल के विरोधी इसके उल्टा तर्क भी देते हैं। उनका कहना है कि मान लीजिए कोई सीट महिला के लिए रिजर्व है और महिला सांसद उस क्षेत्र में अच्छा काम करती है तो अगली बार उस सीट के जनरल होने पर भी वो चुनाव लड़ सकती है और जीत सकती है। ऎसे में तो संसद में पुरूषों की संख्या कम हो जाएगी।
कब क्या हुआ?
1974: संसद में महिलाओं के प्रतिनिधित्व का मुद्दा उठा। 1993: संविधान में 73वें और 74वें संशोधन के तहत पंचायतों तथा नगरपालिकाओं में महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटें आरक्षित की गर्ई। 1996: महिला आरक्षण विधेयक को पहली बार देवेगौड़ा सरकार ने 81वें संविधान संशोधन विधेयक के रूप में संसद में पेश किया। 1998: राजग सरकार ने इस विधेयक को 12वीं लोकसभा में 84वें संविधान संशोधन विधेयक के रूप में पेश किया। 1999: दोबारा सत्ता में आई राजग सरकार ने 13वीं लोकसभा में विधेयक फिर पेश किया पर आम राय नहीं बनी। 2002 व 2003: राजग सरकार ने विधेयक पेश किया पर कांग्रेस और वामदलों के समर्थन के बावजूद सफलता हासिल नहीं। 2004: यूपीए ने विधेयक को पारित कराने के इरादे का एलान किया। 2008: विधेयक राज्यसभा में पेश। स्थाई समिति के पास भेजा गया। 2009: स्थायी समिति ने रिपोर्ट पेश की और सपा, जदयू व राजद के विरोध के बीच विधेयक को संसद के दोनों सदनों में रखा गया। 2010: केंद्रीय मंत्रिमंडल ने विधेयक को अनुमोदन दिया व 8 मार्च को राज्यसभा के पटल पर रखा।
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