अब ज्यादातर युवा लड़कियां खुद मैच्योर होने के बाद मां बनने की जिम्मेदारी उठाना चाह रही हैं। इनका हर काम पूरी प्लानिंग के साथ संपन्न होता है। लेकिन शायद हरेक को यह मौका नहीं मिल पाता। बस वे संयोग से मां बन जाती हैं। जो भी है, मां बनने की प्रवृति हर लड़की में होती ही है वह इस भावना से खुद को कभी दूर नहीं रख सकती। कुछ महिलाएं खुद के बारे में पूरी तरह श्योर होती हैं कि वे मां बनने के लिए पैदा ही नहीं हुई हैं। वे अपनी स्वतंत्रता को एंजॉय करना चाहती हैं, करिअर बनाना चाहती हैं। इस तरह की जिम्मेदारियां उन्हें जी का जंजाल नजर आती हैं। उन्हें सपने में भी मां बनना गवारा नहीं है.... हां या ना लेखक एलिजाबेथ गिलबर्ट अपनी किताब "कमिटेड" में कहती हैं, मातृत्व से दूर रहने से मुझे वह सब करने का मौका मिला जो मैं चाहती थी। बच्चे पालना और उनकी देखभाल माथापच्ची का काम है। जो महिलाएं मां बन चुकी हैं उन्हें आंखें मूंदकर यह सब करना होता है। तो क्या इस जिम्मेदारी के लिए हमें अलग तरह की महिलाओं की जरूरत होगी? गिल्बर्ट कहती हैं, जब आधुनिक अमेरिकन महिलाओं ने अपनी आजादी की खातिर मां नहीं बनने का विकल्प चुना। उन्हें आज तक इस विकल्प के चुनाव की वजह के लिए सफाई देनी पड़ रही है। किसी भी संस्कृति में हर दौर में मातृत्व को सम्मान की दृष्टि से देखा गया है। चाइल्डलेस बाय चॉइस पत्रकार शिवानी बताती हैं, मेरी एक सहयोगी पत्रकार की बहुत पहले शादी हो चुकी थी लेकिन वे अभी तक बिना बच्चे के थी। ईमानदारी से कहूं तो मैं उन लोगों से सहमत नहीं हूं जो स्वेच्छा से संतानहीन रहने का विकल्प चुनते हैं। मैं उनसे पूछती थी कि आखिर क्यों उन्हें यह महसूस नहीं होता है कि उनका अपना बच्चा होना चाहिए? आमतौर पर उनका जवाब होता कि मैं जिंदगी के ये महत्वपूर्ण साल बच्चे को नहीं दे सकती। मैं काम को एंजॉय करना चाहती हूं। ऎसे में मैं अगर अपना बच्चा दुनिया में लाऊं तो उसे या तो डे केअर सेंटर या मेरे पेरेंट्स को सौंपना होगा, और यह चीजें बच्चे और मेरे पेरेंट्स दोनों के साथ नाइंसाफी होगी। मातृत्व का मतलब बच्चे को जन्म देने का फैसला बहुत अहम है जो शरीर के साथ जिंदगी को भी बदल देता है। खुद के शरीर को इग्नोर करना, दर्द झेलना। बच्चा रोए तो टांकों के दर्द के बावजूद हर बार आपको उठकर बैठना होता है। रात हो या दिन, उसे कभी भी भूख लग सकती है, आपको दूध पिलाना ही होगा। बार-बार डायपर्स चेंज करने होगे। हर समय उसे संभालना होगा। उसे कभी भी मां की जरूरत हो सकती है। जिंदगी की दूसरी बातें गौण हो जाती हैं। कुछ महिलाएं इन बदलावों को सहज स्वीकार कर लेती हैं और मातृत्व को एंजॉय करती हैं। लेकिन कुछ इन परिस्थतियों से घबराकर पलायन कर जाती हैं। प्रकृति प्रदत्त है यह अहसास मां खुद ब खुद जान जाती है कि बच्चे की कैसे देखभाल की जाती है। उसे यह सीखने की जरूरत नहीं पड़ती। कुछ महिलाएं कहती हैं, मुझे तो छोटे बच्चे को हाथ में लेने से भी डर लगता है। वे उसकी देखभाल से कतराती हैं। दस फीसदी महिलाएं ही ऎसी मिलेगीं जो परिस्थतिवश मां नहीं बन पाई हैं या मां बनने का सुख उनके अपने हाथ में नहीं है। ये ही वे महिलाएं हैं जो दावा करती हैं कि वे मां नहीं बनना चाहती। लेकिन मां बनने की यह चाहत तो प्रकृति ही हमें देती है। इसके लिए कहीं से जुगाड़ नहीं करना होता। बच्चे के कोख में आने के साथ ही मां उससे जुड़ जाती है। इस अहसास को एक गोद लिए बच्चे की मां या सरोगेट मदर कहां महसूस कर पाएगी। खूबसूरत है मातृत्व मां न सिर्फ अपने बच्चे का पालन पोषण करती है बल्कि किसी दूसरे बच्चे को देखकर ही उसके चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। यह मातृत्व से जुडे कुछ गुण हैं जो मां-बच्चे के बीच बॉडिंग बढ़ाते हैं। मां बच्चे की जरूरतों के हिसाब से अपनी लाइफ स्टाइल में धीरे-धीरे बदलाव लाती जाती है। मां की हर बात बच्चे की सुविधा के हिसाब से ही तय होने लगती है। इन चीजों को सिर्फमां बनने वाली महिला ही समझ सकती है। चुनने का हक जो महिलाएं यह कहती हैं कि मां बनने की जिम्मेदारियां उठा पाना उनके बूते की बात नहीं, वे इन अनुभवों को कभी जान ही नहीं पाई हैं। कुछ हैं जो प्रमोशन के लिए मातृत्व को टाल रही हैं, या जो फिगर खराब हो जाने के भय से ऎसा कर रही हैं। वे दूसरों के बच्चों को देखकर ही खुश हो लेती हैं। कोई बात नहीं, हमारे बच्चों को ऎसी आंटियों की भी तो जरूरत है जो दूसरे बच्चों पर ममता उंडेल कर खुश हो जाती हैं।
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