ईश्वर ने इंसान को एक जैसा ही बनाया है फिर चाहे वह महिला हो या पुरूष।शरीर की बनावट में जरूर अंतर है, लेकिन भावनाओं में नहीं। शरीर के विकास के साथ जो भावनाएं पुरूषों में उत्पन्न होती हैं, वही भावनाएं महिलाओं के दिलों में भी उठती हैं। लेकिन पुरूषों में ये भावनाएं जहां उनके पुरूषत्व का प्रतीक हंै, वहीं महिलाओं के लिए इसे कमजोरी करार दिया गया है। हर कदम पर महिलाओं पर पहरे लगाने वाले समाज ने उनकी भावनाओं तक पर पहरा लगा दिया है। कई पिछड़े मुल्कों में महिलाओं को इस भावना का एहसास भी नहीं करने दिया जाता। बच्चियों का खतना - "एफजीसी" (फीमेल जेनिटल कटिंग) करने की क्रूर प्रथा प्रचलित है। कहीं बच्ची बड़ी होते ही यौनेच्छा का अनुभव ना कर ले, नन्हीं बच्चियों की योनि के ऊपरी भाग से भग शिश्िAका उन्हें बिना बेहोश किए उस्तरे, चाकू या कांच से काट दी जाती है। दुनियाभर मेें हर साल खून से लथपथ और दर्द से कराहतीं तीन लाख से भी ज्यादा बçच्चयां इस प्रथा की बली चढ़ जाती हैं।130 लाख से भी ज्यादा महिलाएं यह दर्द झेल चुकी हैं। प्रथा का अनुसरण करने वालों का मानना है कि इससे बढ़ती उम्र की युवतियों में यौनेच्छा खत्म हो जाती है। पश्चिम एशिया, मलेशिया और इंडोनेशिया में भी ये मामले सामने आए हैं, यहां तक कि यूरोप, ऑस्ट्रेलिया जैसे विकसित देश भी इस प्रथा से अछूते नहीं हैं। इराक में लगा प्रतिबंध अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्था ह्यूमन राइट्स वॉच ने हाल ही में इराक के उत्तरी इलाके कुर्दिस्तान में स्थानीय सरकार से बçच्चयों के खतना पर प्रतिबंध लगाने की अपील की है। संस्था की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि यह प्रथा इराकी कुर्दिस्तान में व्यापक स्तर पर है। यहां 72 फीसदी बच्चियों का खतना किया जाता है। जिससे सिर्फ शारीरिक ही नहीं मनोवैज्ञानिक रूप से भी नुकसान होता है। इस अपील पर अभी फैसला नहीं हुआ है, लेकिन इसे लोगों का विरोध जरूर सहना पड़ रहा है। आpर्य की बात तो यह है कि इस अपील का विरोध करने वालों में महिलाएं भी शामिल हैं। सिर्फ कुर्दिस्तान ही नहीं विश्व में दर्जनों ऎसे देश हैं जहां यह क्रूर प्रथा प्रचलित है। कहीं खुलेआम, तो कहीं दबे छुपे। हालांकि कई देशों में इसे प्रतिबंधित किया गया है, लेकिन कई स्वयं सेवी संस्थाओं का दावा है कि जिस तरह हर कुप्रथा को लोग दबे छुपे अंजाम देते हैं, ठीक वैसे ही इस प्रथा का अनुसरण भी किया जा रहा है। अफ्रीका और मिस्त्र में इस प्रथा को मानने वाले सबसे ज्यादा हैं। मिस्त्र में यह आंकड़ा 97 फीसदी था। वहीं इथोपिया, गुएना, सूडान ऎसे देश हैं जहां परंपरा के नाम पर यह क्रूर अत्याचार किया जाता रहा है। मई 2010 में अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडिऎट्रिक्स ने यूएस लॉ से सिफारिश की कि उन डॉक्टर्स पर रोक लगा दी जाए जो इस जघन्य अपराध में साथ देते हैं, लेकिन इस पर भी कोई सुनवाई नहीं हुई। सुई से सिलता स्त्रीत्व सूडान में बच्ची की योनि के ऊपरी भाग से भग शिश्िAका काट दी जाती है और फिर उसे सुई-धागेे से सिल दिया जाता है। मूत्र और मासिक रक्तस्त्राव के लिए एक छोटा छेद छोड़ दिया जाता है। यह प्रक्रिया अत्यधिक पीड़ादायक होती है और कई बार यह नली किन्हीं कारणों से बंद भी हो जाती है, जिसके कारण उन्हें असहनीय दर्द झेलना पड़ता है। इस दर्द से छुटकारा उन्हें मौत से ही मिलता है। अत्याचार की यह दास्तान यहीं खत्म नहीं होती। सुई-धागे से सिले युवती के इस स्त्रीत्व का प्रमाण उसे पहली रात को अपने पति को देना पड़ता है। इस रात पति स्त्री की योनि में लगे टांकों को छुरी से खोलता है। यह टांके पहचान होते हैं उसके पवित्र स्त्रीत्व की, सहवास के साथ ही यह दर्द वह जीवनपर्यत सहन करती है। जहां मां भी नहीं समझती दर्द माना जाता है कि बच्चों की बात कोई ओर सुने ना सुने मां उन्हें जरूर सुनती है, फिर चाहे वो लड़का हो या लड़की, लेकिन 1997 में इजिप्ट में हुए सर्वे में जो परिणाम सामने आए, उसे देखकर लोग आश्चर्यचकित रह गए। यहां की 93 फीसदी से भी ज्यादा महिलाओं का मानना था कि महिलाओं का खतना होना गलत नहीं है। वहीं दस में से नौ मांएं या तो अपनी बच्ची का खतना करा चुकी थीं या करवाने वाली थीं। वष्ाü 2007 में मिस्त्र की हैल्थ मिनिस्ट्री ने इस क्रूर प्रथा पर उस समय रोक लगाई जब खतना के दौरान 12 वर्षीय एक बच्ची ने दम तोड़ दिया था। वहीं अफ्रीकी देशों की अधिकांश रूढ़ीवादी महिलाओं का मानना है कि खतना के कारण महिलाओं की शुद्धता और संतानोत्पत्ति की गारंटी हो जाती है और यौन अनैतिकता पर रोक लगती है। मौत के मुंह में डालने वाली प्रथा महिलाओं को खतने का दर्द जीवनपर्यत भोगना पड़ता है। इस रस्म के दौरान होने वाले दर्द से इतर उनमें यौन विकृतियां पैदा हो जाती हैं। मासिक धर्म और सहवास के दौरान उन्हें पीड़ा होती है। गर्भधारण और प्रसव में भी कई तरह की परेशानियां आती हैं। जून 2006 में डब्ल्यूएचओ द्वारा किए गए सर्वे में सामने आया कि जिन महिलाओं का खतना किया जाता है उनकी प्रसव के दौरान मृत्यु की आशंका 70 फीसदी अधिक होती है। इसमें सबसे अधिक परेशानी उन महिलाओं को होती है जिनके योनि मार्ग को सुई धागे से सिला जाता है। इन महिलाओं की संख्या 55 फीसदी है। एक अनुमान के अनुसार अफ्रीका में दस से बीस हजार बच्चों की प्रसव के दौरान सिर्फ इसलिए मृत्यु हो जाती है क्योंकि उनकी मां का खतना किया गया था, जिसके कारण उनमें यौन विकृति उत्पन्न हो गई थी। सदियों पुराना है दंश महिलाओं का खतना, करने की प्रथा सदियों पुरानी है। उस समय यह क्रिश्चिऎनिटी और इस्लाम दोनों में व्याप्त थी। 163 बीसी के एक भोजपत्र में महिलाओं के खतने की प्रथा का उल्लेख मिला है। जिससे यह अंदाजा लगाया जाता है कि इस प्रथा का उद्भव मिस्त्र और नील नदी घाटी में हुआ होगा। यही नहीं मिस्त्र में मिली ममीज से भी इस बात की पुष्टि होती है कि तब महिलाओं का खतना किया जाता था। पितृ सत्तात्मक परिवार है कारण सिर्फ अरब और मुस्लिम देशों में नहीं, हर समाज जो पितृ सत्तात्मक है, वहां पुरूषों को ज्यादा एहमियत दी जाती है। महिलाओं का खतना करना भी पुरूष्ाों के संतोष और उनके संतुष्ट होने का एक साधन मात्र है। हालांकि भारत में यह प्रथा प्रचलित नहीं है और यहां çस्त्रयों की स्थितियां कई देशों की çस्त्रयों के मुकाबले अच्छी है। इन कुप्रथाओं का अंत शिक्षा के माध्यम से ही किया जा सकता है। -प्रो. सुशीला जैन, समाजशास्त्री यह अमानवीय है बच्चियों को बिना बेहोश किए उनका खतना अमानवीय है। जो लोग इस नाम पर खतना करते हैं कि इससे यौनेच्छा या यौन अनैतिकताएं नहीं होंगी उनकी यह सोच बिलकुल गलत है। यौनेच्छा का संबंध हार्मोन्स से है ना कि योनि की बनावट से। इस तरह से खतना करने से योनि में कई तरह की विकृतियां हो जाती हैं, जिसके कारण ना सिर्फ सहवास के दौरान, बल्कि प्रसव में भी परेशानियां उत्पन्न होती हैं। कई तरह के इन्फेक्शन होने की भी आशंका रहती है। -डॉ. वीना आचार्य, स्त्री रोग विशेषज्ञ
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