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Tuesday, 07 September, 2010
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एड मी एज ए फ्रेंड
Wednesday, July 28, 2010, 11:23 hrs IST
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Khushboo
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एक श्रीकृष्ण-सुदामा की दोस्ती थी और एक आज की फेसबुक है। पूरी दुनिया दोस्त हो गई है और फेसबुक दुनिया की घनी आबादी वाला देश। यहां भाई भी दोस्त है तो पिता भी दोस्त। सब दोस्त बनने को आतुर।
सारे नाते-रिश्ते दोस्ती की नैया में सवार हो गए हैं। फिर भी रूबरू संवाद की कोई जगह तो बचती होगी।
कई हैं, जो फेसबुक आर्कुट पर ना होकर भी दोस्ती की अलख जगाए हुए हैं
मनुष्य ने अपने रक्त सम्बंधों से परे किसी दूसरे मनुष्य के साथ पहली बार जब अपने दुख और सुख साझा किए होंगे, तभी से मित्रता का बोध और भविष्य में उसकी जरूरत को चिह्नित किया गया होगा। मित्रता की जो सामान्य परिभाषा दी जाती रही है, उसके अनुसार एक सच्चा मित्र वह है जो संपूर्ण ईमानदारी, सत्यता और विश्वास के साथ जीता हो और उसमे किसी भी प्रकार से किए गए कार्यो के पुनर्भरण की मांग न हो, यानी जो मैं तुम्हारे लिए करता हूं, वह मेरे दिल से उपजा है और उसके बदले, उसी कार्य या किसी भी तरह से तुम्हारे द्वारा वापस लौटाए जाने की मेरी इच्छा नहीं है।
आज हम जिस विकसित दुनिया में जी रहे हैं, उसके उलट प्रारंभिक समय में मित्रता सिर्फ पुरूषों के बीच ही मानी जाती थी। महिलाओं को उस समय के समाज में अधिकार प्राप्त नहीं थे। जब मनुष्य ने पहली बार जाना कि मानव कल्याण के लिए व्यक्ति की नहीं, वरन समूह की जरूरत होगी, तभी उसने अपने मन से मिलने वाले लोगों का समूह बनाया होगा और इस तरह हमारे विकास की दिशा मित्रता से ही खुली है। जिस मित्रता के भाव से हम सामाजिक हुए, उसी ने ग्लोबल विलेज में आज महिला और पुरूष मित्रता के भाव को और जीवन में उसकी घुसपैठ को अति सामान्य बना दिया है।
भाई से ऊपर मित्रता
भारत जो चार किताबों वाला यानी सभी धर्म ग्रंथों का देश कहा जाता है। आपसी सद्भाव, विश्वास, उत्तम चरित्र, सहयोग, शुचिता और भयहीन रिश्ते को मित्रवत होना मानता है। आदर्शो के बड़े-बड़े उदाहरणों की जरूरत नहीं है। हमारे यहा गली-मोहल्लों में दोस्ती की ऎसी मिसालें देखेने को मिली हैं कि वे किंवदंतियां बन गईं। पुराणों से आज तक, कक्षा तीसरी के पाठ श्रीकृष्ण-सुदामा से लेकर कुत्ते की स्वामिभक्ति तक की कथाओं में दोस्ती अनमोल तोहफे और सौभाग्य के रूप में प्रतिष्ठित हुई है। यह सोचना कितना सुखद है कि एक राजा अपने बचपन के गरीब सखा के लिए तीन लोक मित्रता में भेंट कर दे। मित्रता के लिए धर्मयुद्ध में मां का जाया भाई विरोधी खेमे की ओर से लड़े, सिर्फ इसलिए कि दोस्ती को भाइयों से ऊपर रखना है। कर्ण पांडवों के खिलाफ ही युद्ध में काम आया था।
दोस्ती का विरोध
समाज के विकास के साथ-साथ दोस्ती के इस सफर ने नए आयाम रचे और नई-नई मुश्किलों का सामना भी किया। पति-पत्नी के रिश्ते से अलग किसी भी प्रकार के रिश्ते पर समाज आंखें मूंदकर अड़ा रहा। पश्चिम में समाज सुधार के आंदोलन हुए। दो समानलिंगी लोगों के साथ रहने के आचरण पर सबसे पहले धर्माध फतवे जारी हुए। इस तरह की जीवनशैली को बढ़ने से रोकने तो क्या, कुचलने के प्रयास किए गए। सिर्फ दौ सौ साल पहले के पश्चिम की ही बात क्यों करें? हमारे ही देश में दो साल पहले धर्म के नाम पर और मित्रता के विरोध में जाहिल गंवारों ने नौजवान लड़कियों और उनके मित्रों को पीटा, उनके सम्मान को क्षति पहुंचाई। फौरी तौर पर ऎसा लगा कि सरकार और समाज का रवैया इन जाहिलों के साथ है, मगर ये परिवर्तन का कदम है, जिसे रोक पाना किसी सत्ता के बस में ना होगा। वो चाहे धर्म के सहारे चलती हो या चुनाव के सहारे।
फूहड़ता को मिली जगह
महिलाओं के एक साथ रहने की जीवनचर्या को अमेरिकन लोग बोस्टन मेरिजेज कहते रहे हैं। दो महिलाएं जो बिना किसी पुरूष के सहयोग से एक ही छत के नीचे साथ रहती हों, बोस्टन मेरिज है। जरूरी नहीं कि वे शारीरिक रूप से भी जुड़ी हुई हों, किंतु इस सहवास को लेस्बियन आचरण माना गया। इस जीवनशैली को नाकारा जाता रहा है। इससे समाज की व्यवस्था के भंग हो जाने के खतरे रचे गए, किंतु ये अभी तक तो समाज को कोई आंच नहीं आई। लेकिन समलैंगिक मित्रों को फूहड़ता से जोड़कर देखा जाने लगा। अधिसंख्य çस्त्रयों और पुरूषों ने अपने आचरण में यथासंभव बदलाव किया या इन संबंधों को सार्वजनिक होने से बचाया। इस तरह की मित्रता पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने किसी भी रूप में जबरदस्ती ना करने का आदेश दिया है।
दोस्ती प्रेमालाप नहीं
फ्रैंडशिप को लेस्बियन और होमो जैसे शब्दों ने बहुत प्रभावित किया, लेकिन इस खूबसूरत एहसास ने अपनी उपस्थिति को और सुंदर बनाया है। आज भी अपने दु:ख और सुखों को बांटने के लिए मनुष्य मित्रों को बुलाता रहता है। प्रेम से अलग हटकर इस अनुभव को बहुत बार इससे भी जोड़ा गया कि जहां दोस्ती है, वहां प्रेम की आंच उपस्थित है। दो मित्र जो अपने निजी जीवन के तमाम अच्छे-बुरे पलों को बांटते हुए आगे बढ़ते हैं तो ये कतई जरूरी नहीं है कि वे प्रेमालाप में डूबे हैं। बेहद निजी सुरक्षा बोध का नाम भी तो है मित्रता। बीती सदी में मित्र क्लब हुआ करते थे, जहां एक सभी मित्र मिलते और आनंद मनाते। मित्रता हर हल में सामजिक ही है।
कॉफी हाउस और किटी
फ्रैंड्स क्लब में समय के साथ बदलाव आया, जैसे-जैसे तकनीक का विस्तार हुआ, दोस्ती के ठिकाने बदले। भारत में अस्सी और नब्बे का दशक दोस्ती को कॉफी हाउस और किटी पार्टियों से बाहर निकालकर सिनेमा घरों और थिएटरों में लेकर आया। पार्को और नदी किनारे होने वाले गोठ आयोजन भी रेस्त्रांओं की पार्टियों में बदल गए। खुशी के इजहार के लिए मित्रों को आमंत्रित करना सुकूनभरा हुआ। दु:खभरे क्षणों में भी मित्रों की पहुंच बढ़ने लगी। आठवें दशक के तीस साल बाद आज मास कम्यूनिकेशन के क्षेत्र में मिली आशातीत सफलता ने मित्र के मायने ही बदल दिए।
मित्रता का भी समारोह
मेरी एक मित्र अंजलि उड़ीसा की रहने वाली है। उसने वहां की एक खास परंपरा के बारे में बताया कि वहां पर मित्र बनाए जाने का रिवाज है। यह कार्यक्रम एक सार्वजनिक समारोह जैसा होता है, जो लगभग किसी अंगेजमेंट सेरेमनी जैसा होता है। किसी भी उम्र के दो विपरीतलिंगी इसमें मित्र हो सकते हैं। ऎज और सोशियल स्टेटस की कोई लिमिट नहीं है। समारोह के बाद दोनों परिवार का हिस्सा हो जाते हैं। दोनों परिवार बिना किसी रक्त संबंध के संबंधी हो जाते हैं। बेहतर समाज के निर्माण की भावना इसमें जरूर छिपी रही होगी। किस सुंदरता से आप अपने लिए एक नया घर और परिवार पाते हैं। टूटते हुए रिश्तों के बीच किसी ऎसे रिश्ते के बारे में सोचना बहुत प्रीतिकर लगता है.
क्लिक एंड फ्रैंड
तकनीक के इस युग में आज ऑरकुट और फेसबुक जैसी अनेक सोशल नेटवर्किग साइट्स उपलब्ध हंै। यहां दोस्ती के लिए उपयुक्त लोग मिलते हैं और कुछ ही क्लिक्स में आप फ्रैंड हो सकते हैं। इनके यूजर्स की संख्या भारत और चीन की आबादी के योग से भी अधिक है, जबकि वास्तविक रूप से दुनियाभर में इंटरनेट की पहुंच कुल आबादी के पांच फीसदी हिस्से तक पहुंचना भी मुश्किल लग रहा है। ऎसे में ये आंकड़ा आश्चर्यचकित करने वाला है। सोशल नेटवर्किग साइट्स ने मित्रता के जो नए स्वरूप सामने रखे हैं, वे चौंकाने वाले हैं। कहा जाता है कि एक सच्चा मित्र भी तकदीर से मिलता है, लेकिन फेसबुक पर फ्रैंड लिमिट पांच हजार की है और कल एक को एड करने के लिए मैंने क्लिक किया तो वह प्रोफाइल इस लिमिट को छू चुका था। कितना भाग्यशाली इंसान है वह, जिसके पांच हजार दोस्त हैं। एक दोस्त के मुकाबले पांच हजार तो मन में एक सवाल भी उठता है कि ये कैसी दोस्ती है, जिसमे इंसान को पांच हजार दोस्तों के नाम भी शायद ही याद हों।
शेष पृष्ठ 16 पर

आभासीय सुख
व्यक्ति अपने वास्तविक दुखों से मुक्ति पाने के लिए इस तरह की साइट्स पर जाता है। यहां के अनुभव वास्तव में किसी मनोरोगी को दिए गए सेडेटिव जैसे ही हैं कि जैसे ही आप उसके नशे से बाहर आए, समस्याएं जस की तस खड़ी होती हैं। आप फिर से उसी नशे में डूबकर उन्हें भूल जाना चाहते हैं। इन साइट्स पर निश्चित ही आपको नए लोगों से संवाद करने को मिलता है, किंतु ये इतनी समयखाऊ हैं कि हम अपने वास्तविक मित्रों की उपेक्षा करने लगते हैं। प्रकृति से हमारा संबंध टूटता जाता है। स्वास्थ्य के लिए कई गंभीर चुनौतियां भी यहीं आकर खड़ी हुई हैं। स्पर्श के सुख से हम वंचित होते जा रहे हैं और एक आभासी संसार में नकली गुलदस्ते भेजते हैं। न याद रहने योग्य जन्मदिनों पर मुबारकबाद देते हैं और जिंजर बीयर की तस्वीर पाकर ही सोचते हैं कि आज तो पार्टी हो गई।
फ्रेंडशिप के बहाने
फ्रेंडशिप के बहाने कारोबार में लगी हुई ये साइट्स धोखे का आवरण ओढ़े हुए हैं। फेसबुक का ही एक एप्लीकेशन है आर यू इंटरेसटेड? मुफ्त में नेट्वर्किग उपलब्ध करने का दावा यहां आते ही खुल जाता है। इसमें आप महिला या पुरूषों को ये बता सकते हैं कि मेरी आपमें रूचि है। आपको इस सेवा का लाभ उठाने के लिए छ: माह के दस डॉलर से शुरू हुआ प्लान चुनना होता है। इसके कई प्रीमियम वर्जन भी हैं। कुल मिलाकर इस एप्लीकेशन में अमेरिकन एडल्ट फ्रेंड फाइंडर से अलग कुछ नहीं है। यानी कोई सेवा समाजसेवा नहीं है, सब स्वपोषित और निस्वार्थ होने के दावे सब-कुछ वच्र्यूअल होने के बावजूद पैसा बटोरने के मामले में असली हैं। मेरे कुछ मित्रों का मानना है कि ऎसी मित्रता में कोई खोट नहीं है, मगर मैं उनसे पूछती हूं कि इसका हासिल भी क्या है? आपके सभी मित्र अपने व्यक्तिगत सुख और दुखों की जगह यू ट्यूब से लिए गए वीडियो, पुराने शायरों के शेर, अंग्रेजी में क्योट्स जो एसएमएस बनकर मोबाइल के जरिए आप तक पहले ही पहुंच चुके होते हैं, उन्हें बांटते रहते हैं। इस वच्र्यूअल फ्रेंडशिप में बातें भी वैसी ही हैं। इस समय और श्रम-धन खपाऊ कार्य से बेहतर है कि घर और परिवार के साथ समाज के सक्रिय हिस्से होकर असली सुख और दुखों में हाथ बढ़ाए जाएं। मित्र एक भी सच्चा मिल गया तो वह जीवन की सबसे बड़ी पूंजी होगी, ये कहावत आपको चरितार्थ होती दिखाई देगी।
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