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Tuesday, 07 February, 2012
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मेरी मर्जी
Wednesday, May 26, 2010, 09:24 hrs IST
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Khushboo
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क्या औरतों को मुख्य धारा से अलग रखना गैर इस्लामिक नहीं है या उनका जीवन उनकी अपनी पसंद से नहीं जीने देना गैर इस्लामिक नहीं है?
बेशक, यह गैर इस्लामिक है
महिला मुद्दों की बात की जाए तो मुस्लिम सोसायटी में यह हमेशा कंट्रोवर्शियल रहे हैं या बना दिए गए। हाल ही की बात लीजिए जब दुनियाभर में कुछ मुस्लिम महिलाएं अपने वजूद को बनाने के लिए जद्दोजहद में जुटी हैं, वहां एक और फतवा जारी हुआ कि महिलाओं का कमाना शरीयत के खिलाफ है। उनका गैर मर्दोü के साथ काम करना या उनसे बात करना गैर इस्लामिक है। एक बात गौर करने लायक है कि क्या औरतों को मुख्य धारा से अलग रखना गैर इस्लामिक नहीं है या उनका जीवन उनकी अपनी पसंद से नहीं जीने देना गैर इस्लामिक नहीं है? बिल्कुल, यह है गैर इस्लामिक।
धर्म के नाम पर महिलाओं को आगे बढ़ने से रोकने वाले क्यों भूल जाते हैं कि इस धर्म में महिलाओं को पुरूषों के बराबर अधिकार दिए गए हैं। जितने जोर-शोर से उनके रहन-सहन के खिलाफ फतवे जारी होते हैं इतने बड़े स्तर पर अधिकारों की चर्चा न आज तक सुनी, ना ही पढ़ी। मैं भी मुस्लिम परिवार का एक हिस्सा हूं। पूरा माहौल इस्लामी तालीम से भरपूर रहा। लेकिन वहां कहीं महिला विरोधी बात सुनने को नहीं मिली। शरीयत (मुस्लिम पर्सनल लॉ), हदीस (जो पैगम्बर मोहम्मद साहब ने कहा), कुरआन सभी की इतनी जानकारी तो है कि अपने अधिकारों और गैर इस्लामिक तौर-तरीकों को जान सकूं।
औरतों का घर से बाहर निकलकर कमाने से ताल्लुक है तो आज भी मुस्लिम औरतों की स्थिति अच्छी नहीं है। दुनियाभर के उच्च पदों पर मुस्लिम महिलाएं हैं। चाहे वह ब्रिटिश कैबिनेट में पहली मुस्लिम महिला सईदा वारसी हों या मिस यूएसए रीमा फाकीह, या अनोशेह अंसारी जो स्पेस टूरिस्ट के तौर पर नाम दर्ज करवाने वाली पहली मुस्लिम महिला है। फिर क्यों बाकी मुस्लिम महिलाएं बदहाल जीवन जीएं? बात इस्लामिक तौर तरीकों की की जाए तो वह जितने उस जमाने से मेल खाते हैं, जब बनाए गए थे, उतने ही मॉडर्न आज भी हैं।
तब भी थीं वर्किग
इस्लाम का संदेश देने वाले हजरत मोहम्मद साहब की पहली बीवी खदीजा की व्यापार के सिलसिले में ही उनसे मुलाकात हुई और यह शादी में तब्दील हुई। वर्किग होने के नाते उन्होंने अपने घर, परिवार और सोसायटी को काफी कुछ दिया। दूसरी बीवी आयशा सिद्दीका भी हदीस स्कॉलर थीं। हदीस की जानकारी लेने वाला हजरत साहब के पास आता था तो वे उसे आयशा के पास भेज दिया करते। कहा जा सकता है कि ना तो औरतों की एजुकेशन और उनके कमाने को लेकर तब कोई बंदिश थी।
इस्लाम और औरतों के अधिकार
समानता का अधिकार
पति से मैंटेनेंस मांगने का अधिकार
पति चुनने का अधिकार
शादी के लिए कोई दबाव नहीं डाल सकता
चाहें तो शादी के बाद भी सरनेम पिता से जुड़ा ही रख सकती हैं।
शादी के बाद शौहर उसका ठीक से खयाल नहीं रख रहा तो खुला ले सकती है
तलाक के बाद उसका बच्चे पर पहला अधिकार है।
खुदा ने फरमाया है कि मेरे दरबार में सभी बराबर हैं, फिर चाहे मर्द हों या औरत, छोटा हो या बड़ा। यानी वहां पर्दे या औरत का मर्दोü के साथ खड़े होने को कोई मसला नहीं माना गया है तो इस पर इतना बड़ा इश्यु क्यों बनाया जा रहा है। मैं वर्किग वुमन के रूप को गैर इस्लामिक नहीं मानती। हमें भी अपनी तरह से जीवन जीने का पूरा हक है। कहा जाता रहा है कि एक महिला शिक्षित है तो पूरा परिवार शिक्षित होगा, आने वाली पीढियां शिक्षित होंगी, तो जरूरी है कि हर औरत शिक्षा ले और आगे बढ़े।
यास्मीन अख्तर, वकील
महिलाओं को काम करना चाहिए या नहीं इस पर चर्चा क्यों हो रही है। महिलाओं के जिस काम से पूरे समाज को आगे बढ़ने का या दुनिया में पहचाने जाने का मौका मिलता है, वह बुरा कैसे हो सकता है। आज शिक्षित या वर्किग होने के कारण ही विधवा, तलाकशुदा और बेसहारा औरतें सम्मान के साथ जी पा रही हैं। सम्मान के साथ जीने का अधिकार तो इस्लाम में पहले नम्बर पर है। हमारे समाज के ही कुछ लोग महिलाओं के लिए रिजर्वेशन की बात करते हैं, वहीं कुछ लोग घर के बाहर निकलने को ही बुरा बताते हैं। ऎसी दोहरी नीति महिलाओं के हक में नहीं है।
जीनत कैफी, पत्रकार
हाल ही में जारी हुए फतवे को लेकर मीडिया में काफी कुछ गलत पेश किया जा रहा है। माना इस्लाम में काम करने या बाहर निकलने पर पाबंदी नहीं है लेकिन इसके लिए भी कई रूल्स हैं। यह कि महिलाएं परदे में रहकर काम करें, बेहयाई से बचें, अच्छा नजरिया रखें और खुद को बदनामी से बचाएं। परदे का सवाल है तो महिला के बंदिश के तौर पर नहीं है बल्कि कई अपराधों जैसे छेड़छाड़ या यौन अपराधों की रोकथाम के लिए है।
शाकिरा खातून, जमाते इस्लामी हिंद, राजस्थान संयोजिका
महिलाओं के लिए बाहर निकलने या काम करने पर इस्लाम में कहीं पाबंदी नहीं है। महिलाएं पढ़ी-लिखी होंगी या कामकाजी होंगी तो आने वाली पीढ़ी भी उतनी ही एजुकेटेड होगी। यदि वे काम नहीं करेंगी तो जरूरतमंद औरतों को सहारा कौन देगा।
इशरत बानो, जमाते इस्लामी हिंद, जयपुर जिला महिला संयोजिका
परवीन और बेटी हीना
मैं तो पढ़-लिख नहीं सकी, लेकिन चाहती हूं कि बेटी बहुत आगे जाए। अभी ट्वैल्थ कॉमर्स में उसने 91.6 प्रतिशत अंक प्राप्त किए हंै। मैं अपने सारे सपने उसमें पूरे होते हुए देखती हूं। बेटी जो करना चाहेगी, हमें मंजूर होगा। यदि वह अपने काम से हमारे कुनबे का नाम रोशन करती है तो इससे बढ़कर सम्मान क्या होगा। बेटी हिना कौसर मंसूरी का कहना है कि मेरा अच्छा रिजल्ट अम्मी की बदौलत रहा है। मेरी नजर में सिर्फ मुस्लिम ही नहीं हर समाज की लड़कियों के लिए एजुकेशन जरूरी है। देश की तरक्की औरत पर ही डिपेंड है। मैं आगे एमबीए करना चाहती हूं।
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