पूरी दुनिया में स्त्री आजादी की प्रतीक मानी जाने वाली गोली ना जाने क्यों भारत में एक तरफ धकेल दी गई है। गोली यहां हमजोली नहीं बन पाई। बच्चों में दूरी के बजाय भारतीय पत्नी झटपट दो-तीन बच्चों की मां बन जाती है और फिर याद आता है परिवार नियोजन। वह भी कानाफूसी में मिले उपायों के बाद। ठोस अध्ययन के साथ कोशिश मुद्दे को समझने की... बर्थ कंट्रोल पिल इस साल अपनी पचासवीं सालगिरह मनाने जा रही हंै दुनियाभर में फैली अपनी "सहेलियों" के साथ... मेरी शादी वाला दिन है और मुझे अपने सबसे ज्यादा अजीज (और अनुभवी भी) लोगों से सलाह मिलती है वह भी बिन मांगे। वर्किग फे्रंड बताती है कि काम में व्यस्तता के बावजूद पति के लिए कैसे समय निकालूं, घरेलू कामों में माहिर दोस्त से किचन के लिए जरूरी स्मार्ट कुकिंग टिप्स, घर को कुशलता से मैनेज करने वाली सहेली से हाऊस हंटिंग टिप्स और सोशल बटरफ्लाईज से फैशन टिप्स आदि-आदि। लेकिन कॉन्ट्रासेप्शन! यही एक ऎसा मुद्दा है जिस पर ये सभी सहेलियां एकमत होते हुए सलाह देती हैं, "पिल्स! कभी नहीं"। इन्हें लेने के बारे में सोचना भी मत। ऎसा क्यों। सोच में पड़ जाती हूं जानने की उत्कंठा भी है। पिल्स पर हुए एक सर्वे के नतीजे आश्चर्य में डालने वाले हैं कि करीब 90 फीसदी महिलाएं इन्हें लेने की मनाही करती हैं क्योंकि उन्होंने इसके साइड इफेक्ट्स, वजन बढ़ जाएगा, पीरियड्स की प्रॉब्लम्स, कैंसर हो जाएगा और यहां तक कि बच्चा ठहरने में दिक्कत भी हो सकती है, के बारे में सुन रखा है। हां, यह बात और है कि उन्होंने अभी तक इन पिल्स को आजमाया ही नहीं है। भारतीय महिलाओं की बहुत छोटी संख्या है जो इन्हें इस्तेमाल कर रही हैं। यह बात चकित करती है क्योंकि पिछले पचास सालों में पूरी दुनिया में महिलाएं इन्हें इस्तेमाल करती आई हैं और इसे बीसवीं सदी के सबसे बड़े आविष्कार की संज्ञा दी जा चुकी है। पूरब और पश्चिम पूरी दुनिया में करीब दस करोड़ से भी ज्यादा महिलाएं इन गर्भ निरोधक गोलियों का सेवन कर रही हैं। पश्चिम में यह गोलियां महिलाओं को सेक्सुअल आजादी दिला रही हैं। वहां गर्भ निरोध के तौर पर इन्हें तवज्जो दी जा रही है, वहीं भारत में इनके बारे में यह स्थिति बेहद निराशाजनक है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के नतीजे बताते हैं कि मात्र तीन फीसदी महिलाएं हैं जो इन्हें इस्तेमाल कर रही हैं। यह शहरी भारतीय महिलाएं जहां पाश्चात्य संस्कृति का अनुसरण करती हैं और अपनी सेक्सुअलिटी को लेकर ज्यादा जागरूक और एक्सपेरीमेंटिंग हैं, वहां यह स्थिति है। ज्यादातर युवा लड़कियां रोजाना यह गोलियां लेकर अपनी सेक्स लाइफ को उजागर नहीं करना चाहतीं। कॉॅलेज स्टूडेंट है चौबीस वर्षीय सुनिधि, कहती हैं मैं खुद को सेक्सुअली एक्टिव रहने वालों की श्रेणी में नहीं दर्शाना चाहती। मेरा बॉयफ्रेंड और मैं दो या तीन महीने में एक साथ होते हैं, ऎसे में किसी चीज को रोजाना लेने का क्या तुक है? 26 वर्षीय प्रिया इन गोलियों को लेने से इसलिए डरती है कि इससे कहीं मेरा वजन नहीं बढ़ जाए। वह कहती हैं, सप्ताह में करीब तीन बार "ऎसा" होता है विशेषतौर से वीकेंड्स में, तो कई बार महीनों भी बीत जाते हैं जब ऎसा नहीं हो पाता। ऎसे में मुझे इन गोलियों के लेने की जरूरत महसूस ही नहीं होती। ज्यादातर युवा लड़कियां इस बारे में तर्क करती हैं कि महीने में एकाध बार ऎसा होने की स्थिति में इन्हें लेने का क्या तुक है जबकि गर्भ निरोधकों के दूसरे विकल्प भी मौजूद हैं। पश्चिम में जहां यह गोलियां महिलाओं को अपनी पसंद चुनने का अधिकार दे रही हैं वहीं दूसरी ओर भारत में गर्भ निरोधक चुनने का अधिकार केवल पुरूष्ाों के ही हाथ में सुरक्षित है। नीतू कहती है, मेरे बॉयफ्रेंड को कंडोम से एतराज है। उसका कहना है कि तुम्हें आईपिल ले लेनी चाहिए। अमेरिका और दूसरे कई पश्चिमी देशों में पिछले पचास सालों में इन पिल्स को लेकर काफी हल्ला मचा है। इल्जाम है कि यह गोलियां न सिर्फ रिश्तों में बदलाव लाई हैं बल्कि इन्होंने युवा लड़कियों को काफी हद तक स्वच्छंद व्यवहार के लिए भी प्रेरित किया है। लेकिन हमारे यहां शादीशुदा जिंदगी और शादी से पहले सेक्स को दो अलग-अलग नजरिए से देखा जाता है, अलग तरह से ट्रीट किया जाता है इसलिए यहां इन गोलियों को लेकर युवा लड़कियों को टारगेट नहीं बनाया गया। हमारे यहां यह गोलियां सरकार की मार्केटिंग का हिस्सा है उन शादीशुदा महिलाओं के लिए जिन पर पति की जरूरतों को पूरा करने की जिम्मेदारी है लेकिन दो से ज्यादा बच्चे पैदा नहीं करने हैं। महिला चिकित्सालय में असोसिएट प्रोफेसर डॉ. उषा शेखावत बताती हैं सौ में से करीब तीस महिलाएं हैं जो कॉन्ट्रासेप्शन के बारे में परामर्श के लिए आती हैं। सेहत हुई खराब घरेलू नौकरानी के रूप में काम करने वाली32 वर्षीय मीना कहती हैं,17 की उम्र में ही शादी हो गई थी। तब टीवी पर बार-बार माला डी का विज्ञापन दिखाया जाता था। इन गोलियों ने मेरी सेहत का सत्यानाश कर दिया था तबसे इन पर भरोसा करने को जी नहीं चाहता। डॉ. शेखावत कहती हैं दरअसल, इन पिल्स के बारे में जागरूकता का अभाव है। वे सुनी सुनाई बातों पर यकीन कर लेती हैं कि कैंसर हो जाएगा। जबकि ये गोलियां कैंसर से बचाव करती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह गोलियां औसत भारतीय महिलाओं के हिसाब से नहीं हैं और उन्हें इन्हें नहीं लेना चाहिए। डीपो प्रोवेरा जैसी इंजेक्टेबल दवाएं ज्यादा सुरक्षित, प्रभावकारी और सुविधाजनक हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक भारत में विशेषकर गांवों में महिलाएं कुपोषण, खून की कमी और लो बीएमआई (बॉडी मास इंडेक्स) की शिकार हैं। 78 फीसदी प्रेगनेंसीज अनियोजित होती हैं और इनमें से भी 25 फीसदी प्रेगनेंसी अनचाही होती हैं। ऎसे मेें मीना जैसी कम पढ़ी-लिखी और साधनहीन महिलाएं अबॉर्शन जैसे दूसरे खतरों से बचने के लिए चिंतित रहती हैं और बिना सोचे समझे जो मिले वहीं उपाय अपनाने को मजबूर हैं, चाहे उनके साइड इफेक्ट्स जो भी हों। पिल नहीं आई-पिल खतरनाक शहरी भारत में यह बदलाव अपेक्षाकृत तेजी से आए हैं। इन लड़कियों के लिए बहुत धैर्य रखने के बावजूद महीने में तीन या चार बार आई पिल की जरूरत पड़ सकती है, प्राइमरी गर्भ निरोधक के रूप में। शहर की एक जानी-मानी स्त्रीरोग विशेष्ाज्ञा कहती हैं, आईपिल, जैसे दूसरे और कई ब्रांड्स डॉक्टर के प्रिस्क्रिप्शन्स के बिना बाजार में आसानी से मिल रहे हैं। गैर-शादीशुदा युवा लड़कियों के लिए इनकी मार्केटिंग की जा रही है। वह कहती हैं, सुविधाजनक, सस्ती और मुसीबत से दूर रखने के गुण की वजह से यह गोलियां इन युवतियों का भरोसा जीत चुकी हैं। उनके लिए यह प्रेगनेंसी से बचने का सबसे बड़ा उपाय है। लेकिन वह यह नहीं जानती कि इनके उपयोग से वे एसटीडी (सेक्सुअली ट्रांसमिटेड डिजीज) जैसी समस्याओं से नहीं बच सकती। दस साल पहले मैंने हर्पीज (एक प्रकार का चर्म रोग) के किसी पेशेंट का इलाज नहीं किया था लेकिन आज मेरे पास ऎसे मामले रोज आ रहे हैं। डॉ. उषा कहती हैं, अनचाहे गर्भ से बचाव के लिए आई पिल सरीखी गोलियां अच्छी हैं लेकिन इनका मिसयूज बहुत हो रहा है। दरअसल लोगों ने इन्हें भी कॉन्ट्रासेप्शन का ही एक तरीका मान लिया है। जल्दी रिपीट किया जाए तो साइड इफेक्ट्स होते हैं। लड़कियां एक महीने में दो-तीन बार ले लेती हैं इन्हें। फिर शिकायत लेकर आती हैं कि बार-बार ब्लीडिंग हो रही है। ये लड़कियां कई बार ऎसी स्थिति में हमारे पास आती हैं जब परेशानियां हद से बढ़ चुकी होती हैं।
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