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Tuesday, 07 February, 2012
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हवा छू रही है
Wednesday, July 21, 2010, 12:14 hrs IST
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Khushboo
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सऊदी अरब ज्यादातर इस्लाम, तेल के कुंओं और अय्याश शेखों के लिए जाना जाता है, लेकिन पिछले कुछ बरसों में यहां की जीवन शैली में खासा बदलाव आया है। यहां की महिलाएं भी अब इंसान होने का हक मांगने लगी हैं। वे ऎसी जिंदगी की अभिलाषा करने लगी हैं, जिसमें उनके साथ गुलामों जैसा बर्ताव न किया जाए। शायद इसलिए ही वे तनख्वाह पर शौहर रख रही हैं। मैमूना का कहना कि यहां की महिलाएं बंदिशों के बीच जिंदगी गुजारती हैं। उन्हें हर बात के लिए अपने पिता, भाई, शौहर या बेटे पर निर्भर रहना होता है। लेकिन अब बदलाव की हवा चलने लगी है। जो लड़कियां यूरोपीय देशों में पढ़कर आती हैं, वे इस माहौल में नहीं रह पातीं। उनकी देखा-देखी यहां की लड़कियों ने भी खुली फिजां में सांस लेना शुरू कर दिया है। ये महिलाएं विदेशी लड़कों को पसंद करने लगी हैं क्योंकि वो उन पर जुल्म नहीं करते। उनके जज्बात समझते हैं। उनके साथ जंगलियों जैसा बर्ताव नहीं करते। वे हिंदुस्तान और पाकिस्तान से रोजगार के लिए आने वाले बेरोजगार लड़कों को एक निश्चित अवधि के लिए अपना शौहर बनाती हैं और इसके लिए बाकायदा उन्हें तनख्वाह देती हैं। उनका मानना है कि ऎसे रिश्तों में महिलाएं अपनी बात रख सकती हैं और उनकी जिंदगी गुलामों जैसी नहीं होती।
तनख्वाह पर शौहर
अरब न्यूज के मुताबिक ऎसी शादी करने वाली रिगदा का कहना है कि इस विवाह से उसकी कई परेशानियां दूर हो गई हंै। उसने बताया कि अपनी पहली नाकाम और तल्ख अनुभव वाली शादी के बाद उसने तय कर लिया था कि अब वह कभी शादी नहीं करेगी, लेकिन एक सहेली ने सलाह दी कि वह किसी बेरोजगार व्यक्ति से शादी कर ले। उसने बताया कि पहले तो उसे यह बात मजाक लगी, लेकिन जब मिसालें सामने आईं तो ऎसा लगा जैसे यह सौदा दोहरे फायदा का है। यानी एक तो कानूनी सरपरस्त मिल जाएगा और वह हुक्म देने के बजाय हुक्म मानने वाला होगा। वह जब भी किसी बात की इजाजत मांगती उसका शौहर उसे प्रताडित और परेशान करता। अब उसका बेरोजगार शौहर उसे हर काम की फौरन इजाजत दे देता है।
टैक्सी ड्राइवर से शौहर
ऎसा ही विवाह करने वाले माजिद कहते हैं, वो टैक्सी ड्राइवर था। एक दिन उसे वह सवारी मिल गई जो अब उसकी बीवी है। बतौर ड्राइवर बड़ी मुश्किल से दो हजार रियाल (अरब की मुद्रा) कमा पाता था वहीं अब बीवी से छह हजार रियाल मिल जाते हैं। बीवी ने तो यहां तक कह दिया है कि अगर वो उच्च शिक्षा हासिल करना चाहते हैं तो उसका खर्च भी वह उठाने के लिए तैयार है। उसकी बीवी उम्र में14 साल बड़ी है। उसने यह वायदा किया है कि कुछ साल बाद वो किसी जवान लड़की से उसकी शादी करा देगी।
हर माह सात हजार रियाल
रीम ने बताया कि उसने भी एक बेरोजगार लड़के से शादी की थी। इसके लिए बाकायदा वो अपने शौहर को तनख्वाह देती है, लेकिन उसने यह काम अपने घर वालों से छुपकर किया है। जब लड़के को इस बात का पता चला तो वो उससे ज्यादा पैसे मांगने लगा। हाल ही में सऊदी अरब से हिंदुस्तान आए मुबीन कहते हैं कि मैं भी सोच रहा हूं कि क्यों न एक निकाह वहां भी कर लूं। आखिर चार निकाह का विशेषाधिकार जो मिला हुआ है। वे बताते हैं कि उनके एक शादीशुदा पाकिस्तानी दोस्त अबरार ने वहां की महिला से शादी कर ली। उसे अपनी बीवी से हर माह सात हजार रियाल मिलते हैं। रहने के लिए अच्छा मकान भी मिल गया है। कपड़े और खाने का खर्च तो बीवी ही उठाती है। शादी का यह सौदा दोनों के लिए फायदेमंद साबित हो रहा है। जहां बेरोजगार लड़कों को शादी रूपी नौकरी से अच्छी तनख्वाह मिल जाती है वहीं महिलाओं को भी कम उम्र के लड़के मिल जाते हैं।
मेरा पति तो नहीं?
जयपुर की माजिदा हैरानी जताते हुए कहती हैं कि क्या सचमुच सऊदी अरब में ऎसा हो रहा है। माजिदा के शौहर परवेज को अरब गए पांच साल हो गए। उनके तीन बच्चे भी हैं। वे उदास होते हुए कहती हैं कि कहीं उनके शौहर ने भी वहां नया घर ना बसा लिया हो। उसकी आंखें भीग जाती है, गला रूंध जाता है। माजिदा का सवाल उन औरतों का दर्द बयां करता है जिनके शौहर रोजी-रोटी के लिए परदेस गए हैं और लालच और मजबूरी में वहां घर बसाए बैठे हैं। काबिले गौर है कि सऊदी अरब में शरिया (इस्लामी कानून) लागू है। यहां की महिलाओं पर तरह-तरह की बंदिशें हैं। शायद इसलिए अमीर औरतें शादी का सौदा कर रही हैं।
लड़कियों क ी शादी की उम्र तय नहीं
सऊदी अरब में विवाह के लिए लड़कियों की न्यूनतम उम्र भी निर्घारित नहीं है। इसका फायदा उठाते हुए बूढ़े शेख गरीब घरों की कम उम्र की बçच्चयों से शादी कर लेते हैं। समझदार होने पर ये अमीर हुई लड़कियां अपने लिए शौहर खरीद लेती हैं। इसी साल अप्रेल में रियाद के बुराइधा कस्बे की एक अदालत ने 12 साल की लड़की को उसके 80 साल के शौहर से तलाक दिलाया था। पिछले साल इसकी मर्जी के खिलाफ परिवार वालों ने उसकी शादी उसके पिता के 80 वर्षीय चचेरे भाई से कर दी थी। बदले में परिवारवालों को साढ़े 14 हजार डालर मिले थे। इस जुल्म के खिलाफ लड़की ने आवाज उठाई और एक अदालत में तलाक के लिए अर्जी दाखिल कर दी। राहत की बात है कि अब सरकार लड़कियों की शादी की न्यूनतम उम्र तय करने पर गौर कर रही है।
बदलाव की सुगबुगाहट
सऊदी अरब के शाह अब्दुल्ला बिन सऊद की बेटी शहजादी अदेला
बिन्त अब्दुल्ला ने इस शादी को बाल अधिकारों का उल्लंघन करार दिया है। सऊदी अरब के न्याय मंत्री ने बच्चों की खरीद-फरोख्त पर अंकुश लगाने के लिए कड़े कानून लाने का प्रस्ताव रखा था। गौरतलब है कि सऊदी अरब में बाल विवाह के खिलाफ कोई कानून नहीं है। मानवाधिकार संगठनों ने भी लड़कियों की शादी की न्यूनतम उम्र 16 साल करने की सिफारिश की है। अब सरकार ने इस बारे में फैसला लेने के लिए तीन समितियों का गठन किया है। बाल विवाह समर्थकों का कहना है कि ऎसे विवाह अरब की संस्कृति का हिस्सा हैं और इसे रोकने की कोशिश नहीं की जानी चाहिए। ये लोग मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के खिलाफ मोर्चा खोले रहते हैं। उनका मानना है कि उदारवाद से समाज में बिगाड़ पैदा होगा।
पहली बार एक महिला मंत्री
इस क्रूर और अन्यायपूर्ण व्यवस्था ने सऊदी अरब को दुनिया का सबसे बड़ा मानवाधिकारों का उल्लंघन करने वाला देश बना दिया है। सऊदी अरब के शाह अब्दुल्ला ने पिछले साल फरवरी में अपने मंत्रिमंडल में पहली बार किसी महिला को शामिल कर संदेश दिया कि वे सुधारवादी हैं। 14 फरवरी 2009 को नोरा अल फैज नाम की महिला को उप मंत्री बनाने का एलान किया गया। अब्दुल्ला वर्ष 2005 से सत्ता की बागडोर संभाल रहे हैं। तब से पहली बार उन्होंने मंत्रिमंडल मेें फेरबदल किया है। इस मुस्लिम देश में किसी महिला को सौंपा गया यह सबसे बड़ा पद है। इस्लामी कानून वाले देश में महिलाओं व पुरूषों की सार्वजानिक स्थल पर एक साथ मौजूदगी पर भी प्रतिबंध है। महज पांच फीसदी महिलाएं ही घरों से बाहर निकल कर काम पर जाती है।
जिरह का भी हक नहीं था
सऊदी अरब की सरकार ऎसा नया कानून लाने की योजना बना रही है जिसके तहत पहली बार महिला वकीलों को अदालत में जिरह करने का हक हासिल होगा। अभी तक वे परदे के पीछे से पुरूष वकीलों की मदद करती थीं। यहां के न्यायमंत्री के मुताबिक महिला वकील पारिवारिक मुकदमों में जज के सामने जिरह कर सकेंगी, जिनमें तलाक और वाल्देन (माता-पिता) के बीच बच्चों की देखभाल के अधिकार वाले मुकदमे शामिल होंगे। इसका मकसद देश की कानून व्यवस्था में सुधार के साथ महिलाओं को उनके व्यवसाय में और ज्यादा जिम्मेदारी देना है। शाह अब्दुल्ला कोशिश कर रहे हैं कि महिलाओं के प्रति लोगों के बर्ताव और सोच में बदलाव आए। पिछले साल शाह अब्दुल्लाह ने एक बड़े विश्वविद्यालय की स्थापना की थी, जिसमें महिला-पुरूष ं एक साथ पढ़ सकेंगे। गौरतलब है कि जहां सऊदी अरब जैसे कट्टरपंथी देश में सह-शिक्षा की सुविधा दी गई हैं, वहीं भारत जैसे धर्म निरपेक्ष देश में कट्टरपंथी फतवे जारी कर सह-शिक्षा को गैर इस्लामी करार दे रहे हैं। खुशनुमा एहसास है कि सऊदी अरब में भी बदलाव की बयार बहने लगी है। कभी न कभी वहां की महिलाओं को वे सभी अधिकार मिल सकेंगे जो सिर्फ मर्दो को ही हासिल हुए हैं। बहरहाल एक नई सुबह की उम्मीद तो की जा सकती है।
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