आजादी के बाद कभी जातीय जनगणना नहीं हुई। जरूरी भी नहीं लगा या कह सकते हैं कि यह दाव-पेंच वाला मसला रहा। वोट बैंक के लिए जातिगत संख्या का इस्तेमाल हो सकता था, जातीय कट्टरता बढ़ सकती थी और तकनीकी समस्या भी थी। कुछ जातियां जो बिहार में पिछड़ी समझी जाती थीं वही उत्तर प्रदेश में सामान्य तबके में शामिल थीं। ऎसे में पूरे देश के लिए पिछड़ा वर्ग का निर्घारण कैसे हो? अब फिर से यह मांग उठी है कि जातिगत गणना हो क्योंकि आरक्षण का आधार 1931 की जनसंख्या है। जनगणना अघिकारी "प्रतीक्षा" आए और हमसे पूरी जानकारी मांगी। नाम, जगह, उम्र, जन्म स्थान, निर्भर लोगों की संख्या.. और ऎसा ही बहुत कुछ।.... मैं इंतजार कर रहा था कि वे उस अहम और विवादास्पद मुद्दे पर आएं, जाति, लेकिन उन्होंने ऎसा नहीं किया। कारण बताया कि वे अभी इस बारे में सरकार के फैसले का इंतजार कर रहे हैं। ...मैंने उनसे कहा सरकार का फैसला कुछ भी हो, मेरा जवाब तैयार है, मेरी जाति भारतीय है। मेरे पिता ने कभी जाति प्रथा में विश्वास नहीं किया और न ही हम में से कोई करता है। मेरे पिता ने एक सिख से शादी की, मैंने बंगाली से, मेरे भाई ने सिंधी से, बेटी ने पंजाबी से और बेटे ने मंगलूर निवासी से। -अमिताभ बच्चन मेरी दृष्टि में तो जातीय जनगणना उचित नहीं है। सरकार का यह फैसला आरक्षण की राजनीति के आधार पर लिया गया है। 1931 में अंग्रेजों ने जातीय आधार पर जनगणना करवाई थी और उसी आधार पर आरक्षण दिया जाता रहा है। लेकिन जब मंडल कमीशन के बाद यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि ओबीसी में कितनी जनसंख्या है तो जातीय आधार पर जनगणना करवाने का मुद्दा उठाया गया। सरकार जातियों की वास्तविक स्थिति जानने के लिए यह निर्णय कर सकती है। लेकिन परिणाम अच्छे नहीं होंगे। यह विघटन को बढ़ावा देने वाला होगा। आरक्षण का मूल उद्देश्य था, वंचितों को सवर्णों के बराबर लाना वो तो 60 सालों में हो नहीं पाया। आज हर तबका आरक्षण चाहता है यानी वह खुद को वंचित समझने लगा है। ऎसे में आरक्षण की नीतियों पर फिर से मंथन करने की जरूरत है। वैसे भी इनसान की पहचान उसके गुणों से होनी चाहिए, जाति से नहीं। किसी का व्यक्तित्व जाति से नहीं उसकी शिक्षा और संस्कारों से होता है। यह पहचान जरूर देती है, लेकिन यह पहचान इतनी भी सुप्रीम नहीं होती कि उसके सामने सभी चीजें शून्य हो जाएं। प्रो. आशा कौशिक डीन, सोशल साइंस जातीय आधार पर जनगणना यानी पीछे लौटना। ऎसे में तरक्की की बात करना ही बेकार है। ये बातें कि इनसान की काबलियत देखो, उनके मायने खत्म हो जाएंगे। सरकार का यह कदम कई समाज को कई छोटे-छोटे समूहों में बांट देगा अमिताभ बच्चन जब कहते हैं कि मैं भारतीय हूं, देश सुनता है। मैं कहूंगी तो कौन सुनेगा। जातिवाद में मेरा भी यकीन नहीं। बहुत से परिचित लोग भी नहीं जानते कि मैं कौनसी जाति की हूं। मैं कभी किसी ऎसे प्रोग्राम में शरीक नहीं होती जिसमें जाति विशेष की अगुवाई करनी हो। धर्मेन्द्र कंवर ट्रेवल राइटर मेरे जीवन में जाति का कोई स्थान नहीं है। परवरिश ही इस तरह हुई है कि धर्म भी कोई मुद्दा नहीं रहा। मैं धर्म पर बात करना भी ठीक नहीं समझतीं। मैं भारतीय हूं, इतना बहुत है। हम 21वीं सदी में जी रहे हैं। एक समय था जब जाति मायने रखती थी। अब जातीय आधार पर लोगों को गिनना उन्हें बांट देगा। वैसे सबकी अपनी संस्कृति है, आचार-व्यवहार है। अपने घर में आप उस अनुसार रहिए न! कौन रोकेगा? लेकिन साथ ही अपने दैनिक जीवन में सबको समान समझना भी जरूरी है। जाति के बारे में विचारते रहे तो यह कैसे संभव होगा? डॉ. रीमा हूजा इतिहासकार व्यक्तिगत तौर पर मैं जाति को महत्व नहीं देती। ऎसा व्यावहारिक भी नहीं है और प्रोफेशन के लिहाज से जातीय आधार पर बिलकुल भी नहीं सोच सकते। जहां तक शादी-विवाह की बात आती है तो सभी की खुशियों को खयाल रखना होता है। सजातिय होने से थोड़ा सहज हुआ जा सकता है, लेकिन इससे इतर जाति कोई विशेष मायने नहीं रखती। जनगणना में तो यह आधार होना भी नहीं चाहिए। डॉ.शालू फोर्टिस अस्पताल जाति पूछी जानी चाहिए। जब सब-कुछ पूछा जाता है तो फिर जाति क्यों नहीं? यह सिर्फ सरकार अपनी जानकारी के लिए कर रही है, इसे पर्सनली न लें तो ही अच्छा। व्यक्तिगत रूप से मैं जातिवाद में यकीन नहीं रखती। किसी भी लेवल पर जाति कोई मायने नहीं रखती। अब तो शादी-विवाह के मामलों में जाति का कोई महत्व नहीं रह गया। प्रीति दवे मॉडल जाति आधुनिक समय में बढ़ती चलती जा रही है। इस आधार पर ही रिजर्वेशन का मुद्दा उठता है। जातीय जनगणना से समाज का स्पष्ट वर्गीकरण हो सकता है। इससे मालूम चल जाएगा कि कौनसी जाति के कितने लोग हैं। सकारात्मक असर समाज पर पड़ेगा। जातीय व्यवस्था पहले से समाज में कायम है। मैं इसमें यकीन करती हूं। जाति में व्यक्ति सुरक्षित महसूस करता है। डॉ. अरूणा समाजशास्त्री गुर्जर-मीणाओं के बीच का झगड़ा निपट नहीं रहा है। जातीय आधार पर गिनती हुई तो न जाने कितनी जातियों के बीच ऎसे झगड़े शुरू हो जाएंगे। समय आ गया है कि हम भारतीय हो जाएं। व्यावहारिक तौर पर किसी की मदद करते या लेते समय उसकी जाति नहीं पूछते। जो आस-पास होते हैं वही काम आते हैं। जाति को तभी भुनाया जाता है जब किसी खास मकसद के लिए टीम बनानी हो या वोट बैंक मजबूत करना हो। रूचि भार्गव रंगकर्मी संविधान में सभी को बराबरी का हक दिया गया है तो आखिर जातीय आधार पर क्या जानना चाहते हैं? यह फैसला सामाजिक बुराइयों को बढ़ाने वाला ही साबित होगा। झगड़े बढ़ेंगे, आरक्षण की मांग बढ़ेगी। कई तरह की समस्याओं जन्म लेंगी। कई बच्चे आत्महत्या कर लेते हैं, उन्हें लगता है कि उनका स्थान किसी और ने ले लिया। आगे बढ़ना है तो जाति को पीछे छोड़ना होगा। मेरी शादी कई सालों पहले हुई, तब भी अंतरजातीय विवाह था, अब तो हालात और भी बदल गए हैं। प्रो.सुषमा सूद समाजशास्त्री देश की सबसे बड़ी समस्या ही यह है कि हम जातियों में बहुत ज्यादा बंट चुके हैं। जातिवाद लोगों में कूट-कूट कर भरा है। फिर भी सरकार को यदि अपनी जानकारी के लिए जाति जाननी है तो यह गुप्त तरीके से होना चाहिए। दुनिया के सामने सिर्फ हिंदुस्तानियों की संख्या आनी चाहिए। मैं भी हिंदुस्तानी कहलाना ही पसंद करूंगी। मैं जहां रहती हूं, वहां कच्ची बस्ती है, वहां के बच्चों को पढ़ाती हूं। उनकी जात नहीं देखती। निशात हुसैन सोशल एक्टिविस्ट
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