पिता और लेबर रूम! सुनने में जरा अजीब-सा लगता है ना! कुछ बरसों पहले यह बात जरूर अजीब कही जा सकती थी, लेकिन आज नहीं। मैट्रो सिटीज में यह परिदृश्य बदलता जा रहा है। हमारे जयपुर में भी पिता लेबर रूम में दाखिल हो रहे हैं। नवजीवन को दुनिया में ला रही पत्नी की मुश्किल घडियों में साथ देने के लिए वे पूरी तरह तैयार है। मानो पिता बनने के एहसास को वह भी बच्चे के जन्म के पल से ही महसूस कर लेना चाहते हों। बच्चे को दुनिया में लाने का फैसला दोनों का है, जिस पल उन्हें पता चलता है कि वह पेरेंट्स बनने जा रहे हैं, ठीक उसी पल पत्नी की तरह ही पति भी अपनी होने वाली संतान से उतनी ही गहराई से जुड़ जाते हैं। यह बात और है कि बच्चा मां की कोख में होता है और वह हर समय उसकी देखरेख में ही खोई रहती है। यह सभी को नजर आता है पर पिता बनने जा रहा पुरूष भले ही यह सब जाहिर ना कर सके, लेकिन बच्चे से वह भी उतना ही जुड़ता जाता है। चार दशक पहले भारत में आई यह अवधारणा 19वीं सदी के मध्य तक पत्नी के साथ पति का डिलीवरी रूम में जाने पर प्रतिबंध था, लेकिन 1930 तक आते-आते वर्जनाएं टूटने लगी थीं। इतिहास पर नजर डालें तो पता चलता है कि बच्चे के जन्म के समय पिता के डिलीवरी रूम में जाने की शुरूआत अमेरिका के अस्पतालों में 1930 में हुई थी, लेकिन यह लोकप्रिय 1960-70 के बीच हुआ। लेबर पेन से जूझ रही पत्नी को सहारा देने के लिए प्रायोगिक तौर पर पति को अंदर बुलाया जाने लगा और पत्नी की मानसिकता पर पड़ने वाले फर्क नोटिस किए गए। अध्ययन में सामने आया कि लेबर के दौरान पति के साथ रहने पर पत्नी को मानसिक संबल मिलता है और वह रिलीफ महसूस करती है। इन सकारात्मक परिणामों को देखते हुए कालांतर में डॉक्टर्स पति से उनके अंदर जाने की इच्छा के बारे में पूछने लगे और पुरूषों के लेबर रूम में जाने पर घोषित प्रतिबंध की धारणा टूटने लगी। आज दंपति खुद इस बारे में चिकित्सकों से बात कर रहेे हैं। 1970 तक भारत में भी यह कॉन्सेप्ट आया। जयपुर में भी आज यह काफी लोकप्रिय हो रहा है। जयपुर में निजी अस्पतालों में औसतन एक महीने में इस तरह के करीब सात-आठ मामले देखने में आ रहे हैं जिनमें पति लेबर रूम में पत्नी के साथ जा रहे हैं। पत्नी और बच्चे के लिए कन्सर्न आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल में टे्रनिंग मैनेजर मुनीब बारी कहते हैं, पहली बार पेरेंट्स बनने जा रहे थे। मैं अपनी पत्नी और बच्चे के लिए लेबर रूम में था। आयशा कहती थी कि बेबी को मैं आपसे पहले देखूंगी तो मैंने कहा कि मैं भी आपके साथ आऊंगा। मैं बच्चे को देखने के लिए इंतजार नहीं करना चाहता था। खुशी को बांटने के लिए हमने तय किया कि हम दोनों उस पल के साथ साक्षी होंगे। डॉक्टर से लेबर रूम में जाने की बात की तो उन्होंने सहर्ष ही हां कह दिया। आयशा की हालत देखकर मैं बहुत डरा हुआ था। सच बताऊं तो आयशा से ज्यादा तकलीफ मुझे महसूस हो रही थी, अंदर से डरा हुआ था, लेकिन जाहिर नहीं होने दिया। उसे भी तो संबल देना था। नई तकनीक कम पीड़ा अब डिलीवरी की तकलीफों को कम करने की तकनीक की उपलब्धता के चलते प्रसव पीड़ा न्यून हो रही है। इस वजह से अब पति भी अंदर जाने से कम डर रहे हैं। एपिड्यूरल टेकनीक (दर्दरहित प्रसव) इन्हीं में से एक है, जो प्रसव की भयानक पीड़ा को कम करने का काम करती है। इसमें मूवमेंट्स तो होते हैं, लेकिन दर्द का एहसास नहीं होता। इस वजह से मां बहुत सी तकलीफों से बच जाती है और पति के साथ रहने से उसका हौसला भी बना रहता है। दंत रोग विशेषज्ञ डॉ. अमित कुमार शर्मा बताते हैं, मेरी पत्नी डॉ. निशा खुद निश्चेतना विशेषज्ञ हैं, लेकिन लेबर पेन जैसी स्थिति से गुजरने में हर कोई खुद को मुश्किल में पाएगा, तब मैं पूरे समय उसके साथ रहा और धीरज बंधाता रहा। वहीं मुनीब बारी कहते हैं कि आयशा का केस राजस्थान में पेनलेस डिलीवरी का पहला मामला था। बहुत सारे डॉक्टर लेबर रूम में अपना-अपना काम कर रहे थे। एक मैं ही वहां बिना काम के था। मैं आयशा को बार-बार हिम्मत रखने को कहता। कुछ देर में हमारे बेटे का जन्म हुआ। उसे पहली बार हाथ में लिया उस पल की खुशी शब्दों में बता पाना मुश्किल है। आखिरकार यह वो पल था, जब हमारी एक और पीढ़ी दुनिया में आई। मेट्रो सिटीज का बढ़ता चलन बत्तीस साल पहले ही यह कांसेप्ट भारत में आ चुका है। तब सिर्फ बड़े शहरों के संभ्रात वर्ग के लोग पत्नी के साथ लेबर रूम में जाने की बात कर पाते थे, लेकिन अब शहर के निजी अस्पताल पिता के सामने लेबर रूम में जाने का विकल्प रखते हैं। डॉ. स्वीटी सोनी बताती हैं, "जयपुर के लिए यह कोई नई बात नहीं है। अब लोग खुद पत्नी के साथ जाना चाहते हैं।" इन्फोसिस में कार्यरत अमित लिंबा बताते हैं, अमेरिका में डॉक्टर्स आपको हर चीज विस्तार से समझाते हैं। जबकि भारत में अभी ऎसा नहीं हो पाया है। दूसरे बच्चे के वक्त भी मैं रिचा के साथ रहना चाहता था, लेकिन लेबर रूम में नर्सेस मुझे बाहर निकालने पर तुली हुई थीं। कौन हैं ये पिता डॉ. नमिता कोटिया कहती हैं, आमतौर पर ऎसे मामलों में संभ्रांत वर्ग के लोग ही डिलीवरी रूम में जाने के इच्छुक हैं। इंटरनेट, मीडिया आदि से अवेयरनेस बढ़ी है। नॉर्मल डिलीवरी में उन्हें हैड एंड पर ही खड़ा करते हैं, ताकि वह उन्हें मोरल सपोर्ट करते रहें। बच्चे के बाहर आने के समय बीच में स्क्रीन लगा दी जाती है, सामान्यत: लोग उस दृश्य को देख नहीं पाते। लेबर रूम में चिंतित अब्बा पत्नी लेबर की असहनीय पीड़ा से गुजर रही है तो पतियों का हाल भी उनसे कुछ कम नहीं है। लेबर रूम में पतियों का हाल बहुत बुरा हो जाता है। चेहरे पर कन्फ्यूजन के भाव होते हैं। अधिकतर पति उन्हें इस स्टेज में देख नहीं पाते और बाहर आ जाते हैं। हां, एपिड्यूरल में कम दर्द कम होने से पत्नी कूल रहती है, इसलिए पति अंदर रूक पाते हैं। एक डॉक्टर की नजर से डॉ. आशीष अग्रवाल बताते हैं, बतौर पीडियाट्रिशियन बच्चे के जन्म के समय लेबर रूम में रहना मेरे लिए रूटीन की बात थी, लेकिन जब मैं पिता बनने जा रहा था तभी जाना कि कितना खास और अलग एहसास है यह। तभी मैं जान पाया कि मेरा एहसास उन पिताओं से कितना अलग है जो लेबर रूम या ऑपरेशन थिएटर के बाहर खडे रहकर खुशखबर का इंतजार करते हैं। शायद वे उन पिताओं के उस अनुभव को महसूस नहीं कर सकते जो लेबर में पत्नी को संबल देते हैं, उसकी मुश्किलों को शेयर करते हैं और सबसे बढ़कर तो यह कि अपने बच्चे के जन्म के खुद साक्षी बनते हैं। शब्दों से परे है यह अनुभूति पिता बनने की खुशी अपने आप में वैसे ही बहुत बड़ी है, लेकिन जब पत्नी के साथ आप खुद भी इन पलों के साक्षी हों तो बात खास हो जाती है। अमित लिंबा कहते हैं कि जब रिचा के प्रेगनेंट होने का पता चला, तब हम अमेरिका में थे। अकेले थे, इसलिए ध्यान मुझे ही रखना था। उन मुश्किल पलों में भी उसे अकेले कैसे छोड़ता। लेबर रूम में जाने का फैसला लिया। बेबी होने के बाद गर्भनाल काटते वक्त मुझे तकलीफ हो रही थी, मुझे लगा कि इससे मां और बच्चे को तकलीफ होगी, लेकिन डॉक्टर ने आश्वस्त किया कि ऎसा नहीं होगा। फिर मैंने बच्चे पर पानी डालकर उसे नहलाया, तौलिए में लपेटकर गोद में लिया। पहली बार उसे डायपर और कपड़े मैंने ही पहनाए।
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