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Tuesday, 07 February, 2012
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जीके कितना केजी जितना
Wednesday, July 14, 2010, 11:51 hrs IST
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Khushboo
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हाल ही एक एफएम स्टेशन पर रेडियो जॉकी ने कॉन्टेस्ट के दौरान एक लड़की से पूछा कि कॉमनवेल्थ गेम कहां होने वाले हैं दिल्ली या बांग्लादेश? लड़की ने जवाब दिया बांग्लादेश। रेडियो जॉकी ने उसी समय कहा कि आपने पहला ही जवाब गलत दिया है। आपको यह भी नहीं पता कि कॉमनवेल्थ खेल दिल्ली में हो रहे हंै। इस पर लड़की ने जवाब दिया कि हम गल्र्स हैं, हमारी रूचि इन सब बातों में नहीं होती। फिर क्या था आरजे को ढीली गेंद मिल चुकी थी। चौके-छक्के लगने लगे। उसने मजे लेते हुए पूछा कि गल्र्स का इंट्रेस्ट फिर किन बातों में होता है। फीमेल कॉलर ने कहा कि हम अपनी ही बातों में इंट्रेस्ट रखते हैं। जवाब पर रेडियो जॉकी ने कटाक्ष करते हुए कहा कि आपको तो यह ध्यान होगा कि किस एक्टर का ब्रेकअप हुआ और किस एक्ट्रेस का पैचअप हो रहा है? कॉलर ने तो इस बात को हंसी में टाल दिया, लेकिन एक मथने वाला सवाल पीछे छोड़ दिया। आखिर क्यों स्कूल-कॉलेज टॉप करने से लेकर मैनेजमेंट लेवल तक अपने काम की छाप छोड़ने वाली ये लड़कियां देश-दुनिया और अपने ही आसपास की हलचल से इस कदर बेखबर रहती हंै?
गल्र्स का नॉलेज चैक करने के लिए हमने एक सर्वे किया। इस सर्वे में खेल, दुनिया, विज्ञान, राजनीति, फैशन, फिल्म और शहर से जुड़े दस सवाल पूछे। सर्वे में साफ हुआ कि कुछ गल्र्स को फिल्म और फैशन की जानकारी जरूर है, लेकिन देश-दुनिया, शहर, खेल के बारे में कोई जानकारी नहीं। इस सर्वे के परिणाम के साथ हमने बात की विभिन्न फील्ड के एक्सपर्ट से और जाना कि आखिर क्या कारण हंै कि लड़कियों का इंटेलिजेंस लेवल कम होता है? क्यों गल्र्स का मजाक बनाकर उनके लिए कहा जाता है कि इन्हें तो यह पूछो कि करीना ने उस फिल्म में क्या पहना था?
करिअर काउंसलर दीपक सक्सेना का मानना है कि लड़कियों का विकास ही इस तरह होता है। सोसायटी और पेरेंट्स के जरिए उन्हें बताया जाता है कि कुछ ही क्षेत्र उनके लिए हैं। लउकियों के मेंटल लेवल की बात की जाए तो वह लड़कों से कहीं ज्यादा है। मेट्रो सिटीज में गल्र्स-बॉयज में फर्क नहीं किया जाता। यहां सभी फील्ड बॉयज के साथ गल्र्स के लिए भी खुले होते हैं, वहां गल्र्स को हर फील्ड का नॉलेज होता है। इस स्थिति की जिम्मेदार हमारी सोच है।
आमतौर पर यही माना जाता है कि उन्हें तो सिर्फ फैशन और फिल्म के बारे में ही पता होगा। जहां बात राजनीति, खेल, विज्ञान जगत की आती है उन्हें बैक सीट पर ही मानकर चला जाता है। उनसे इसकी आशा की जाने लगेगी तो निश्चित रूप से उनकी सोच और ज्ञान का स्तर बढ़ेगा।
साइकायट्रिस्ट डॉ. अखिलेश जैन कहते हंै कि गल्र्स ही नहीं, बॉयज का भी आज देश-दुनिया की हलचल में रूझान न होकर फैशन-ट्रेंड और फिल्म जगत में ज्यादा दिखाई देता है। इसका कारण उनसे होने वाला मनोरंजन और ग्लैमर है। पेरेंट्स पहले बच्चों की पढ़ाई पर पूरा ध्यान दिया करते थे, घर में साथ बैठकर न्यूज देखा करते थे। अब वो सब बंद हो गया है। लाइफ स्टाइल में आने वाले इस बदलाव के कारण आज का युवा दुनिया से बेखबर होता जा रहा है।
राजस्थान यूनिवर्सिटी के साइकोलॉजी डिपार्टमेंट की प्रोफेसर मणिका मोहन का कहना है कि स्कूल-कॉलेज लेवल पर स्टूडेंट्स के जनरल नॉलेज पर कोई काम नहीं किया जाता। यहां सिर्फ सिलेबस पढ़ाकर ही काम पूरा कर लिया जाता है। स्कूल में यह नियम बनाया जाना चाहिए कि वीकएंड पर हर क्लास का एक स्टूडेंट पूरे हफ्ते की देश-दुनिया और शहर के अपडेट्स पर पांच मिनट का प्रजेंटेशन दे। इससे स्टूडेंट्स की जानकारी बढ़ेगी। कॉलेज में भी वीकएंड पर स्टूडेंट्स में करंट टॉपिक पर ग्रुप डिस्कशन करवाया जाना चाहिए। दरअसल, सारी एक्सरसाइज एमबीए और प्रतिस्पर्घी परीक्षाओं तक सीमित कर दी गई हैं।
ग्रुप कमांडर एनसीसी जयपुर के सेना मैडल कर्नल हरजेन्द्र सिंह का कहना है गल्र्स इमोशनली और फिजिकली वीक होती हैं, लेकिन जहां तक मेंटल लेवल की बात है वे काफी स्ट्रॉन्ग हंै। येे बात अलग है कि इसके लिए सही डायरेक्शन में काम नहीं होता। गल्र्स में कम अवेयरनेस के पीछे हम किसी एक फेक्टर को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते। परिवार के माहौल से लेकर शिक्षण संस्थान सभी इसके लिए बराबर के जिम्मेदार हैं। आज जरूरत है इस कमी पर काम करने की। इसकी शुरूआत परिवार से होनी चाहिए। पेरेंट्स को बच्चों को साथ लेकर कुछ समय न्यूज चैनल देखने चाहिए। इन चैनल पर वर्तमान मुद्दों पर होने वाली चर्चाएं जरूर देखें। साथ ही अगर घर में कोई फिल्मी पत्रिका आती हो तो उसकी जगह बच्चों क ा नॉलेज बढ़ाने वाली पत्रिकाएं मंगवानी चाहिए। धीरे-धीरे जब बच्चों में इस ओर इंट्रेस्ट आने लगेगा तो यह कमतरी अपने आप ठीक हो जाएगी।
सच्चाई यह भी है कि लड़कियां अगर लक्ष्य साध लें तो फिर उन्हें कोई नहीं डिगा सकता।
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