कन्या शिशुओं को बचाने के लिए तमिलनाडु सरकार ने वर्ष 2000 में एक योजना शुरू की। क्रेडल बेबी स्कीम के तहत पेरेन्ट्स अपनी अनचाही बेटी को हॉस्पिटल, अनाथालय आदि में छोड़ सकते हैं और अगर कभी भविष्य में उनका मन बदलता है तो वे अपनी बच्ची को ले जा सकते हैं। आज ऎसे सेंटर में बच्चियों की संख्या बढ़ी। यह राजस्थान का पुरूष-स्त्री अनुपात है यानी हमारे प्रदेश में हर एक हजार पुरूष पर 922 çस्त्रयां हैं। देश के सबसे बड़े अभियान जनगणना 2010 की कवायद चल पड़ी है। उम्मीद करें कि हालात बेहतर होंगे। पता चल जाएगा कि कितनी मांओं ने अपनी बेटियों को गर्भ में गिराने से गुरेज किया सरवाइवल ऑव द फिटेस्ट के सिद्धांत पर गौर किया जाए तो लड़की में जीने की जबरदस्त क्षमता होती है। बेशक अगर जीने के बराबर अवसर मिलते हैं तो लड़कियां लड़कों से ज्यादा होतीं। ख्यात साहित्यकार बता रही हैं कि कोख से लेकर कुदरती उम्र तक उसका जिंदा रहना आसान नहीं लेकिन बात यदि साठ के पार की होती है तो प्रति हजार पुरूषों पर महिलाएं बढ़ जाती हैं अब डर खत्म! स्त्री शरीर की मालकिन के लिए यूं तो अनेक हकों की दावेदारी के कानून बनाए गए हैं। यह सदाशयता भारतीय समाज के इतिहास में अनूठी है कि उसके जन्म और जीवन की सुरक्षा के बारे में सामूहिक रूप से सोचा जा रहा है! साथ ही उसके प्राणों की ओर आंख उठाने वालों के लिए दंड विधान की घोषणा है! सच में ही क्या यह मखौल की बात नहीं कि जो घोष्ाणाएं सुनाई जा रही हैं, उन्हें लोग बकायदा जानते-समझते हैं और मामूली आदमी के लिए भी उनमें ऎसा क्या विशिष्ट है कि वह उस हुक्मनामे से डर जाएगा। लड़कियों के दुश्मन समाज का सदस्य यह अच्छी तरह जानता है कि यह पुराना जमाना नहीं, जिसमें दाइयों द्वारा नमक, अफीम, पुराना गुड़, पपीते के बीज देकर भू्रण और शिशु का खात्मा किया जा सकता था और साक्षात मृत्युरूपा सिद्ध दाइयां इस काम को बड़े कौशल से संपन्न कर डालती थीं। फिर भी वे कहीं मामला खोल न दें, इसका डर रहता था। समाज में यह चलन धड़ल्ले से था, और सब एक दूसरे से डरते भी थे। आज ऎसे डर-भय समूल नष्ट हो चुके हैं, तकनीकी विद्या, जो भारतीय विकास की धुरी मानी जा सकती है, स्त्री प्रजाति के संहार में अचूक है। अब दाइयों की बख्शीश और घूस का मामला नहीं, मोटी फीसों का जमाना है। ग्रेसफुल डॉक्टरों, सिद्ध नसोंü के अलावा समाज का सम्माननीय तबका शामिल हो गया है। बडे-बडे नसिंüग होम-यूं सरकारी अस्पतालों की अल्ट्रा साउंड मशीनें गर्भस्थ शिशु के सामान्य-असामान्य तन-मन का परीक्षण बाद में करती हैं-पहले "सेक्स डिटर्मिनेशन" को कोड वड्र्स में जाहिर कर देती हैं। शिक्षा और सभ्यता का कशाघात मादा भू्रणों की गरदन पर है। हंसे या रोएं कि जिस ज्ञान को जड़ मानसिकता और पक्षपाती लोक व्यवहार को बदलना था, उसने स्त्री आबादी को इस हद तक पहुंचा दिया कि उसकी नस्ल नष्ट हो जाए। जो शुरू से ही नगण्य रही, उसकी चिंता भी क्या, और क्यों? यह चिंता निश्चित ही स्त्री के हित में नहीं। उसको जिंदगी देकर साझेदारी जैसी कोई स्थिति अभी मुकम्मल रूप में बनी नहीं है। लड़कियों के लिए दंगा ? "लैंगिक असंतुलन"। यह समाज के लिए समाज की मृत्यु तक के लिए घातक सिद्ध हो सकता है। जगह-जगह चिंता हो रही है। युद्धस्तर पर लोगों को चेताया जा रहा है कि यदि यूं ही स्त्री कम होती गई तो समाज का चेहरा क्या होगा? स्त्री को नजारे में ढूंढ़ना पडेगा। कल्पना कीजिए कि पुरूष स्त्री की फिराक में बदहवास घूम रहे हैं। एक स्त्री हाथ लग जाती है। क्या उस समय यह देखा जाएगा कि यह स्त्री किस जाति की है, किस धर्म की है, कुंआरी है या क्षतयोनिका है? स्त्री तो ऎसा अमृत होगी, जो मरते हुए पौरूष को बचा ले। कहते हैं कि बाजार में जिस चीज की पूर्ति की संभावना कम होती है उसकी मांग बढ़ती जाती है। मांग बढ़ने से कीमत में इजाफा होता है। अर्थशास्त्र का यह सिद्धांत अब तक पुरूषों पर लागू रहा है और शादी के योग्य लड़कों की कीमत आसमान छूने की हद तक बढ़ती गई है। पुरूष होने के गौरव ने सदा उसका माथा ऊंचा रखा है। क्या çस्त्रयों की घटती जनसंख्या में विवाह योग्य लड़की का महत्व भी इसी तरह का होगा? या उसके साथ सदा से होता आया छल-बल के प्रयोग का रूप और भी भयानक हो उठेगा? "जिह की बिटिया संुदर देखी, तह पर जाय धरी तरबार" का सिद्धांत पुरूष की आदत में रहा है तो हो सकता है कि एक लड़की के लिए मारकाट हो, दंगा मचे, लूटपाट और राहजनी जैसी वारदातें हों। तबाही का कोई भी स्वरूप बदल-बदलकर सामने आ सकता है। स्त्री के जन्म से नफरत क्यों? अनादिकाल वाला चक्कर ही है। स्त्री सदा से जंग की जड़ रही है। सीता, द्रौपदी, पçkनी, संयुक्ता के बाद भी अनेकानेक। यह दीगर बात है कि इनमें से साधारण स्त्री कोई न थी। नई बात यही होगी कि अब सामान्य-साधारण स्त्री महत्वपूर्ण होने जा रही है, क्योंकि वह अपनी हत्या की राह से गुजरकर आई है। कोई व्यक्ति हत्या पर उतारू कब होता है? शायद अपनी ही जिंदगी से आजिज आकर। यहां हम किराए के हत्यारों की बात नहीं कर रहे हैं, वह तो हत्या ही नहीं, हत्या का पेशा करता है जो और भी जघन्य है। बार-बार एक ही सवाल शूल की तरह उठता है- मां अपनी बेटी के भू्रण की हत्या के लिए क्यों तैयार हो जाती है? क्या यह औरत के जन्म से घृणा करती है? यह भी सोचा जा सकता है कि वह अपने जीवन का अपमान झेलते-झेलते इस मुकाम पर पहुंच गई है कि लड़की जन्म की संभावना पर हिल उठे। कहा यह जाता है कि मां को अपना काना-कुबड़ा, लूला-लंगड़ा बच्चा भी प्यारा ही नहीं होता, अधिक प्यारा होता है। वह उसे किसी भी हालत में फेंक नहीं देती, कलेजे से लगाकर पाल लेती है। बच्चे के पिता का सहयोग न मिले तो रो-झींककर, घबरा-झंुझलाकर भी उसके लिए अच्छे से अच्छा खिलौना चाहती है। अपने ही आसरे लाड़-दुलार लुटाकर हर कमी पाटती है। मगर वह तभी, जब बच्चा पुरूष प्रजाति का हो। हालांकि यह धरती-आकाश के होने की तरह सच है कि मां की दुनिया में बेटे-बेटी का विभेद नहीं होता, लेकिन इस समझदारी के लिए क्या किया जाए कि वह जान गई होती है कि स्वस्थ सुंदर बेटी के मुकाबले अपाहिज बेटा भारी बैठता है। उत्तराधिकारी माना जाता है। बेटी दूसरे घर की अमानत है, ब्याज सहित वापस करनी होगी। सामाजिक धारणा यही चली आ रही है। पिता समाज से डरता है बेटी के पिता की हालत भी ज्यादा अच्छी नहीं। यदि मां पुरूष से डरती है, उसका लोहा मानती है तो बेटी का पिता समाज से डरता है, जिसमें पुरूष ही उसे बेटी की कमाई खाने वाला "पापी" कहें। यही कारण है कि वह बेटी को पढ़ा-लिखाकर नौकरीपेशा होते हुए भी अपने पास नहीं रख पाता। उत्तराधिकार सौंपते हुए पीछे लौट पड़ता है। फिर स्त्री की गुणवत्ता क्या है? यह तो जाना-माना सच है कि कोई जीव, कोई वस्तु या कोई संस्कार, कोई विचार तभी तक जीवित रहता है, जब तक वह अपनी उपयोगिता सिद्ध करता रहता है। क्या लड़की "सरवाइवल ऑव द फिटेस्ट" के सिद्धांत पर खरी उतरती है? वह जिसके घर जन्म लेती है, उसे दयनीय बना देती है। उसके घर पर खुशी नहीं, शोक छा जाता है। क्या उसका जन्म कोई दोष है? स्त्री देहधारी मनुष्य को बचपन से ही उपेक्षा मिलनी शुरू हो जाती है। उसकी जवानी छिपाई जाती है। युवा होते नैसर्गिक लक्षण अपराध बोध पैदा करते हैं। अत: उसे कम से कम भोजन दिया जाता है और ज्यादा से ज्यादा काम लिया जाता है कि बेल बढ़े नहीं। लेकिन स्त्री शरीर बिना हवा पानी के बढ़ता है, यह किंवदंती आम है। जवानी, जिससे बदनामी जुड़ी हुई है, डराती है तो माता-पिता उसे अपने घर से जल्दी से जल्दी विदा कर देना चाहते हैं, क्योंकि बेटी की युवावस्था पिता की पगड़ी और परिवारजनों की नाक होती है। अब पिता गली-गली द्वार-द्वार भटकता है- एक मादा मानव का पहाड़ सा बोझ अपने कंधों पर लादे हुए। बेटी के अस्तित्व को वह पत्थर से ज्यादा क्या माने, जो उसे दीनातिदीन बनाता चला जाता है। बेटी कितना सुख दे सकती है? मजे की बात यह है कि कल का "दीन हीन" जब आज विवाह-योग्य लड़के के बाप के रूप खड़ा होता है तो वह किसी भी कन्या के पिता के सामने शेर की भूमिका में आ जाता है। जंगलराज के चलते वह अपना पिछला श्रम और धन सूद सहित वसूलता है। यह एक चक्करदार घेरा है जिसमें नुकीले कांटेदार शिकंजे फिट हैं, मौका लगते ही लड़की के अभिभावकों को कस लेते हैं। आदमी संतान चाहता है अपनी खुशी के लिए, सुख और सुरक्षित भविष्य के लिए, बेटी कितना सुख दे सकती है? आर्थिक रूप से अपना व्यक्तित्व निखार लेती है, लेकिन संबंधों के दलदल से खुद को नहीं सींच पाती। रिश्तों के पायदान पर उसकी पुरूष जैसी स्थिति नहीं है, वह खुद अपमानित है, लज्जा ही उसका आभूषण है। उसे पानी की तरह रहना होता है तो माता-पिता को वह कौन सा अलग रंग दे सकती है, जो समाज द्वारा बनाई गई औरत से अलग हो।
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