क्या हम अनावृत्त होने की दिशा में बढ़ रहे हैं? आवरण खासकर कपड़ों के आवरण हमें खलने लगे हैं। लिबास हमें ढकते नहीं "एक्सपोज" करते हैं। समाज का बड़ा तबका इससे दुखी है। न्यूडिटी को लेकर तकरार, ताने, फिकरे खूब चल रहे हैं। इस नजरिए पर खुश्बू की नजर...
एक दोस्त है। स्केचिंग का शौक था। गुरूजी का मानना था कि जब तक न्यूड्स नहीं बनाओगे, सही कपड़े कैसे पहनाओगे। एक दिन मां की नजर उन स्केचेस पर पड़ी। सभी को एक साथ आग के हवाले कर दिया। दरअसल, यह कला के लिए उनकी दुर्भावना नहीं, बल्कि दिमाग की कंडीशनिंग है, जो नग्नता देखते ही विरोध पर उतारू हो जाती है। यही नजरिया हम सब पर हावी है। कम कपड़ों में लड़की, स्त्री, मॉडल, तस्वीर, पेंटिंग देखते ही हम उत्तेजित हो जाते हैं। एक गिद्ध हमेशा मृत जानवर या लाशें ही तलाशता है, लेकिन एक संवेदनशील इंसान की नजर कीचड़ में उगे कमल पर ही ठहरती है। जब हम खजुराहो जैसे किसी दूसरे ऎतिहासिक मंदिरों में जाते हैं तो हमारा मकसद वहां के वास्तुशिल्प को निहारना होता है, ना कि न्यूडिटी को। यह कला का ही एक रूप है। सवाल तो यह उठता है कि आप इसे किस रूप में देखते हैं।
हल्ला क्यों? क्लब्स-पार्टीज और फिल्मों में आइटम साँग और डांस सीक्वेंस को लोग अपने परिवार सहित आराम से देखते हैं, उन पर थिरकते हैं। इनमें न्यूडिटी का घोर विरोध करने वाले भी शामिल हैं। पहनावे को लेकर आए खुलेपन को युवा पीढ़ी किसी भी नजरिए से बुरा नहीं मानती। शहर के निजी कॉलेज में पढ़ने वाली हिमाद्री शाह कहती हैं, हमें जो पसंद है, हम पहन रहे हैं। बलात्कार या ईव टीजिंग जैसी घटनाओं के लिए मिनी या शॉर्ट टॉप्स को दोष देना खुद की कमजोरी को छिपाना मात्र है। शहर की लड़कियां इनकी वजह से शिकार हो जाती हैं, लेकिन बलात्कार तो गांवों में, अधेड़ औरतों और छोटी बçच्चयों के साथ भी तो होते हैं। इसके लिए किसे दोष देंगे।
सुविधाजनक है बदलाव समाजशास्त्री डॉ. निधि मेहता कहती हैं, खुलापन एक हद ठीक है, लेकिन यही चीज दिखावे के लिए की जाए तो गलत हो जाती है। गर्मी से परेशान एक लड़की शॉर्ट स्लीव पहने तो ठीक है, लेकिन सर्दियों में। पूल में कोई बिकिनी पहने तो उसे न्यूडिटी नहीं कह सकते, क्योंकि वह वहां की जरूरत है, लेकिन कॉलेज में लो वेस्ट जीन्स, जिसमें पेंटी लाइन साफ दिख रही है तो उसे मैं गलत कहूंगी। चीजों को देखने का नजरिया सही हो।
मिस डेजर्ट और मिस जयपुर रह चुकी मॉडल आकृति कहती हैं, पहनावे में खुलापन आया है। इसे गलत नहीं माना जा सकता। पहनावा भले ही छोटा हो, उसेे कैरी करना आना चाहिए। कौन सुंदर नजर नहीं आना चाहता। आप जो भी पहनें, वह आपको सूट करना चाहिए। कपड़ों से किसी की आइडेंटिटी तय नहीं की जा सकती, ना ही राय कायम की जानी चाहिए। जयपुर में बिकिनी पहनने की डिमांड हो तो उस असाइनमेंट के लिए मैं ना कर दूंगी, क्योंकि हमारा शहर इतना खुला नहीं है, लेकिन मुंबई या दूसरे बड़े शहर में कोई दिक्कत नहीं होगी, क्योंकि वहां जेन्ट्री भी वैसी होती है। मेरे प्रोफेशन में कम पहनने का दबाव तो बना रहता ही है, लेकिन अल्टीमेटली इस बारे में तय तो हम ही करते हैं।
सोच के दायरे कहने की जरूरत नहीं होगी, सारे पारंपरिक तर्क न्यूडिटी और सेक्स के खिलाफ होंगे, लेकिन यही पारंपरिक भारतीय शिक्षा संस्कृति समृद्ध रही है। उस समय लिखे गए वेद और शास्त्र हमारी सनातन विरासत हैं, जिनमें नग्नता और सेक्स को बुरा नहीं कहा गया। सुदारका की मृच्छकटिंगम हो या वात्स्यायन का कामसूत्र। भारतीय समाज इसे कलात्मक रूप में ही देखता आया है।
ग्लोबलाइजेशन के दौर में डॉ. निधि मेहता कहती हैं, मैं इसे फ्रीडम ऑव चॉइस कहूंगी। कम कपड़ों में भी कोई सुविधा महसूस करता है। हालांकि हमारे समाज में इसे गलत माना जाता है, जहां तक बाजार को परिचालित करने की बात है तो बाजार में वही सब उपलब्ध है, जो आप पसंद करते हैं और जिसकी मांग है। ग्लोबलाइजेशन के युग मेें पूरी दुनिया सिमट गई है। बाहर क्या हो रहा है, क्या पहना जा रहा है, क्या किया जा रहा है, पल-पल की खबर रहती है। जब हम वैश्विक हो गए हैं तो इसका इम्पेक्ट तो आएगा ही। सब-कुछ इंटरकनेक्टेड हो गया है। वहां के फैशन का असर यहां भी होता है और जो बाजार में मिलता है, उसे आप खरीदते भी हैं। बीएससी, थर्ड इअर स्टूडेंट रूचिका शर्मा कहती हैं, मैं क्या पहनती हूं, यह मेरी मर्जी है। किसी को दिक्कत है तो होती रहे। हमारे लिए जो सुविधाजनक है, वह हम पहनते हैं। पहनावे को लेकर किसी को केरेक्टर सर्टिफिकेट दिया जाना खराब है। लड़कियों के साथ होने वाली दुर्घटनाओं पर पहनावे को दोष दिया जाता है, लेकिन मासूम बçच्चयों के साथ होने वाले दुष्कर्म के बारे में आप क्या कहेंगे। वे तो सेक्स अपील वाले कपड़े नहीं पहनती? पहनावे को नहीं, बल्कि लोगों की जंगली सोच को बदलने की जरूरत है, जो समाज में बलात्कार और करप्शन को बढ़ावा देती है।
परसेप्शन ऑव माइंड फैशन डिजाइनर रोहित कामरा बताते हैं वे लड़कियां जो एडवांस बैकग्राउंड से आती हैं, घर में कोई रोक नहीं है, उन्हें प्रॉब्लम नहीं होती, लेकिन टे्रडिशनल परिवारों की लड़कियों को परेशानी होती है। आज उन परिवारों के लोग भी बेटियों को बिना दुपट्टे और जीन्स में बाहर जाने की परमिशन दे रहे हैं, जो आज से पन्द्रह साल पहले सोचते भी नहीं थे। यह परसेप्शन ऑव माइंड है। नजरिया ही न्यूड या कवर्ड हो सकता है।
सुमन
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