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Sunday, 05 September, 2010
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तलाक
Wednesday, July 07, 2010, 11:10 hrs IST
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Khushboo
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हल्ला मचा है कि तलाक लेने की एबीसीडी बदल रही है। यह आसान हो रही है। क्या इसे आसान होना चाहिए? रिसते हुए रिश्तों का अलग हो जाना बेहतर है या इसे सद्इच्छा से जोड़े रखना समझदारी है।
तलाक बच्चों के व्यक्तित्व को खंडित करता है। आपको दूसरा साथी मिल सकता है बच्चों को दूसरे माता-पिता कहां मिलेंगे? आसान कायदे वहां तो मदद कर सकते हैं, जहां पति-पत्नी दोनों आत्मनिर्भर हैं। फटाफट तलाक की रोशनी में रिश्तों की बुनावट पर एक नजर...
हमारे यहां तलाक अब ज्यादा आसान होने वाले हैं, ठीक वैसे ही जैसे ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका में। हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 1955 और विशेष विवाह अधिनियम की धारा 1954 में संशोधन को हरी झंडी दिखा दी गई है और जल्दी नए संशोधन पूरे देश में लागू हो जाएंगे। तकरीबन तीस साल पहले विधि आयोग की 71वीं रिपोर्ट में हिंदू मैरिज एक्ट में संशोधन की सिफारिश की गई थी। हिंदू विवाह अधिनियम को आज के संदर्भ में अप्रासंगिक मानते हुए संशोधन की मांग लगातार बढ़ रही थी। इन मांगों के पीछे तीन मुख्य वजहें रही। पहली तो कोर्ट में लगातार बढ़ते पेंडिंग मामले, दूसरी एक पक्ष का जानबूझकर दूसरे पक्ष को प्रताडित करना और तीसरी तलाक चाहने वाला पक्ष मौजूदा कानून में दिए गए तय कारणों में अपने मामले को लाने के लिए झूठ का सहारा लेते थे।
अब क्या होगा
पहले तलाक लेने के मुख्य कारण थे, मानसिक-शारीरिक प्रताड़ना, असाध्य बीमारी, क्रूरता आदि। नए संशोधन लागू होने के बाद वैवाहिक रिश्तों के खत्म होने को तलाक का आधार बनाया गया है। उन मामलों में यह ज्यादा
प्रभावी होंगे, जिनमें रजामंदी से तलाक के लिए अर्जी देने के बावजूद एक पक्ष को कोर्ट में दूसरे पक्ष की गैरहाजिरी के कारण या अपनी सहमति वापस लेने के कारण मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। इससे कोर्ट की प्रक्रिया
भी बाधित होती है। अब कोर्ट उस पक्ष के हितों की रक्षा करेंगे। नए संशोधनों से तलाक के कारण में नया कारण यह जुड़ जाएगा कि यदि यह तय हो जाए कि अब दो लोग साथ नहीं रह सकते तो इस आधार पर तलाक मिल जाएगा। यानी कोई एक पक्ष यह कह दे कि वह किसी भी सूरत में एक साथ नहीं रह सकते तो तलाक का आधार बनता है। जरूरी यह है कि वह कोर्ट को इस बात का भरोसा दिलाए।
क्या होगा असर
कोई भी कानून सभी लोगों के लिए न तो हितकारी हो सकता है और न ही नुकसानदेह। एडवोकेट महेश चावला के अनुसार संशोधन लागू होने से-
n पेंडिंग मामले फटाफट निपटेंगे। अदालत के बार-बार चक्कर काटने से
राहत मिलेगी।
n झूठे आरोप लगाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। अब तक तलाक लेने के लिए गंभीर आरोप लगाए जाते रहे हैं ताकि फैसला उनके पक्ष में हो।
n रजामंदी से तलाक चाहने वालों को ज्यादा समय गंवाने की जरूरत नहीं।
n कोर्ट से गैरहाजिर रहकर अदालत को गुमराह करने पर रोक लगेगी।
n तलाक एकतरफा हो जाएंगे। ग्रामीण व घरेलू महिलाओं की स्थिति पर ज्यादा बुरा असर। पति साबित कर दे कि वह किसी भी हाल में पत्नी के साथ नहीं रह सकता तो इसे आधार के रूप में पेश कर सकता है। पत्नी गुजारा-भत्ता मांग सकती है, लेकिन तय कमाई न हो सकने से इस हक को पाने में कुछ मुश्किलें।
n तलाक के मामले बढ़ेंगे। तलाक की लंबी प्रक्रिया से सोचने का पूरा मौका मिलता था और समझौते की संभावनाएं बढ़ती थीं, अब यह मुश्किल। ।
किस की तर्ज पर
तलाक की राह आसान करने की प्र्रक्रिया अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों की तर्ज पर की जा रही है। वहां çस्त्रयां इतनी सक्षम हंै कि उन्हें अपने निर्णय लेने के अधिकार हंै। हालांकि वहां सिंगल पेरेंटिंग बड़ी समस्या है।
अमेरिका में एक हजार में से चार सौ जोड़े तलाक की राह पकड़ते हैं। भारत में अभी हजार पर तकरीबन 11 जोड़े तलाक लेते हैं। फटाफट तलाक इन मामलों की संख्या में इजाफा करेगा साथ ही सिंगल पेरेंट्स की संख्या बढ़ेगी जिससे बच्चे प्रभावित होंगे। çस्त्रयों के लिए हालात ज्यादा मुश्किल होंगे, क्योंकि वह बच्चे के बिना भी नहीं रह सकती और अकेले परवरिश करने के लिए
मानसिक रूप से तैयार नहीं है। आर्थिक रूप से स्थिति और भी बुरी है। बच्चों के मन की थाह ले तो उनके लिए इससे बुरा कुछ भी नहीं कि उन्हें मां या पिता में से किसी एक को चुनना पड़े।
सुना जाए स्त्री का पक्ष
भारत शहरों में बसता है तो गांवों में भी, यहां कुछ çस्त्रयां तरक्की की राह पर हैं तो कुछ घर की दहलीज भी नहीं लांघतीं। ऎसे में सभी पर एक नियम लागू नहीं हो सकता। एक पक्षीय तलाक का दंश झेलने वाली 29 साल की रेहाना अली कहती हैं, तलाक के बाद औरत की जिंदगी दूसरों के रहमो-करम की मोहताज हो जाती है। जब मेरी शादी हुई तो शुरू में सब ठीक था, लेकिन मां नहीं बन पाने के कारण ससुराल वाले पति पर दूसरी शादी का दबाव बनाने लगे। शादी को दो ही साल हुए थे। मेडिकल चैकअप हुआ, सभी टैस्ट नॉर्मल आए। लेकिन तलाक दे दिया। चार साल हो गए इस बात को। वालिद नहीं हैं, भाइयों ने सहारा दिया, लेकिन हमेशा डर बना रहता है कि कहीं कुछ गलती हो गई तो? तलाकशुदा स्त्री की जिंदगी में यह डर हमेशा बना रहता है।
पिता के साए में महफूज
बेटा 16 साल का हो गया है। नाना के घर में रहता है, लेकिन अनिश्चितता का भाव हमेशा बना रहता है। जब उसके पापा आते हैं तो बहुत खुश होता है, सुरक्षित महसूस करता है। सिंगल पेरेंट की भूमिका निभाने वाली मीनाक्षी बताती हैं çस्त्रयां किसी भी हाल में तलाक के पक्ष में नहीं होती। समस्या गंभीर हो तो ही वे तलाक चाहती हैं। ऎसे में मामले का लंबा न खींचा जाना ही ठीक है, लेकिन आपसी समझाइश से ही निपटे तो अच्छा। 16-17 सालों से पति से अलग रह रही हूं मैं। ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं हूं, इसलिए बच्चों के साथ पीहर में हूं। पति महाराष्ट्र के गांव में रहते हैं।
मिलने आते हैं, लेकिन साथ नहीं ले जाते। इस दरमियान दो बच्चे भी
हो गए। वे कहते हैं कि बच्चों के लिए गांव का माहौल ठीक नहीं, लेकिन हम लोगों को गांव में रहने से कोई परेशानी नहीं है। मुझे नहीं पता कि वो ऎसा क्यों कर रहे हैं। बच्चे उन्हें देख खुश होते हैं बस यही सोचकर मैंने तलाक नहीं लिया।
मीनाक्षी आम भारतीय महिला का चेहरा है, एक तरफा तलाक उनके लिए मुश्किलें बढ़ाने वाला ही होगा।
लगातार काउंसलिंग हो
समाजशास्त्री निधि मेहता भी इस बात का समर्थन करती हैं कि नए संशोधन से तलाक के मामले बढ़ेंगे। संशोधन से ज्यादा जरूरत इस बात की है कि फैमिली कोर्ट में होने वाली काउंसलिंग को अपडेट करवाया जाए। आज भी काउंसलिंग उसी परंपरागत ढर्रे पर चलती है। यह भी समाज की तरह पुरूषवादी सोच की शिकार है। हमेशा स्त्री को समझाया जाता है कि तुम औरत हो, सहनशील हो तुम्हें समझना चाहिए। बच्चे की ओर देखो। पढ़ी-लिखी स्त्री इन तर्कोü को स्वीकार नहीं पातीं। काउंसलिंग में युवा पीढ़ी को जोड़ा जाए जो आज के संदर्भ में स्थिति को समझ सके। वे उन दोनों को समझा सके कि अगर स्त्री घर के बाहर का रोल निभा रही है तो पुरूष भी घर की जिम्मेदारियों को साझा करे विवाह में दो लोग बराबर की स्थिति में होते हैं, यह समझाने की जरूरत है ताकि यह खूबसूरत संस्था गरिमा के साथ कायम रह सके। बच्चों की बेहतरी भी इसी में है कि उन्हें माता-पिता दोनों का प्यार मिले।
बच्चों पर बुरा असर
मनोचिकित्सक मनीषा गौड़ कहती हैं, तलाक का असर बच्चे पर
बहुत बुरा पड़ता है। ऎसे बच्चे हाइपर एक्टिव हो जाते हैं। वे किसी की बात नहीं सुनते और वही करते हैं जो करना चाहते हैं। हालांकि माता-पिता के झगड़े का भी बच्चे पर बुरा असर पड़ता है, लेकिन तलाक वाले मामले में बच्चे ज्यादा प्रभावित होते हैं। फिर भी नए संशोधन को इस लिहाज से उचित ठहराया जा सकता है कि इससे मामले जल्दी निपटेंगे। लंबे समय तक केस का चलना मानसिक तनाव बढ़ाता है। फटाफट फैसले का बुरा पक्ष भी है कि इसमें दोनों पक्षों को सोचने का समय नहीं मिलेगा। जल्दबाजी में लिए गए निर्णय अक्सर गलत साबित होते हैं। ऎसे में इस संशोधन के लागू हो जाने पर इस बात का भी खयाल रखना होगा कि दोनों पक्षों की काउंसलिंग बेहतर तरीके से हो। विशेषज्ञों की सेवाएं लें। अगर दो लोग साथ रहकर झगड़ते रहे तो बेहतर है कि वह शांतिपूर्ण तरीके से अपनी-अपनी जिंदगी जिएं। कई मामले ऎसे आते हैं जिनमें रिश्तों की अनिश्चितता तनाव का कारण बनती है। तलाक झेलने वाली एक स्त्री की काउंसलिंग की थी मैंने। उसका केस दो-ढाई साल लंबा चला।
उसके पति का किसी और से प्रेम संबंध था और तलाक का मामला भी पति की ओर से दायर था। तलाक लेने के लिए उसने पत्नी पर कई झूठे आरोप लगाए। इन आरोपों ने उसे और भी तोड़ दिया। उसे लगने लगा
कि उसने अपने जीवन के दस साल जिस रिश्ते को दिए उसका हिसाब उसे इन आरोपों के रूप में मिला। ऎसे मामलों में तो नए संशोधन निश्चित रूप से बेहतर ही हैं।
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