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Tuesday, 07 September, 2010
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हौसलों का जलजला
Wednesday, June 02, 2010, 12:13 hrs IST
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Khushboo
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दकियानूसी विचारधारा का विरोध-मनीषा
ईरानी धर्मशास्त्री ने कहा था कि औरतों के उघड़े बदन को देखकर ईश्वर नाराज हो जाता है और इससे जलजले आते हैं। जैन मैकराइट की मानसिक रूप से झकझोरने वाली राय को हफ्तेभर में दो लाख सपोर्टर मिले। यह देखकर सीएनएन, बीबीसी, फॉक्स सब हैरान हैं। बूब क्वेक के नाम से चलाए जा रहे इस विरोध पर दुनिया भर से गर्मागर्म कमेंट्स और औरतों के उग्र तेवर परंपरावादियों की बोलती बंद करवाते जा रहे हैं। सामाजिक क्रांति का इससे बेहतर कोई उदाहरण नहीं हो सकता। "बहनापे" को लेकर केवल संवेदनशील ही नहीं हो रही हैं, वे यह भी दिखा दे रही हैं कि औरतों के नाम पर होने वाले सम्मेलनों की बजाय मानसिक रूप से एक होने का असर ज्यादा होता है। बूब क्वेक को पसंद बताने वालों की संख्या दो लाख से ऊपर नजर आना कोई हंसी-खेल नहीं है। यह शुद्ध रूप से दकियानूस विचारधारा का विरोध है, जिसे कोई राजनैतिक रंग नहीं दिया जा सकता। वह समय आ चुका है, जो खुलकर कह रहा है कि औरतों के कटावों और उभारों पर वारी जाने वाली दुनिया में पर्दे के लिए कोई जगह नहीं है। उत्तरी अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, अफ्रीका की तमाम पारंपरिक संस्कृतियों में आज भी टॉपलेस को बुरा नहीं माना जाता। दुनिया भर की तमाम संस्कृतियों में पूजी जाने वाली देवियों को टॉपलेस ही माना गया है, उनको देखकर किसी ईश्वर प्रेमी के दिमाग की नसें नहीं फटीं। ना ही ऎसा कोई जलजला आया, जिसने दुनिया तबाह कर डाली हो। 19वीं सदी में यूरोप में संभ्रांत घरों की औरतें अपने सौंदर्य का प्रदर्शन करने के लिए घुटनों से नीचे और सीने को खुला रखती थीं, क्योंकि तब यह स्टेटस सिंबल हुआ करता था। स्विम सूट और बिकनी पहनने वाली लड़कियों को तो जाने ही दीजिए पर अपने यहां पारंपरिक लिबासों, मसलन साड़ी, कुर्ता-सलवार और कमीज पहनने वाली अधेड़ और बूढ़ी औरतों को खुली छाती देखा जा सकता है। जिसे झीनी ओढ़नी या पल्लू से ढांपा गया होता है। थुलथुल टाइप की कोई भी बूढ़ी अपने विशाल वक्ष को छिपाने के प्रयास करती नजर नहीं आती, इनके बड़े और ढीले गलों से लगभग आधे वक्ष बाहर ही दिखते हैं, जिनको देखकर घृणित मानसिकता वाला ही कोई घिनौनी बात सोच सकता है। सीधे कहूं तो सेक्स अपील व नग्नता देखने वाले की नजरों से ज्यादा मानसिकता में होती है।
आपके पास नहीं
है-सुचित्रा कृष्णमूर्ति
मैं अपने एक पुरूष मित्र से बात कर रही थी। क्या आपको मालूम है कि ईरानी पादरी के मुताबिक महिलाओं के अपने स्तन को ज्यादा दिखाने की वजह से ही दुनियाभर में भूकंप आते हैं। वाह! पादरी का कथन इतना अजीबोगरीब है कि उस पर टिप्पणी करना बेकार है...इस मुद्दे ने गहन विषय पर बहस जरूर छेड़ दी है। यह कुछ ऎसा ही है जैसे अपनी कमजोरी और आदत छिपाने के लिए नशे के सामान से नफरत करना। खत्म करना, पीटना, सिगरेट-शराब जला देना। नशे के सामान को कितना भी भला-बुरा कह लो, लेकिन जो नशेड़ी होगा वो धरती को खोदकर भी निकाल ही लेगा। कामुकता का सदाचार (सबसे ज्यादा दबी हुई संस्कृतियों में) इसी पर आधारित है, लेकिन क्यों महिलाओं को ही अपनी उन चीजों पर ज्यादा गौर कराया जाता है या उन्हें शर्मिदा किया जाता है जो ईश्वर से हासिल हुआ है। हम मानकर चलते हैं कि मर्दो की कमजोरी ही हमारी शर्मिदगी की वजह है और इस घिनौनी सच्चाई पर कोई भी सवाल या तर्क खड़े नहीं करता। खैर, मैंने अपने दोस्त से जानना चाहा कि आखिर पुरूषों में स्तन को लेकर इतना ज्यादा आकर्षण क्यों होता है। उसका जवाब था शायद इसलिए, क्योंकि हम मर्दो के पास नहीं है।
कभी सुनी है नशेड़ी पुत्र की हत्या-वंदना
कभी सुना है कि किसी माता-पिता ने प्रतिष्ठा या सम्मान के लिए अपने गंजेड़ी, नशेड़ी, बलात्कारी, आतंकवादी, देशद्रोही या हत्यारे पुत्र की हत्या कर दी? घूसखोर, बेईमान या चोर या डाकू या जेबकतरे या अपहरणकर्ता पुत्र की हत्या कर दी? और भी अनैतिक कृत्य होंगे जिन्हें यहां जोड़ सकते हैं, परंतु शायद मदर इंडिया के बाद ऎसा नहीं हुआ या दिखाया गया। यदि माता-पिता अपना सुख चैन गंवाकर, पेट काटकर बच्चों को बड़ा करते हैं और बच्चों का जीवन इस उपकार का बंधक होता है तो यह उपकार तो और भी बड़ी मात्रा में पुत्र पर भी किया जाता है तो इसी अधिकार से वे पुत्र की हत्या क्यों नहीं करते? क्या इसमें भी हानि-लाभ का गणित आडे आता है? क्या हिसाब लगाया जाता है कि पुत्र कितना कमाकर देगा या मुखाग्नि देकर स्वर्ग का टिकट कटवाएगा? मातृत्व व पितृत्व भी यदि गणित में जकड़ा है तो फिर इस रिश्ते में क्या विशेषता रह गई? क्यों इसकी पवित्रता का ढोल पीटा जाता है? क्यों नहीं मान लेते कि हम अपने सुख के लिए माता-पिता बने? क्या माता या पिता बनना ही काफी नहीं है? उसके लिए हम कोई मूल्य चाहते हैं? यह नहीं भूला जा सकता कि चयन या विकल्प का अधिकार केवल माता-पिता के पास है, संतान के पास नहीं। माता पिता बनना हमारी पसंद थी संतान बनना संतान की नहीं।
किल कर रही है
पिल-गीताश्री
एक शांत-सा विज्ञापन टेलीविजन पर आता है इन दिनों। पति-पत्नी के बीच आंखों-आंखों में बात होती है, फिर "आई पिल" का जिक्र। ऎसा नहीं कि इससे पहले कोई गर्भनिरोधक दवाई बाजार में नहीं आई। सिप्ला कंपनी की यह गोली शायद कुछ ज्यादा ही खास है। कंसीव करने के 72 घंटे बाद लेने से भी काम चल जाता है। उपयोग बिना डॉक्टरी सहायता के किया जा सकता है। यह गर्भपात की गोली नहीं है। पचास साल पहले जब गर्भनिरोधक गोली अस्तित्व में आई तब औरतों की दुनिया बदलने का अंदाजा किसी को न रहा होगा। अनचाहे गर्भ का बोझ ढोती व साल-दर-साल बच्चे पैदा करती औरतें असमय बुढ़ा जाती थीं। आधी जिंदगी रसोई और आधी बच्चे पैदा करने में गुजर जाती। दैहिक आजादी का अहसास लेकर आई जादुई पिल ने जब पश्चिम की औरतों को पहली बार आजादी का अहसास कराया होगा तब उन्होंने ईश्वर के बदले वैज्ञानिकों को धन्यवाद दिया होगा। उनकी इस बेचारगी पर मार्क्सवादी विचारक शुलामिथ फायर स्टोन ने स्पष्ट किया कि जब तक स्त्री को गर्भाशय से मुक्ति नहीं मिलती तब तक उसकी वास्तविक मुक्ति संभव नहीं। इन गोलियों ने पश्चिम में पचास वष्ाü पहले महिलाओं के लिए मुक्ति की दिशा में कदम बढ़ा दिए। आई पिल के पैकेट पर ऎसी औरतों का सूरते हाल छपा हुआ है। एक उदास औरत शून्य मेंं देख रही है। नीचे लिखा है "असहजता, दुविधा, क्रोध, खुद से खफा, ग्लानि, क्षोभ, शर्म, अकेलापन...ऎसे अनेक तरह के संशय बोध से घिरी एक औरत अनचाहे गर्भ का बोझ ढोने को खुद को तैयार नहीं पाती तो इससे उबार लेने के लिए आई पिल मदद करने आया।" मदद के नाम पर çस्त्रयां इनके जाल में फंसती गई। जो चीज पचास साल पहले आजादी का प्रतीक थीं वह जबरन गुलामी का प्रतीक बन गर्ई। जादुई पिल सेक्सुअल आजादी की सारी कीमत महिलाओं से वसूलता है। पुरूषों से नहीं। कोख से मुक्ति देने के नाम पर कंडोम की उपलब्धता के बावजूद यह हाल है। सच तो यह है कि पिल कंडोम की तरह यौन सुरक्षा नहीं दे सकती, बल्कि सिर्फ इस पर निर्भरता यौन संबंधी बीमारियां दे सकती हैं।
बुर्के से दिलाई निजात-फिरदौस खान
बचपन से हमने देखा, हमारी अम्मी घर से बाहर नहीं निकलती थीं। सारा सामान अब्बू ही लाते थे, कपड़े भी, अब्बू जो ले आए अम्मी ने वही पहने। अपनी मर्जी का तो कोई सवाल ही नहीं। कई-कई साल घर की चौखट से बाहर कदम न रखती। हम बड़े हुए तो हमने कहा कि अब अम्मी खुद अपनी मर्जी से कपड़े खरीदेंगी, घर की चहारदीवारी से बाहर की दुनिया देखेंगी। अम्मी ना-नुकुर के बाद मान गई, लेकिन बुर्के के बिना बाहर जाने से मना कर दिया। हमने बहुत समझाया, हमारी दादी जान ने भी कहा कि बच्चे कहते हैं तो मान लें। हालांकि हमारी दादी जान भी बुर्का ओढ़ती थीं, सफेद बुर्का...और इसे ओढ़कर वे बिलकुल भूत जैसी लगती थीं। हमने दादी से पूछा कि आप बुर्का क्यों ओढ़ती हैं? उन्होंने कहा कि सभी ओढ़ते हैं, इसलिए ओढ़ती हंू्। हमने कहा-क्या आपको बुर्का ओढ़ना अच्छा लगता है? कहने लगीं, बिलकुल नहीं। यही जवाब हमारी अम्मी का था। हमने अम्मी से पूछा-क्या अब्बू या दादा जान बुर्का ओढ़ने को कहते थे। उन्होंने कहा-कभी भी न तो हमारे अब्बू ने अम्मी को बुर्का ओढ़ने को कहा और न ही दादा ने। बस वो पहले से ओढ़ती रही हैं इसलिए।
नाना जान बुर्के को पसंद नहीं करते थे। वो मुंबई में रहते थे, वो चाहते थे कि हमारी नानी भी बुर्का न ओढ़े। उन्हें साडियां बहुत पसंद थीं, नानी जान के लिए कीमती साडियां लाते, लेकिन नानी जान रूढिवादी थीं, इसलिए वो नाना जान के हिसाब से नहीं रहीं। नाना जान अम्मी के लिए भी साडियां लाते थे...लेकिन अम्मी ने
कभी साड़ी नहीं पहनी, क्योंकि उन्हें साड़ी पहननी नहीं आती थी और कहती थीं कि अब झिझक होती है।
अम्मी हमसे कहती हैं-आज तेरे नाना जिंदा होते तो तुझे देखकर बहुत खुश होते। हमारी अम्मी और दादी
दोनों का बुर्का छूट गया था। हमारी छोटी खाला जान (मौसी) को बुर्का बिलकुल पसंद नहीं था, लेकिन मजबूरन ओढ़ना पड़ता था। घर में नानी जान का हुक्म चलता था। जब खाला हमारे घर आर्ई तो हमने उनका बुर्का छुपा दिया और बिना बुर्के के ही शहर घुमाया। अल्लाह का करम है कि खाला जान का निकाह "इंसान" के साथ हुआ। उनकी ससुराल में कोई महिला बुर्का नहीं ओढ़ती। जब हमारी नानी हमारे घर आर्ई तो हमने उनका भी बुर्का छुड़वा दिया। वो कहने लगीं-अगर अपने मियां की बात मान लेती तो कितना अच्छा होता। शायद यह खुशी उनके नसीब में थी ही नहीं।
हमारे भाई की शादी हुई तो दुल्हन के कपड़ों के साथ हमने बुर्का नहीं भेजा, जबकि दुल्हन की बड़ी बहन के ससुराल से बुर्का आया। हमारी होने वाली भाभी और उनकी बड़ी बहन का निकाह एक ही दिन हुआ था। औरतों ने हंगामा कर दिया कि कपड़े पूरे नहीं आए। लड़की के भाई हमारे घर आए। हमने कहा कि हमें अपने घर की बहू को बुर्का नहीं ओढ़ाना। पहले तो उन्होंने ऎतराज जताया, लेकिन बाद में मान गए। हर कुप्रथा के खात्मे के लिए अपने घर से ही पहल करनी चाहिए, घर के बाद खानदान और फिर समाज की बारी आती है।
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