Daily News
Tuesday, 07 February, 2012
 |   |   |   |   |   |   |   |   |   |   | 
श्याम स्त्री चेतना का नाम
Wednesday, September 01, 2010, 09:57 hrs IST
Email Print Comment min  max | Bookmark and Share
Left
Khushboo
Left
कल जन्माष्टमी है। श्रीकृष्ण का जन्मदिन।
इस विराट व्यक्तित्व के भीतर ज्यों-ज्यों प्रवेश होता है, त्यों-त्यों लगता है कि "विमन-लिब" की अवधारणा भले ही पश्चिम से आई हो, लेकिन द्वापर युग से आज तक स्त्री के असली हिमायती तो गोविंद ही हैं।
चाहे जिस रूप में देखिए, मुरली मनोहर स्त्री के आगे अहं को त्यागे हुए ही नजर आते हैं। यही मुक्त भाव उन्हें नारी के बेहद निकट ला देता है। इस पावन अवसर पर नंद किशोर से जुड़ीं आठ çस्त्रयां...
राधे-कृ ष्ण
जो सारी दुनिया का संचालन करते थे, वे स्वयं राधा के इशारे पर नाचते थे। स्त्री मन मेंव्याप्त प्रेम की उन्मुक्त अभिव्यक्ति है राधा। राधा को कुछ लोग काल्पनिक पात्र भी मानते हैं, श्रीकृष्ण को लेकर रचे गए सबसे प्रामाणिक ग्रंथ श्रीमद्भागवत में राधा का उल्लेख नहीं है। किंवदंती है कि राधाजी ने वेदव्यास जी से अनुरोध किया कि वह इस ग्रंथ को पूरी तरह से श्रीकृष्ण को ही समर्पित करें, उनके नाम का उल्लेख भी ना करें। फिर भी छद्म रूप से राधा का उल्लेख मिलता है। भगवद्गीता के बाद राधा पर बहुत साहित्य रचा गया और वे हिंदी साहित्य की सबसे अधिक रोमांटिक नायिका के रूप में उभरीं। डॉ. अर्जुन शतपति के अनुसार भारतीय सांस्कृतिक, धार्मिक, नैतिक और सामाजिक चेतना में राधा एक उदात्त कृति हंै, जिसके साथ नारी के औदार्य, सौंदर्य, सुख, हर्षोल्लास जुड़े हैं। राधा के चरित्र को स्थापित किया जयदेव की कृति "गीत गोविंद" ने। यह वह समय था, जब çस्त्रयों के सामाजिक अधिकारों में कटौती हो चुकी थी। उनकी स्वतंत्रता, स्वेच्छा, कामेच्छा आदि पर अंकुश था। जयदेव की राधा प्रेमविहुला थीं तो विद्यापति की राधा रूप लावण्य की दीप्ति। चंडीदास की राधा प्रेम की प्रतिमा हैं तो सूरदास की राधा हमारे ह्वदय में अपने सहज स्वरूप में बसी हैं। बरसाने की राधा दूध-दही बेचने नंद के गांव आती और कान्हा को अपने गांव आने का निमंत्रण देती।
सखा-द्रौपदी
महाभारत में द्रौपदी का चरित्र अद्वितीय है। अगर वे नहीं होतीं तो युद्ध की भूमिका भी नहीं रची जाती। यह कथन अपने आप में दो अर्थो को समेटे है। पहला जो सामान्यत: समझा जाता है कि महाभारत के युद्ध की वे वजह रहीं, जबकि दूसरे अर्थो में देखें तो धर्म को पुनस्र्थापित करने के लिए रचे गए इस युद्ध की वह प्रेरणा थीं तो श्रीकृष्ण इस युद्ध के संचालक। महाभारत के पात्र उनके इर्द-गिर्द रचे-बसे थे। कुंती उनकी बुआ थीं, अर्जुन की पत्नी सुभद्रा उनकी बहन, लेकिन इससे सर्वथा भिन्न उनका रिश्ता द्रौपदी से था। स्त्री-पुरूष की दोस्ती जो आज भी संशय की दृष्टि से देखी जाती है, उस काल में श्रीकृष्ण और द्रौपदी ने स्थापित की और उसकी लाज भी रखी। चीर-हरण के समय जब द्रौपदी के पांच पति भी करूण स्वर को न सुन सके, तब सखा ने उनकी पुकार सुनी। द्रौपदी के स्वयंवर में अर्जुन और कर्ण समेत कई क्षत्रिय शामिल हुए। जब कर्ण उठे तो द्रौपदी ने कृष्ण के इशारे को समझ उन्हें सूतपुत्र कहकर रोका। श्रीकृष्ण चाहते थे कि द्रौपदी अर्जुन को वरे। द्रौपदी के लिए श्रीकृष्ण की इच्छा ही सर्वोपरि।
बहन-सुभद्रा
सुभद्रा श्रीकृष्ण और बलराम की बहन व वसुदेव की दूसरी पत्नी रोहिणी की पुत्री थीं। एक बार अर्जुन अपने मामा वसुदेव के यहां गए। सुभद्रा उनके मन को भा गई। अर्जुन ने कृष्ण से आग्रह किया कि वे मातुल से बात करें, लेकिन कृष्ण ने कहा कि ऎसा करने पर यह निश्चित नहीं कि सुभद्रा तुम्हें मिल ही जाए, तुम्हें उसका हरण करना होगा। अर्जुन ने सुभद्रा का हरण कर लिया। यदुवंशी सकते में आ गए। वसुदेव ने कृष्ण से कहा कि उसने सुभद्रा के लिए याचना क्यों नहीं की? कृष्ण ने कहा कि न तो आप उसका दिया मूल्य स्वीकारते और न ही वह कन्या को दान के रूप में स्वीकारता। उसके पास दो ही मार्ग थे, पहला स्वयंवर और दूसरा हरण। सुभद्रा उसे चुनती इसमें संदेह था,हरण का मार्ग चुना। अगर अर्जुन सुभ्रदा के मनोनुकूल न होता तो वह शूल अथाव खड्ग से उसका वक्ष चीर कर कब की घर लौट गई होती। सुभ्रदा स्वतंत्र तथा आत्मनिर्भर थीं। रथ संचालन भी बखूबी जानती थीं और वार करना भी। सुभद्रा पुत्र अभिमन्यु ने गर्भ में चक्रव्यूह में प्रवेश करने सीखा।
सारथी-सत्यभामा
सत्यभामा राजा सत्राजित की पुत्री और कृष्ण की पत्नी थीं। एक बार युद्ध में नरकासुर ने देवराज इंद्र को पराजित कर दिया और देवताओं और संतों की 16 हजार पुत्रियों को अपने पास बंदी बना लिया। देवलोक की शासक माता अदिति भगवान कृष्ण की पत्नी सत्यभामा की संबंधी भी। जब सत्यभामा को पता चला तो उन्होंने नरकासुर को मारने का निर्णय किया और कृष्ण उनकी मदद के लिए उनके सारथी बने और मार्गदर्शन भी किया। सत्यभामा ने नरकासुर को पराजित कर उसे मार डाला।
भक्ति-मीरा
मीराबाई राजपूताना रियासत मेड़ता के राजा वीरमदेव के छोटे भाई रतन सिंह की इकलौती बेटी थीं। 1498 में उनका जन्म हुआ। जब वह पांच साल की थी तो उन्हें एक बाबा, संभवतया रैदास ने गिरधर की मूर्ति दी। मासूम मीरा उस मूर्ति से इतनी प्रभावित हुई कि उनका अस्तित्व ही मूर्ति में समाहित हो गया। उनका विवाह राजपूत राजा चित्तौड़ के राणासांगा के राजकुंवर भोजराज से हुआ। मीरा कहती थीं कि उनका विवाह तो गिरधर जी से पहले ही हो चुका है। भोजराज ने दूसरी शादी कर ली। मीरा को न पति से शिकायत थी, ना सौतन से बैर। वह तो श्रीकृष्ण में लीन थीं। विवाह के 4-5 साल बाद मीरा के पति भोजराज का आकस्मिक निधन हो गया। लौकिक पति की मृत्यु के बाद वह अलौकिक पति भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा के सामने नाचने-गाने लगीं। मीरा के इस आचरण से ससुराल वाले बहुत नाराज थे। उनके देवर राणा विक्रमाजीत ने विष भरा प्याला दिया। मीरा उसे पी गई, लेकिन विष उनके लिए अमृत बन गया। देवर का भेजा जहरीला सांप तुलसी माला बन गया। श्रीकृष्ण के प्रेम में दीवानी मीरा को कोई कैसे मार सकता था।
पत्नी-रूक्मिणी
रूक्मिणी विदर्भ के राजा भीष्माका की पुत्री थीं, वह श्रीकृष्ण से प्रेम करती थीं, श्रीकृष्ण भी। रूक्मिणी का भाई रूकमिन कंस का मित्र था। श्रीकृष्ण द्वारा कंस का वध किए जाने से वह उन्हें अपना दुश्मन समझने लगा। वह रूक्मिणी की शादी अपने मित्र शिशुपाल से करना चाहता था। रूक्मिणी अपने निर्णय पर दृढ़ थीं। उन्होंने विश्वासपात्र के हाथों श्रीकृष्ण के नाम पत्र भेजा। माना जाता है कि यह दुनिया का पहला प्रेमपत्र था। पत्र में उन्होंने श्रीकृष्ण से प्रार्थना की वह उनके परिजन से युद्ध न करें। इसमें बहुत से भाई-बंधुओं की क्षति होगी। वे मंदिर आएं और उनसे विवाह करें। अगर वे ऎसा नहीं करते हैं तो वह अपनी जान दे देंगी। कृष्ण बलराम के साथ वहां गए और रूक्मिणी को अपने साथ ले आए।
बुआ-कुंती
कुंतिभोज की कन्या को महर्षि दुर्वासा ने वरदान दिया था जिससे कुंती किसी भी देवता का आह्वान कर उनसे संतान प्राप्त कर सकती थीं। कुंती के सभी पुत्र इसी वरदान के चलते हुए। उन्होंने चार पुत्रों को जन्म दिया-कर्ण, युद्धिष्ठर, भीम और अर्जुन, लेकिन वह माता पांच पुत्रों की कहलाई-युद्धिष्ठर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव। कुंती की निष्ठा भी श्रीकृष्ण के प्रति अटूट थी और श्रीकृष्ण ने भी पांडवों को हमेशा मां की आज्ञा को सर्वोपरि रखने की सलाह दी। कुंती के लिए वह पथप्रर्दशक की भूमिका में रहे। पांचों भाई कुंती की आज्ञा पालना करते थे और स्वयं कुंती कृष्ण के आदेश से परिचालित थीं, द्रौपदी का बंटवारा हो या कर्ण से पांचों पुत्र के जीवित रहने का वर मांगना, सब कान्हा की लीला थी। अनजाने ही कुंती ने धर्मयुद्ध में दानवीर कर्ण से उसकी मृत्यु का वर मांग लिया।
मैया-यशोदा
यशोदा नंद की पत्नी थीं। भागवत पुराण के मुताबिक जब श्रीकृष्ण का जन्म हुआ, तब देवकी कंस की कारागह में थीं। वासुदेव श्रीकृष्ण की जान बचाने के लिए उन्हें यशोदा के घर गोकुल छोड़ आए। कान्हा का लालन-पालन यशोदा ने किया और इस मिथक को तोड़ा कि मां बनने के लिए बच्चे को जन्म देना जरूरी है। कान्हा के प्रति उनके वात्सल्य के सामने मातृ प्रेम के सभी उदाहरण बौने नजर आते हैं। कान्हा ने भी यशोदा को मातृ संतुष्टि के लिए कई बाल-लीलाएं रचीं, जो आज भी मांएं अपने बच्चे में तलाशती हैं। देवकी पुत्र की मैया हमेशा यशोदा ही रहीं। एक बार जब श्रीकृष्ण ने मिट्टी खाई तो सखाओं ने मैया से शिकायत की। उन्होंने कान्हा का मुंह खोलकर देखा तो समूचा ब्रह्मांड नजर आया। वह जान गई कि वह तो साक्षात् सृष्टि रचयिता हैं। उन्होंने तुरंत माया फेर ली। वह जानते थे कि मां सच जान गई तो उन पर वात्सल्य कैसे लुटा पाएंगी। उनकी सारी बाल लीला मां को सुख देने के लिए थीं।
More Stories Top News
khushboo news स्नेहगर्विता
khushboo news जयपुर लिट फेस्ट याद किया जाएगा बुक ब्रेन ब्यूटी बोल्डनैस के लिए
khushboo news हमारे कन्फेशन
khushboo news सोच सिलाई - कटाई
khushboo news विजन 2012
khushboo news जो बीता सो अतीत जो आए सो मीत
khushboo news कैलेंडर बदल जाता है जिंदगी नहीं
khushboo news एस + एस = जिंदगी दोबारा
khushboo news क्यों सेंसरशिप
khushboo news मेरे सवालों का जवाब दो...
Copyright © Daily News. All rights reserved.