श्रीकृष्ण की तर्ज पर मैं पांडेजी को समझाने का प्रयत्न कर रहा था। पांडेजी इस कलयुग में सत्युगी पुरूष्ा के अवशेष मात्र हैं। भावुक और दयावान इतने कि आजकल की दुखद घटनाओं से भरे अखबार आंसू टपकाते हुए पढ़ते हैं। दर्द दूसरों का दया पांडेजी की। डब्ल्यूटीसी से विमान टकराया आतंककारियों ने और मृतकों की आत्मा की शांति के लिए दो दिन का उपवास रखा पांडेजी ने। अब आप ही बताइए आतंककारियों के इस युग में यह आदमी चल सकता है? इन्हीं बातों से सूखकर वह कांटा हो गए हैं, इसलिए मैंने उनसे कहा था कि जब चारों ओर खाने का महाभारत हो रहा है तो हे पांडे जी आप भी कुछ खाइए। वह गंभीर स्वर में बोले, इस देश में खाने को अब बचा ही क्या है? सबकुछ तो खाया जा रहा है। और हम वह सब नहीं खा सकते। पांडेजी की बात का मर्म हम उस समय तो नहीं समझ पाए। किंतु बाद में हमने उस पर मनन किया तो मर्म समझ में आया।
वास्तव में हमारा देश कहने को तो गरीब है किंतु खाने के मामले में संसार में सबसे अमीर। खाने की वैरायटी का जितना स्कोप यहां है, उतना संसार में कहीं नहीं। लगता है हमारे देश में जिंदा रहने के लिए खाने वाले तो बहुत कम हैं। किंतु खाने के लिए जिंदा रहने वालों की कोई कमी नहीं है। ना खाने वालों की कमी है ना खिलाने वालों की। यह आप पर निर्भर करता है कि आप कहां बैठकर खाते हैं। दफ्तरों में कुछ लोग केबिन में पंखे की हवा में खाते हैं। तो कुछ एयरकंडीशन कमरे में बैठकर भक्षण करते हैं। हमारे देश का हाजमा बड़ा दुरूस्त है। दोनों श्रेणी के लोग ठूंस-ठूंस कर खाते हंै। मजाल है किसी को आज तक अधिक खाने से मितली आई हो?
चलिए बालकों से शुरू करते हैं। शहर के अमीरों के बालक हैं तो मैक्डोनेल्ड का पिज्जा खाइए। सरकारी ग्रामीण स्कूल में पढ़ते हैं तो टीचर का दिमाग, शहर के पब्लिक स्कूल में पढ़ते हंै टीचर की मार और डांट खाइए। पब्लिक स्कूल के मालिक हैं तो बच्चों के माता-पिता की सारी कमाई और स्टाफ की आधी तनख्वाह खा जाइए। सरकारी स्कूल के टीचर हैं तो बच्चों का भविष्य खाइए। संतरी हैं सुरक्षा खाइए। मंत्री हैं तो सरकारी खजाना खा जाइए। नेता हैं तो धर्म के नाम पर विवाद खड़ा करके लोगों का चैन और नींद खा जाइए। आप अभिनेत्री हैं तो देश की सभ्यता, शालीनता, संस्कृति, औरत की हया, शर्म, अस्मिता डिशेज का भक्षण कर सकती हैं। सांसद विधायक या पार्षद हैं तो अपने क्षेत्र के कोटे की कुल्फी बनाकर खा जाइए। अफसर हैं तो योजनाएं, रिश्वत खाइए। इंजीनियर या ठेकेदार हैं तो रेती, सीमेंट, सरिया, लोहा, इस्पात, पुल, भवन कुछ भी खा सकते हैं। डॉक्टर हैं तो पेशेंट का जीवन खाना आपका अधिकार है। उसके गुर्दे, किडनी आदि बेचकर खा सकते हैं।
वकील हैं तो मुवक्किल को दांवपेंच में फंसाकर उसका सब कुछ खा सकते हैं। दुकानदार हैं तो अपना ईमान और सरकार का टैक्स खा जाइए। ग्राहक हैं गम खाइए। मजदूर नेता हैं तो पूरी मिल खा सकते हैं। क्रिकेटर हैं तो डॉलर खाइए। बहू हैं तो परिवार की गरिमा चट कर जाइए। सास हंै तो बहू के नखरों की नौरतन चटनी चटकारे लेकर खाइए। नौजवान हंै तो नौकरी के धक्के खाइए। बुजुर्ग हैं तो बेटे बहू की डांट खाइए। आलोचक हैं तो बगैर पढे किसी भी लेखक और पुस्तक का भविष्य खा सकते हैं। संपादक हैं तो लेखकों की रचनाएं, पारिश्रमिक खा जाइए। आतंककारी हैं तो आपके लिए सायनाइड खाना श्रेष्ठ डिश है। अब आप ही बताइए खाने की वैरायटी का ऎसा विकेन्द्रीकरण संसार में और कहीं हैं? हमारे लोकतंत्र में खाने के मामले में कोई लज्जा नहीं है। अब पांडेजी एक ऊंचे ओहदे पर बैठकर भी कुछ नहीं खाते हैं, तो ना खाएं। मर जाएं। किसे परवाह है।
सकल पदार्थ है जब माहीं, कर्महीन नर पावत नाहीं किंतु आप पांडेजी ना बने। अपनी योग्यता और ओहदे के अनुसार जमकर खाइए और मुस्टंडे बन जाइए। वर्ना मुझे आपसे भी पूछना पडेगा क्या हुआ? कुछ खाते क्यों नहीं...
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