वे थे तब दुनिया की हरेक चीज उसे अपने अनुकूल लगती थी। अब खुद का अंश ही पराया लगने लगा। मांग उजड़े एक वर्ष भी नहीं बीता फिर भी लगता है कि उनसे बिछुड़े युग बीत गए। उनके साथ एक वर्ष एक क्षण सा क्यों निकल जाता, अब एक क्षण ही एक वर्ष से भारी व लम्बा होने लगा है?
मंझले बेटे ने मां को बस में बिठा दिया। मां के चेहरे पर घबराहट की आड़ी-तिरछी ढेर सारी लकीरें खिंच गईं। इतना लम्बा सफर अकेली कैसे तय करेंगी! मंझले ने मां के मनोभाव बांच लिए। वह उनको सीख देने लगा- "घबराने की कोई बात नहीं है मां। बस जयपुर जाकर ही ठहरेगी। बस स्टैण्ड से टैक्सी मिल जाएगी। पता मैंने कागज पर लिख दिया, टैक्सीवाले को कागज बता देना, वह आपको आराम से पहुंचा देगा।" "कभी अकेले यात्रा की हुई नहीं है, इससे मन पीछे हट रहा है..बेटा, तुम पहुंचा आते तो..."
"कैसी बच्चों-सी बातें कर रही हो मां।" मंझला बीच में ही बोल पड़ा-"मुझे वक्त कहां है। आपने खुद ही आंखों से देखा है कि मुझे सांस लेने की भी फुरसत नहीं है, यही तो आफत है मेरे, नहीं तो आपको भला अकेले चढ़ाता ?" अब मां ने होठ सिल लिए। यह तो तय है कि उसे अकेले ही जाना है। मंझला अपनी परेशानी बताता रहा कि भाई के पास भेजते उसका कलेजा तड़पता है। कितने तो दिन हुए हैं उनको यहां आए। आसपास घुमाने भी नहीं ले जा सका, न ही मंदिरों के दर्शन करवा पाया।...यह तो नौकरी ही ऎसी है। महीने में बीस दिन टूर पर रहना पड़ता है। ऊपर से ससुर को भी अभी बीमार होना था। उसकी पत्नी भी पूरी पागल है कि खबर सुनते ही बच्चों को लेकर पीहर चली गई। बाप की इकलौती औलाद है, पता नहीं कब वापस लौटे। इस हालत में वे अकेले क्या करते। शहर का मामला, पड़ौस में भी कोई ऎसा नहीं जो सुख-दुख में काम आए। भगवान की कृपा से भाई का भरा-पूरा परिवार है, आपका मन लग जाएगा। थोड़े दिनों बाद, जब बच्चे अपने ननिहाल से लौट आएंगे, वह खुद उनको लेने आएगा। मंझला बोलता रहा पर मां ने कुछ नहीं सुना।
मां को मंझले के ओठ हिलते नजर आते रहे, मगर शब्द मां के कानों तक पहुंचने से पहले ही अपना अस्तित्व खोते रहे। जैसे मां बहरी हो गई हो। अपने नजरिए से मां को तसल्ली देकर मंझला निश्चिंत हो गया। भाई के बच्चों के लिए उसने मां को मिठाई का डब्बा पकड़ाया, बेखौफ सफर के लिए मां को हिम्मत बंधाई और बस रवाना होने से पहले ही "पगै लागूं" कहकर चल पड़ा। मां अब बस के दूसरे यात्रियों के बीच अकेली रह गई। सीट पर सहमी-सिमटी गांठड़ी-सी बैठी रही। उसके हाथ में एक थैला था, जिसमें उसके पहनने-ओढ़ने के कपड़े और ठाकुरजी की सेवा थी। बस से सफर शुरू हुआ। भौंपू बजाती, बीच में ही ठहरती, सवारियां बिठाती-उतारती बस आगे से आगे दौड़ रही थी और वह भागती बस में बैठी पीछे ही पीछे जा रही थी।
मां ने जब सफर किया, अपने पतिदेव के साथ किया। बस बीच में किसी कस्बे के स्टैण्ड पर ठहरती और वे चाय-कचौड़ी लेने के लिए नीचे उतरते, इतने से वक्त में उसकी धड़कनें तेज हो जातीं। उसे लगता कि जैसे इतनी देर में सारी मर्द आंखे उसके शरीर के अंगों को अपनी पसंद से चुन-चुन कर गटक लेंगी। वे उसके इस स्वभाव को लेकर हंसी-ठnा करते रहते। कहते-"आंखों से कोई भला कैसे गटक लेगा। तू है ही खूबसूरत...बिचारी आंखों का क्या कसूर। सुन्दर चीज पर तो निगाहें टिकेगीं ही। हां बता, तुम्हारे कौनसे अंग पर लोगों की ज्यादा नजर रहती है? कुछ देर उसे खोलकर बैठ जा।
मैं सबको न्यौता दे देता हूं, बिचारे लोगों की नजरों की प्यास बुझ जाए, क्यों ठीक रहेगा ना।"सुनकर उसका चेहरा लज्जा से और सुन्दर दिखने लगता और वह उनके सीने में अपना शर्मीला चेहरा छुपा लेती, पर चाहने पर भी खुद को समूचा कहां छुपा पाती। खिड़की के पार पेड़-पौधों और बिजली के खंभों को एक-दूसरे के पीछे भागते देखकर उसकी आंखे अचंभे से फैलकर कटोरियां बन जाती-"अरे...ऎसे कैसे। वे उनके बच्चों जैसे भोलेपन पर ठहाके लगाते रहते, कहते-"शहर के पेड़-पौधों को दौड़ना आता है। ये अभी खेल रहे हैं। तुम भी खेलोगी मेरे साथ" वह मीठे गुस्से से उनको देखती और मुंह फुलाकर कहती-"आपको तो हर वक्त मसखरी सूझती है, सीधे तरीके से सही बात कभी नहीं बताते" बस दौड़ रही है, परन्तु अब उसे दरख्तों का भागना दिखाई नहीं देता।
उनके जाने के बाद सब कुछ रीत गया। अचानक उसे लगा कि वह इस जहान में अकेली रह गई। वे थे तब दुनिया की हरेक चीज उसे अपने अनुकूल लगती थी। अब खुद का अंश ही पराया लगने लगा। मांग उजड़े एक वर्ष भी नहीं बीता फिर भी लगता है कि उनसे बिछुड़े युग बीत गए। उनके साथ एक वर्ष एक क्षण सा क्यों निकल जाता, अब एक क्षण ही एक वर्ष से भारी व लम्बा होने लगा है? मंझले के पास आए उनको दो महीने ही हुए होंगे। बड़ा बेटा यहां छोड़ गया। उनके पहुंचते ही घर का राग बेसुरा हो गया। बहू का थोबड़ा मटके की तरह फूला ही रहता। बच्चों को भी पास नहीं आने देती।
उनके लिए एक कोने में चारपाई बिछाई गई और यह फरमान निकला- "यहां बैठकर आप माला के मनके फिराते रहो, राम-राम भज कर वक्त बिताओ। जब तक वे थे, उनको कभी बुढ़ापा महसूस नहीं हुआ। खुद को वैसे चंचल-अबोध और जवान मानती रही, जैसे पहली बार उनके पास आई थी। पचास की अवस्था बुढ़ापा होती है क्या। पर उसके बेटे उसे डोकरी मानने लगे, तब उसे भी महसूस होने लगा। उनका साथ छूटने से वह सचमुच डोकरी बन गई। बाल चांदी की तरह सफेद हो गए हैं, चेहरे पर अनगिनत झुर्रिया पड़ गई हैं, चमड़ी शरीर से अलग छिटकी हुई दिखने लगी है। उनको लेकर मंझले और उसकी पत्नी में खुसर-पुसर होती रहती। कान ही पापी है जो बातें सुनते। उनको अब मां ही बोझ लगने लगी। उसके आते ही घर का खर्चा आसमान छूने लगा। अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में पढ़ाकर अफसर बनाने का सपना चूर-चूर होने लगा। यह बात मां की समझ से बाहर थी कि उसके आते ही खर्चा इतना कैसे बढ़ गया। सुबह-शाम दो-चार रोटियां खाती है, उससे इतना खर्चा। उसने चुप रहने की आदत डाल ली। बेटे-बहू में खटपट होती रहती। बहू बेमतलब ही बच्चों को लड़ती-पीटती...गुस्से में कहती-"तुम्हारी किताबों-कापियों के खर्चो से मैं तंग आ गई हूं। मुझसे वहन नहीं होता।
आए दिन फीस, पिकनिक का खर्चा। कहां से लाऊं। तुम्हारे डैडी बिचारे मर-पच कर जितनी रूपगी लाते हैं, उससे तो घर का खर्चा भी मुश्किल से चलता है। अब किताबें-बस्ते फेंककर हाथ में तगारी लेकर कुछ काम करो, समझे। आठ-दस वर्षो के फूल जैसे बच्चे भला मम्मी की इन बातों को क्या समझते, पर वह समझ रही थी सारी बात। उसे ही तो कहा जा रहा था, अबोध बच्चों का तो केवल नाम था। पर वह चुप रहने के अलावा क्या करती? सुनती रहती। तंग आकर वह बच्चों को लेकर अपने पीहर चली गई। मंझले ने अपनी नौकरी की परेशानी बताकर उसे बस में बिठा दिया। उसे पता था कि भाई झगड़ा करेगा और मां को वहां नहीं रखकर वापस उसी के साथ भेज देगा। बड़ा बेटा डॅाक्टर है। बाप गुजर जाने के बाद दोनों भाई गांव के पुश्तैनी मकान और खेत को बेचकर पैसा बटोर लाए। छोटा बेटा विदेश में इंजीनियर है। वह तोे अपने पिता की देह मिट्टी बन गई तब भी नहीं आ सका। वहीं से अफसोस करता रहा। विदेश से इतना जल्दी कौन आने देता है।
उसने मकान बेचने का बहुत विरोध किया। डबडबाई आंखों से द्रवित होकर अर्ज की-"बेटा, यह तुम्हारे पिता की निशानी है। मेरे लिए तो मंदिर है यह। उनके साथ मैं पहली बार यहीं आई थी। इस घर की हर जगह में मुझे वे नजर आते हैं। इसे रहने दो बेटा। मैं उनकी याद में यहीं बाकी दिन तोड़ लूंगी।" बेटे माने नहीं। डॉक्टर बेटा बोला-"आप यहां अकेले नहीं रहोगी मां। हम भला किस लिए हैं। अब आपके आराम के दिन आए हैं, तब अकेले रहोगे...यह कोई बात हुई? हमेंं यह मंजूर नहीं है। पहले आप पापा के साथ रहते थे, अब हमारे साथ रहो। आपके आशीर्वाद से सब कुछ है हमारे पास।"
डॉक्टर बेटा उसे अपने साथ ले गया। वहां बहू भी उसके पास बैठी रहती। पोता-पोती भी दादीजी-दादीजी कहते उसके चिपके रहते। उसका मन बहलने लगा। बच्चों के बीच पतिदेव की याद कम होने लगी। पंद्रह-बीस दिन ऎसे ही चला। उसके बेटे व परिवार का व्यवहार मातम पुरसी जैसा निकला। थोड़े दिनों में सब अपने-आप में बिजी हो गए। डॉक्टर बेटा आठ-दस दिनों तक नहीं मिलता। बहू बाजार, क्लब या अपनी दोस्तों की बातों में उलझी हुई रहती। बच्चों ने भी इधर आना कम कर दिया। वह एक कमरे में अकेली पड़ी रहती। वक्त होने पर वहां चाय आ जाती, खाना आ जाता। कभी-कभार डॉक्टर बेटे से कहती कि थोड़ी देर मेरे पास आया कर जिससे मेरा मन लगा रहे। वह गुस्से में जबाब देता-"आने और बैठने का वक्त कहां है मां। मरीजों को देखते-देखते रात हो जाती है। सांस लेने की भी फुरसत नहीं मिलती मुझको। आप तो बैठे-बैठे भगवान का नाम लेते रहो।" तीन-चार महीनों में पूरा परिवार उसके प्रति उदासीन हो गया। नौकरानी बताती कि उसको लेकर सब परेशान रहते हैं। डॉ. साहब नया ऑपरेशन थिएटर बनाना चाहते हंै, ताकि घर पर ही ऑपरेशन कर सके। पर आपके आने से जगह की आ रही है। इस कमरे को ही तोड़-फोड़ कर वे ऑपरेशन थिएटर बनाना चाहते हैं, पर अब इस कमरे में आप रह रहे हो। साहब और मेमसाहब में अक्सर झगड़ा होता रहता है। मेमसाहब आपको यहां से विदा करना चाहती हैं और साहब कहते हैं कहां भेजू मां को। वह माला के मनके फिराती रहती और नौकरानी की बातें सुनती रहती। नौकरानी की बात सही निकली। ऑपरेशन थिएटर के लिए डॉक्टर बेटा उसे मंझले के पास छोड़ गया। "मांजी, बस में ही बैठा रहना है कि उतरना भी है" जब उसके कानों में ये शब्द पड़े तब वह अतीत से वापस वर्तमान में लौटी। पूरी बस खाली हो चुकी थी और कंडक्टर अचंभे से उसे देखता हुआ पूछ रहा था। उसका थान मुकाम आ गया था। हाथ में थैला पकड़े वो नीचे उतरी। एक हाथ में डॉक्टर के घर के पते की पर्ची थी जो मंझले ने उसे दी थी। वह बावली सी खड़ी चारों तरफ भीड़-भाड़ को घबराई नजरों से देख रही थी कि अचानक कोई पास आकर बोला, "अरे मांजी आप?" उसने देखा-सामने डॉक्टर का एक दोस्त खड़ा था। उसे उसका नाम तो पता नहीं था पर डॉक्टर के पास आते-जाते कई बार देखा था। वह बोली-"घर जाना है बेटा। घबराहट से मेरे प्राण निकल रहे हैं।"
"डॉक्टर लेने के लिए नहीं आया?" "उसे खबर ही कहां है, बेटा। मंझले ने बस में बिठा दिया। डॉक्टर का यह ठिकाना बताया है।" उसने पते की पर्ची उसकी आंखों के सामने कर दी। डॉक्टर के दोस्त ने उसे शंका से देखा। उसे मसला उलझा हुआ लगा। मंझले ने बस में अकेले बिठा दिया। डॉक्टर लेने के लिए नहीं आया। क्या पता डॉक्टर ही इनको रखना नहीं चाहता। कौन झमेले में पड़े? उसने अपनी घड़ी देखी। और जल्दी से बोला-"मुझे तो देर हो रही है मांजी। आप टैक्सी कर लो। उसको पता बता देना। पहुंचा देगा। आपको परेशानी नहीं होगी, अच्छा नमस्कार।" वह उससे कुछ कहती इससे पहले ही वह ओझल हो गया। एक हाथ में थैला और दूसरे में डॉक्टर बेटे के पते की पर्ची पकड़े वह बस स्टैण्ड पर खड़ी रह गई।
बुलाकी शर्मा अनुवाद: मदनगोपाल लढ़ा
|
|
|
|
|
|
|