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Tuesday, 07 February, 2012
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खेलिए और जिंदगी जीतिए
Sunday, August 29, 2010, 10:45 hrs IST
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किसी खेल विशेष्ा में नहीं अपितु हर खेल में युवा अपने हुनर से उड़ान भरने को बेताब हैं। दौलत और शोहरत की बुलंदियों पर खिलाडियों का जयघोष्ा देश में खेलों को नए आयाम दे रहा है। भारतीय समाज "खेल" को महज खेल समझ कर दरकिनार कर देने की मानसिकता से उबर कर खेलों के मर्म को जीवन के अभिन्न हिस्से के रूप में आत्मसात करने लगा है।

खुशखबर
भारतीय खेल जगत की फिजाओं में गूंजते इस फलसफे से प्रतिध्वनित सच सम्भावनाओं के नए क्षितिज उकेर रहा है। राष्ट्रमंडल खेलों से जुड़ी अनियमितताओं की खबरेंं, खेलों की राजनीति और खेल विकास के लिए प्रशासकों के आमतौर पर उदासीन रवैये से आहत परिदृश्य में देश के खिलाड़ी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हैरतअंगेज कामयाबियों से सकारात्मक ऊर्जा का संंचरण कर रहे हैं। इन जांबाज खिलाडियों के जोश और जुनून को देखकर लगता है गोया दुनिया के मानचित्र पर भारत के खेल शक्ति बनने का ताना-बाना बुना जा रहा हो। देश में क्रिकेट के अखंड साम्राज्य और राष्ट्रीय खेल हॉकी के चढ़ते—उतरते ग्राफ के बीच व्यक्तिगत श्रेष्ठता वाले खेलों में नित नए पुरूष्ा व महिला सितारों का उदय खुशहाली का संकेत है।
देश के 64वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर गत दिनों महिला निशानेबाज तेजस्विनी सावंत ने म्यूनिख में 50 मीटर राईफल प्रोन स्पर्घा में विश्व रिकॉर्ड के साथ स्वर्ण पदक जीतकर विश्व चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतने वाली देश की पहली महिला निशानेबाज बनने का श्रेय अर्जित किया। इधर राष्ट्रीय खेल से पांच दिन पहले अर्जुन अटवाल ने यूएस पीजीए ट्यूर खिताब जीतने वाले देश के पहले गोल्फर बनकर इतिहास रच डाला है।

युवा सल्तनत
निशानेबाजी में अभिनव बिंद्रा, राज्यवर्घन सिंह, मानवजीत सिंह संधू, मनशेर सिंह, गगन नारंग, जसपाल राणा, तेजस्विनी सावंत व सूमा शिरूर, मुक्केबाजी में विजेंदर सिंह, एमसी मैरीकाम, पहलवान सुशील कुमार, ब्ौडमिंटन में सायना नेहवाल, क्यू स्र्पोट्स में गीत सेठी व पंकज आडवाणी, टेनिस में लिएंडर पेस, महेश भूपति, सोमदेव देवबर्मन व सानिया मिर्जा, शतरंज में विश्वनाथन आनंद, कोनेरू हम्पी, पी. हरिकृष्णा, द्रोणावली हरिका, अभितीज गुप्ता और आरती रामास्वामी, गोल्फ में जीव मिल्खा सिंह, अर्जुन अटवाल, ज्योति रंधावा, क्रिकेट में सचिन तेंदुलकर, सहवाग व धोनी, फॉर्मूला वन रेसिंग में नारायण कार्तिकेयन सहित अनेक युवा सितारे श्रेष्ठता की सल्तनत के सरताज बनकर माहौल में उत्प्रेरणा उलीच रहे हैं।


खेल संस्कृति
ओलम्पिक में सफलता के क्रम से हटकर समग्र परिदृश्य पर निगाह डालें तो शतरंज, निशानेबाजी, तीरंदाजी, मुक्केबाजी, बैडमिंटन, टेनिस, स्नूकर, बिलियर्डस्, भारतोलन, एथलेटिक्स आदि में भी नए सितारों का अभ्युदय हुआ है, जो देश के खेल तंत्र की कायापलट करने के मिशन में जुटे हैं। देश में संस्कृति की नींव रख दी गई है। सेलिब्रिटी के रूप में खिलाडियों की शोहरत से प्रभावित युवा करिअर के रूप खेलों को अपना रहे हैं। खेलों को प्रायोजकों का वरदहस्त मिलने लगा है। कई औद्योगिक घरानों और सार्वजनिक उपक्रमों के बीच तो उत्कृष्ट खेल सितारों को अपना ब्रांड एम्बेसडर बनाने की होड़ सी मची है। खेलों में बड़ा नाम कमाने वाली प्रतिभाओं को नौकरी के लिए भी ज्यादा मशक्कत नहीं करनी होती। होनहार खिलाडियों की प्रतिभा को निखारने और खेल के क्षेत्र में ही सक्रिय रहकर आगे बढ़ने में नियोक्ता भरपूर मदद दे रहे हैं। यह अवश्य है कि फिलहाल उनकी पूछ ज्यादा है जो सर्वश्रेष्ठ हंै। इस ट्रेंड में भी तेजी से बदलाव के संकेत हैं। इस प्रेरणास्पद माहौल में प्रतिभाओं का सैलाब सा उमड़ रहा है।


खेलों का संचालन
कम्पनी की तरह हो
देश में पनपता खेलों का विशाल बाजार युवाओं को सेहत, शोहरत और दौलत के सागर में गोते लगाने की दावत दे रहा है। देश के हजारो-लाखों युवा ख्यातनाम सितारों यानी स्पोट्र्स सेलिब्रिटीज को "फॉलो" कर रहे हैं, यह सुखद बदलाव है। अभिभावकों का भी पहले की तुलना में खेलों के प्रति रूझान बढ़ा है, सायना नेहवाल के पिताजी का उदाहरण सामने है, जो शुरूआती दिनों में अपनी लाडली को अभ्यास के लिए रोजाना स्कूटर पर ले जाया करते थे।
नि:संदेह, सिडनी ओलम्पिक में भारोत्तोलक कर्णम मल्लेश्वरी के देश की पहली महिला पदक विजेता बनने तथा इससे पहले अटलांटा में लिएंडर पेस के कांस्य पदक जीतने की उपलब्घियों से खेलों के प्रति लोगों का नजरिया बदला है। अब वक्त आ गया है कि देश में खेलों का संचालन कम्पनी की तरह से हो, जिसमें सीईओ की देखरेख में सक्षम टीम विशेष्ा मुहिम में जुटे। खेल सरकारी सहायता पर निर्भर न रहकर अपने स्रोतों का खुद विकास करे।


जांबाज सितारे
भारतीय खेलों की सरजमीं पर फलती—फूलती यह यशगाथा उन जांबाज खिलाडियों की देन है, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में अपने मकसद को सामने रखकर कमोबेश व्यक्तिगत अभिरूचि और प्रयासों से बुलंदियां तय की हैं। ओलम्पिक श्रेष्ठता के रण में हेलिंसकी "1952" से बार्सिलोना "1992" तक भारतीय खिलाड़ी व्यक्तिगत सफलताओं से महरूम रहे। मास्को "1980" में रिकॉर्ड आठवीं बार स्वर्ण पदक जीतने के बाद से भारतीय हॉकी फिर शिखर का आरोहण नहीं कर पाई है। भारत के ओलम्पिक से खाली हाथ लौटने के सिलसिले को जांबाज टेनिस सितारे लिएंडर पेस ने अटलांटा "1996" में एकल स्पर्घा का कांस्य पदक जीतकर तोड़ा। लिएंडर के इस भागीरथी प्रयास के बाद से ओलम्पिक में भारतीय सितारे व्यक्तिगत मुकाबलों में कामयाबी की चमक बिखरते चले हैं। सिडनी ओलम्पिक "2001" में कर्णम मल्लेश्वरी भारतोलन में कांस्य पदक जीतने में सफल रहीं वहीं एथेंस "2004" में निशानेबाज राज्यवर्घन सिंह ने डबल ट्रैप में रजत पदक जीतकर उम्मीदों की नई रोशनी फैलाई। बीजिंग "2008" में अभिनव बिंद्रा ने ओलम्पिक इतिहास में देश को पहली बार व्यक्तिगत स्वर्ण पदक दिलाया तो मुक्केबाज विजेंद्रसिंह और पहलवान सुशील कुमार ने कांस्य पदक जीतकर खेलों में बुलंद होते भारतीय हौसलों को चार चांद लगाए।
ओलम्पिक में इन सितारों की उपलब्घि से बड़े लम्हे के रूप में दर्ज है पीटी ऊष्ाा द्वारा 1984 के लॉस एंजलिस ओलम्पिक में भरा गया फर्राटा। ऊष्ाा के सैकण्ड के 100 वें हिस्से के अंतर से कांस्य पदक जीतने से वंचित रह जाने की कसक आज भी भारतीय खेलप्रेमियों के मन में मौजूद है। कुछ ऎसी ही परिस्थितियों में 1972 के म्यूनिख ओलम्पिक में एथलीट मिल्खासिंह विश्व और ओलम्पिक कीर्तिमान रचने के बावजूद चौथे स्थान पर रह गए थे। उड़नपरी और उड़न सिख के नाम से मशहूर देश के ये दो महान एथलीट ओलम्पिक में पदक जीतने के एजाज से महरूम अवश्य रहे, मगर देश में आज आकार ले रही खेल संस्कृति में इनका कालजयी योगदान रहा है।

खेलोगे-कूदोगे
बनोगे नवाब
भारतीय खेलों में अभिभावकों की आंखों से श्रेष्ठता की हदों पर कुलांचे भरने का ख्वाब देखती प्रतिभाओं का मंजर एक क्रांतिकारी बदलाव है। वे दिन अब हवा हो चुके हैं, जब इस देश में बच्चों, किशोरों और युवाओं की खेलने की नैसर्गिक चाहत को "खेलोगे-कूदोगे होओगे खराब, पढ़ोगे-लिखोगे बनोगे नवाब" की नसीहत डस जाया करती थी। डॉक्टर, बैरिस्टर और इंजीनियर के रूप में अपने नौनिहालों की हैसियत के ख्वाब देखने वाले मां—बाप अक्सर आदर्श के डंडे के रूप में इस जुमले का प्रयोग करते थे और खेल प्रतिभाएं पनपने से पहले ही हालात के आगे हथियार डाल देती थीं। खेलों को दोयम दर्जे की चीज समझने वाले अभिभावकों की सोच में अब रात-दिन का बदलाव आ गया है। खेल को करिअर बनाने की बच्चों की इच्छाएं अभिभावकीय वरदहस्त के पंखों से उड़ान भर रही हंै। माता—पिता अपनी आंखों के तारों के खेलों की सरजमीं पर दम भरते हौसलो को जवां रखने के लिए रात दिन एक करने में गर्व महसूस करते है। बदलाव की इस बयार ने खेलों की सूरत और सीरत बदल दी है। ""खेलोगे कूदोगे बनोगे नवाब"" एक तरह से खेलों के मर्म को आत्मसात करते हमारे समाज का नया नारा है।


युवा शक्ति
के ब्रांड एम्बेसडर
क्रिकेट टीम के कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी खेलों में युवा शक्ति के ब्रांड एम्बेसडर है। जी तोड़ मेहनत और सकारात्मक सोच से लोकप्रियता के नए प्रतिमान स्थापित करते धोनी का नाम ब्रांड बन गया है। धोनी ने पिछले दिनों एक स्र्पोट्स मैनेजमेंट कम्पनी से तीन वष्ाोüं के लिए 210 करोड़ रूपये का अनुबंध किया है। क्रिकेट के डॉलर युग में सालाना 42 मिलियन डॉलर की आय के साथ धोनी इंग्लिश फुटबॉलर डेविड बेकहम, अमेरिकी बास्केटबाल खिलाड़ी माककल जार्डन जैसे सितारों की श्रेणी में शामिल है। धोनी से पहले 2006 में सचिन तेंदुलकर ने तीन वष्ाोüं के लिए 180 करोड़ रूपये का विज्ञापन करार भारतीय खेलों में सर्वाधिक था। क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर 37 करोड़, युवराज सिंह 25.7 करोड़ तथा राहुल द्रविड 23.1 करोड़ रूपये सालाना अर्जित करते है। अन्य खेलों में राज्यवर्घन सिंह, अभिनव बिन्द्रा, विजेन्द्र सिंह, विश्वनाथन आनंद, वाईचुंग भूटिया, पेस, भूपति और सानिया मिर्जा जैसे सितारों की भी विज्ञापनों में बड़ी मांग रही है।


कीर्ति पुरूष को नमन
दुनिया में भारतीय हॉकी के इकबाल को बुलंद करने वाले मेजर ध्यानचंद का शुमार विश्व के खेल इतिहास में जेसी ओवंस, सर डॉन ब्रेडमैन और बॉब रूथ सरीखी महान खेल शख्सियतों में होता है। दद्दा के नाम से प्रसिद्ध ध्यानचंद को भारतीय हॉकी ही नहीं, भारतीय खेलों के पितृ पुरूष्ा का दर्जा दिया जाता है। ध्यानचंद की निष्ठा, समर्पण एवं देश के लिए योगदान को याद करते हुए उनके जन्मदिन को राष्ट्रीय खेल दिवस के रूप में मनाया जाता है।
एम्सटर्डम में 1928 के ओलम्पिक खेलों में भारत द्वारा पहली बार हॉकी स्वर्ण पदक जीतने की कामयाबी में हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद का अस्मिरणीय योगदान रहा। ध्यानचंद ने 5 मैचों में 14 गोल कर दुनियाभर के हॉकी प्रेमियों का दिल जीत लिया। इसके पश्चात 1932 के लॉस एंजिल्स एवं 1936 के बर्लिन ओलम्पिक खेलों में भी सिरमौर बनकर भारत ने स्वर्णिम तिकड़ी पूरी की। ध्यानचंद की अगुआई में ओलम्पिक में भारत की उस अभिनव श्ुारूआत के बाद, देश ने अब तक आठ ओलम्पिक स्वर्ण पदक जीतने का गौरव अर्जित किया है। ओलम्पिक में भारत का यह कीर्तिमान आज भी अक्षुण्ण है। ध्यानचंद के रूतबे और मैदान पर बाजीगरी का जिक्र करें तो 1928 के ओलम्पिक के बाद उस जमाने के समाचार पत्र में छपी ये सुर्खियां जेहन में कौंधती हैं —""यह हॉकी का खेल नहीं जादू है, स्टिक से बाजीगरी का दुर्लभ एहसास है, ध्यानचंद सही मायने में एक जादूगर हैं!"" खेल दिवस पर भारतीय खेलों के पितामह को शत—शत नमन।
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