सघन चिकित्सा इकाई (आईसीयू) में इलाज का चलन बढ़ा है, और बढ़ रहा है। आक्सीजन, सक्षन, मॉनिटर पर सतत दिखती ईसीजी, अंकित होती दिल की धड़कनें, रक्तचाप, प्रतिलक्षित होती रक्त में ऑक्सीजन की मात्रा, कृत्रिम श्वास के लिए वेन्टीलेटर, ह्वदय गति रूकने पर वापस चालू करने के लिए डिफिब्रीलेटर। प्रशिक्षित नसेंü। हर समय माजूद डॉक्टर, सघन चिकित्सा के प्रतीक, मानक और माने। खर्चा तो खूब होता है लेकिन सम्बन्धियों को संतोष होता है कि उच्च चिकित्सा हो रही है। चिकित्सक भी खुश।
उच्च स्तरीय साधन और सघन चिकित्सा मेें सेवा शुल्क भी उसी अनुरूप सघन। गंभीर रोगों में सघन चिकित्सा आवश्यक है, जीवन रक्षक होती है। व्यवसायीकरण के कारण जाने-अनजाने इसका अनावश्यक उपयोग और दुरूपयोग भी बढ़ा है। विशेषकर अंत:स्थित (टर्मिनल) अवस्था में। हर केस में एक समय आता है जब सघन चिकित्सा असफल हो जाती है, उसको चालू रखना निरर्थक। लेकिन चिकित्सक ऎसा कहने में झिझकते हैं। कारण इसे उसकी अक्षमता समझा जाएगा। जब तक सांस है तब तक आस है।
परिजन सघन चिकित्सा रोकने को मानते नहीं, पैसेवाले तो अगर डॉक्टर ऎसा करे तो उस पर हत्या का मुकदमा करने में नहीं झिझकते। गरीब भी लुट जाते हैं, लेकिन लोग क्या कहेंगे के डर से स्वीकार नहीं करते। फलस्वरूप एयरपोर्ट में जैसे उद्घोष होता है "कृपया ध्यान दें! यह श्री/श्रीमती.... के लिए आखिरी और अंतिम बुलावा है, आखिरी और अंतिम, कि वे यात्रा के लिए तुरन्त प्रस्थान करें!" आईसीयू का दरवाजा खोल बाहर आ आवाज लगाती नर्स "बैड नम्बर...!" और डॉक्टर का बताना कि मरीज क्रिटिकल है। हर कुछ मिनट बाद वही "योर अटेंशन प्लीज! लास्ट एण्ड फाइनल काल फॉर.." एयरपोर्ट अस्पताल।
आईसीयू। गंभीर रोगी। हठात् कार्डियाक एरेस्ट हुआ - धड़कन बंद। अलार्म चीखी। लास्ट एण्ड फाइनल काल! लास्ट एण्ड फाइनल...! डाक्टर नर्स लपके। कार्डियाक मसाज शुरू हुआ। एक ने श्वास गति संभाली। दूसरी ने डॉक्टर के कहे अनुसार नस में इन्जेक्शन लगाया। डॉक्टर ने मॉनिटर की ओर देखा और शॉक (इलेक्ट्रिक झटका) लगाने की तैयारी करने को कहा।
सब बिस्तर से दूर हट गये। डॉक्टर ने झटका लगाया। मोनीटर की ओर देखा। वापस मशीन पर बटन सैट किया और फिर एक झटका। इस बार मॉनिटर पर ह्वदय गति लौटी। बाहर जाकर मरीज की हालत बताई गई और वेन्टीलेटर लगाने की स्वीकृति ली गई। रक्तचाप काफी गिर गया, उसे संभालने को ड्रिप में कुछ दवा डलवाई। बेहोशी गहरी हो रही थी। पलकें उठा कर पुतलियों को देखा, फैली हुईं थीं, टार्च की रोशनी से भी कोई फर्क नहीं। रक्तचाप भी ऊपर नहीं आ रहा था।
लेकिन दिल धड़क रहा था, वेन्टीलेटर से सांस चल रही थी। थोड़ी देर बाद फिर मॉनिटर का अलार्म बज उठा "लास्ट एण्ड फाइनल काल फॉर " वही प्रक्रिया फिर शुरू की गई पर उसी उत्साह से नहीं। फिर भी धड़कन लौट आई। नर्स ने बाहर जाकर आवाज लगाई "बैड नम्बर...!" और स्थिति से अवगत कराया। लेकिन कुछ समय बाद फिर जब अलार्म बजी तो उसके बाद स्वयं डॉक्टर ने बाहर आ कर इस बार अंतिम प्रयास के बजाए अंतिम प्रयाण की सूचना दी।
श्रीगोपाल काबरा
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