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Saturday, 19 May, 2012
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धरती की सतह पर "समय से मुठभेड़"
Sunday, December 25, 2011, 11:25 hrs IST
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अदम गोंडवी नहीं रहे। हम "न हन्यते हन्यमाने शरीरे" कहकर हमेशा की तरह अपने दिल को दिलासा देने की कोशिश कर सकते हैं। हम यह कह कर भी अपने दिल को समझा सकते हैं कि यही जीवन की नीयति है। दुनिया में जो आया है, उसे एक दिन जाना ही होता है। लेकिन "धरती की सतह" पर "समय से मुठभेड़" करते हुए (अदम गोंडवी की दो चर्चित पुस्तकों के नाम हैं- धरती की सतह पर, समय से मुठभेड़) जिस तरह से अदम गोंडवी ने हमसे विदा ली, उसने एक बार फिर उस कुटिल जनहितैषी व्यवस्था की असलियत का बेपर्दा कर दिया, जिसके खिलाफ वो जीवन भर आवाज बुलंद करते रहे।

अदम गोंडवी जिस राजनीतिक दुराचार के खिलाफ धारदार गजलों के लिये अपने समय के सबसे लोकप्रिय कवियों की कतार में सबसे आगे खड़े हो गए, उस राजनीतिक व्यवस्था से अदम के प्रति सहानुभूति की उम्मीद करना कितना व्यावहारिक था, यह चर्चा का विषय हो सकता है- लेकिन जाते हुए भी अदम गोंडवी ने जैसे अपनी एक चर्चित गजल के इसी शेर को दोहराया- "सौ में सत्तर आदमी जिस देश में नाशाद हैं/ दिल पे रखकर हाथ कहिए -देश क्या आजाद है।"

अदम गोंडवी का मूल नाम रामनाथ सिंह था। वो देश की आजादी के करीब तीन महीने बाद ही 21 अक्टूबर 1947 को उत्तरप्रदेश के गोंडा जिले के आटा ग्राम में जन्मे थे। हिन्दी गजलों के जिस तेवर को दुष्यंत ने नये प्रतिमान दिए थे, अदम ने उसकी तुर्शी को और धार दी। गजल को आशिक- माशूका के संवाद तक सीमित रखने के पैरोकारों से उन्होंने कहा- "चार दिन फुटपाथ के साये में रहकर देखिए/ डूबना आसान है, आंखों के सागर में जनाब!"

वो अपनी गजलों में उस आदमी की बात करते थे- जिसके हाथ में छाले है, पैरों में बिवाई है। साहित्य उनके लिये शब्दों की विलासिता नहीं थी, क्योंकि देश की आजादी के बरस में पैदा होने वाले इस कवि को यही चिन्ता परेशान किए रहती थी कि - "आजादी का वो जश्न मनाएं तो किस तरह/ जो आ गये फुटपाथ पर घर की तलाश में।"

अदम तो सच को इस हद तक कहने के आदी थे कि -"रोटी कितनी महंगी है ये वो औरत बताएगी/ जिसने जिस्म गिरवी रख के ये कीमत चुकाई है।" अपने इसी तेवर के साथ अदम गोंडवी ने देश भर में अपनी कविताओं को गुंजाया। उनके कुछ शेर तो वहां भी पहुंचे, जहां तक स्वयं वो नहीं पहुंचे। एक बड़े कवि की इससे अधिक सार्थक पहचान और क्या हो सकती है कि लोगों को उसकी पंक्तियां याद रहें, भले ही उसका नाम याद नहीं हो। "काजू भुने हैं प्लेट में, व्हिसकी गिलास में/ उतरा है रामराज विधायक निवास में" और "जो डलहौजी कर न पाया वो ये हक्काम कर देंगे/ कमीशन दो तो हिन्दोस्तान को नीलाम कर देंगे" जैसी उनकी रचनाएं ऎसी ही रचनाओं में हैं, जिन्हें देश भर के लोगों ने सुना है और याद रखा है। ये पंक्तियां हिन्दी कवि सम्मेलनों के ताली बजवाऊ कवि अपनी कविता की भूमिका में श्रोताओं का दिल जीतने और तालियां लूटने के लिये देश भर में सुनाते हुए पाए जाते हैं।

अदम गोंडवी पिछले कुछ दिनों से लीवर के संक्रमण से परेशान थे और उनकी स्थिति लगातार नाजुक होती जा रही थी। सेहत के साथ आर्थिक दिक्कतों की कड़वी सच्चाई भी सामने आई तो देश के कुछ संवेदनशील रचनाकारों ने सोशल नेटवर्किग साइट्स पर उस कवि के जीवन के दर्द को साझा किया- जिस कवि ने अपनी सर्जनात्मक सक्रियता के दौर में लिखा था -"तुम्हारी फाइलों में गांव का मौसम गुलाबी है, मगर ये आंकड़े झूठे हैं, ये दावा किताबी है।"

अदम गोंडवी चले गए। यह वर्ष, जिसे "क्रांतियों का वर्ष" कहा जा रहा है, यह वर्ष जिसमें जनआंदोलनों ने राजपथ पर फैली चुंधिया देने वाली रोशनी के पहरूओं को विवश किया है कि वो फुटपाथ पर सोने वालों की जिन्दगी के अंधेरे को भी महसूस करे- उस वर्ष की विदा की वेला में-"जनता के पास एक ही चारा है- बगावत/ ये बात कह रहा हूं में होशोहवास में" कहने वाले कवि का इस तरह चला जाना लंबे समय तक अखरेगा। अदम गोंडवी कई बार राजस्थान आये। उनकी धारदार गजलों ने यहां के अवाम के दर्द को भी अभिव्यक्त किया और यहां भी व्यवस्था से जुड़े पाखण्ड को बेनकाब किया। उनके चले जाने की टीस यहां भी सवाल करती सी दिखती है कि अब कौन करेगा "धरती की सतह पर" "समय से मुठभेड़"?
उनकी स्मृतियों को नमन!

अतुल कनक
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