इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने सबसे बड़ा अपराध यह किया है कि जूते बनाने वाले तो भूखे मरते हैं और जूते खाने वाले सेलिब्रिटी हो जाते हैं। टीवी ने क्रांति कर दी है। राम-जानकी के स्वयंवर से चले थे, राखी सावंत के स्वयंवर तक आ गए। राखी का स्वयंवर, क्या स्वयंवर था? जो स्वयं वर लगती है उसने स्वयंवर किया। सोलह लड़के थे और अकेली राखी सावंत। स्वयंवर ऎसे रचा गया, मानो क्रिकेट का आईपीएल खेला जा रहा हो। स्वयंवर का लीग। स्वयंवर का प्री-क्वार्टर फाइनल। वह तो अच्छा हुआ कि फाइनल विजेता उस एनआरआई लड़के का राखी सावंत से सिर्फ सगाई में पिंड छूट गया। दुर्भाग्य से ब्याह हो लेता तो भाई को रनर मांगना पड़ जाता। इसके बाद राहुल महाजन के स्वयंवर में उसने एक लड़की का चयन किया और शादी भी की।
संभव है, शादी इस आशंका के मध्यनजर करनी पड़ी होगी कि आखिरी मौका है। जो हो पर यदि चैनल वाले राखी सावंत और राहुल महाजन के फेरे आपस में ही करा देते तो इतना उपकार तो होता ही कि दो के बजाए एक ही घर डूबता। टीवी चैनलों पर आधे समय नेता, अभिनेता और क्रिकेटर छाए रहते हैं और आधे समय सांप-बिच्छू, भूत-प्रेत। दर्शकगण भी सांप-बिच्छू, भूत-प्रेत वाले प्रोग्राम अधिक रूचि से देखते हैं कि नेताओं, अभिनेताओं और क्रिकेटरों से तो कम नुकसानप्रद हैं। चैनल वालों को जब तक जूली और मटुकनाथ (लवगुरू) नहीं मिले, तब तक वे उस राधावेशधारी आईजी पांडा को बेचते रहे। एक चैनल ने स्वर्ग के सीढियां लगा दीं। दूसरा चैनल दावा कर रहा है कि उसने लंका ढूंढ ली है। यहां अयोध्या ही देश के गले में फंसी पड़ी है। खबर के नाम पर नितान्त बेखबर चैनल। ताजा समाचारों की अपेक्षा लिए टीवी ऑन किया। अप्रत्याशित खबर मिली कि टीम इंडिया के कप्तान धोनी की कल सगाई हुई और आज वह ब्याह कर बैठा। समाचार वाचक मुस्कुरा रहा था, किंतु मेरा गला भर आया। दूसरे ही महीने में दूसरा वज्रपात। राष्ट्र सानिया मिर्जा के निकाह से उबरा भी नहीं था कि धोनी ने और आत्मघाती कदम उठा लिया।
टेनिस की बात अलग है। गेंद कब तक हवा में रहती? विश्वास था कि धोनी तो दिलेर है, नॉट आउट रह लेगा, लेकिन दोस्त, बाहर जाती गेंद को छेेड़ा है तो अब जिंदगीभर भुगत। हाय! जिन कर-कमलों में गलव्ज सुशोभित थे, अब उनमें राशन-सब्जियों के थैले होंगे। स्टेडियम में बैठी लड़कियों की ओर जानबूझ कर चौका लगाने वाला घर में चौका लगाएगा। सानिया मिर्जा के असंख्य पुरूष प्रशंसक थे तो महेंद्र सिंह धोनी की असंख्य लड़कियां। मुझ जैसे तक जल-जल कर सोचते थे कि काश! सानिया की शादी कभी न हो और धोनी की तुरंत हो जाए। सानिया मिर्जा का निकाह जब भारतीयों के लाख न चाहने पर भी पाकिस्तानी शोएब मलिक से हो गया था तो हम भारतीय बड़े भारी मन से खुश हुए थे कि यह बहुत अच्छा हुआ। अब दुनिया देखेगी कि दुश्मन को इस हथियार से भी मारा जा सकता है। वह चेप्टर सदा के लिए क्लोज हो चुका है, क्योंकि बॉर्डर के दोनों ओर इतनी फौजें लगी रहती हैं कि सानिया मिर्जा तो हमारे ख्वाबों में भी नहीं आ सकती। पर इस धोनी को क्या सूझी? परसों तक अच्छा-भला खेल रहा था। दो ही दिन में ऎसी क्या मति फिरी कि कप्तान से पति हो गया? मां-बाप चिंतित रहे होंगे कि कहीं ऎसा न हो जाए कि छोरा रनों के बजाए उम्र की हॉफ सेंचुरी बना लें और सदा के लिए राजसिंह डूंगरपुर रह जाए।
टीवी समाचारों से यह महत्वपूर्ण जानकारी भी मिली कि धोनी का अपनी ब्याहता से कोई दो साल से प्रेम-प्रसंग चल रहा था। इसमें गलत भी क्या है? क्रिकेट का कायदा ही है कि मैच से पूर्व नेट प्रैक्टिस की जाए तो लाभ मिलता है, किंतु अनुभवियों की माने तो प्रेम और विवाह में फर्क है। प्रेमी क्लीन बोल्ड है तो शादी हिट क्रिकेट। अखबारों में धोनी के वैवाहिक चित्र छपे। मैंने हमदर्दी प्रकट की कि हे ईश्वर! इसे क्षमा करना। यह नहीं जानता कि इसने क्या कर लिया है। सभी चित्रों में धोनी के चेहरे पर धनुष तोड़ डालने का दर्प था, लेकिन यार हम शादी शुदाओं से जान कि धनुष भंग के साथ ही वनवास की प्रक्रिया प्रारंभ हो जाती है।
धोनी का विवाह देहरादून के एक रिसॉर्ट में चल रहा था। न्यूज रूम से एंकर ने दर्शकों में कहा,"चलिए, अब आपको सीधे घटनास्थल पर लिए चलते हैं। उसने घटनास्थल क्या कहा, लगा वहां शादी समारोह न होकर कोई ट्रेन पटरी से उतर गई है। अघाकर मैंने चैनल बदला। वहां भी वही "आज मेरे यार की शादी है"। सारे न्यूज चैनल अदल-बदल कर देखे! एक-एक फेरे के कई-कई रीप्ले "दूल्हा-दुल्हन" भी धीमी गति से फेरे ले रहे थे, ताकि चैनलों वाले कॉमर्शियल ब्रेक ले सकें। जाहिर-सी बात है, दोनों हाथ मिलाने से धुलते हैं। किसी सेलिब्रिटी का ब्याह हो तो चैनलों वाले हर दर्शक को बाराती बना लेते हैं। स्मरण होगा अभिषेक बच्चन और ऎश्वर्या राय का विवाह। चैनलों वाले मारे खुशी के इस कदर पागल हो गए थे गोया अपनी लुगाइयों से तलाक मिल गया हो। इस देश में लाखों लड़कियां दहेज के अभाव में अविवाहित रह जाती हैं अथवा विवाह के बाद प्रताडित होती रहती हैं। वहां इस लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के कैमरों की नजर नहीं पड़ती। टीवी चैनल्स वाले गरीबी के दृश्य तब तक नहीं दिखाते, जब तक कि कोई स्पॉन्सर नहीं मिल जाता। हां, टीवी का शिक्षा के प्रचार-प्रसार में अवश्य भारी योगदान है। अध्यापक कक्षा में महाभारत के रचयिता का नाम पूछ ले तो विद्यार्थी बीआर चोपड़ा का नाम बताते हैं।
संपत सरल
|
|
|
|
|
|
|