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Saturday, 19 May, 2012
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फ रारी की सवारी
Sunday, January 22, 2012, 09:43 hrs IST
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humtum
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यह किसी फिल्म की कहानी नहीं हैं फिल्मों से प्रभावित होने वालों की कहानी है। पुलिस के अफसर, जो सरकार के समकक्ष होते हैं, फिल्मों के सिपाहियों की वर्दी से प्रभावित हो गए। उन्हें अपने सिपाहियों की खाकी वर्दी खाक लगने लगी। फै सला किया कि वर्दी का रंग-ढंग बदला जाना चाहिए। वह चुस्त दुरूस्त और वर्तमान से अलग भविष्य के किसी रंग की होनी चाहिए। मुजरिम पकड़ने या जुर्म की पड़ताल करने या जांच के तरीके सीखने के बहाने विदेश जाने की बजाय, इस बार वर्दी का डिजायन ढंूढने के लिये साहब लोगो ने अमरीका-इंग्लैड की यात्राएं सपरिवार की। एक डिजायन तय हो गया। एतराज आया कि यह ठंडे मुल्क की ड्रैस है। क्या अपने गर्म देश में भद्दी नहीं लगेगी? जवाब आया- आदमी गर्म-ठंडा होता है, मुल्क नहीं। वास्कोडिगामा ठंडे देश से इस मुल्क में आया था तब लंबे बूट और गर्म कपड़े का ओवर कोट पहन कर आया था, उसे तो गर्मी नहीं लगी। फिर कष्ट उठाकर जनता की सेवा करना तो हम पुलिस वालों का फर्ज है।

एक सिपाही इस अनचाहे बोझ से परेशान हो गया। अपने नजदीकी साहब के पास गया।
"साहब, मारे बोझ और गरमी के परेशान हो गया हूं। कोई बिना वर्दी की ड्यूटी लगवा दीजिए।"
"बड़े साहब के यहां पौंछा लगाने को तैयार हो?"

"साहब, यह तो लदे हुए पर और लादना हुआ।"

"तो, तुम्हें आराम वाली, कुछ पाने वाली ड्यूटी चाहिए। इसके लिए कुछ करना होगा।"
"कितना करना होगा , साहब?"

"क्या समझा तूने? जबसे लोकपाल आने को हुआ है, हमाने राजनीतिक आका तक डरने लगे हैं। हमारी तो बिसात ही क्या है...।"
इतने में बाहर कुछ खटका हुआ। साहब चौंका तो सिपाही ने कहा-डरिये मत, लोकपाल नहीं है, डाक पुरूष है। "
"क्या कहा? डाकू पुरूष है? आत्मसमर्पण करने आया है?"

"जी, डाक पुरूष यानी पोस्टमैन।"

"सीधे सीधे पोस्टमैन क्यों नही बोलता। अब तो सरकार ने भी कह दिया है कि जिस शब्द की हिन्दी नहीं कर सकते, उसकी अंग्रेजी कर दो।"
"साहब, अपनी डिक्शनरी में हिन्दी-अंग्रेजी की बजाय "देसी-अंग्रेजी" होती है। खैर, साहब आपको क्या, चाहिए?"
"कोई इनामी फ रारी पकड़वा कर दे।"

"साहब, यह तो मेरे बांए हाथ का काम है। क्योंकि मेरे घर के दांई तरफ एक फरारी का पच्चीस साल पुराना ठिकाना है?"
"पच्चीस साल से उसका ठिकाना है? वह आज तक पकड़ा क्यों नहीं गया?"

"पच्चीस साल पहले उस पर इनाम घोषित हुआ था, आज वह मामूली लगता है। फिर वह किसी को दिखाई नहंी दिया। क्योंकि वह कभी दुबई चला गया तो कभी बांग्लादेश। कभी इस पार्टी में तो कभी उस पार्टी में। चुनाव लड़ने का भी शौकीन है। आजकल गोल्डन चांस है। उसके सिर पर कोई मजबूत वरदहस्त नहीं है।"

"उसका नाम और ठिकाना बता।"

"अभी? पहले आप उस पर घोषित इनाम का भाव तो बढ़वाइए।"

"वाह। तूने अपना भाव अभी से बढा दिया। अच्छा जा, सात दिन के लिये स्टेशन के बाहर बिना वर्दी की ड्यूटी करले।"

"नहीं साहब वहां नहीं, वहां लड़कियों को छेड़ने वाले शोहदे, उठाईगीर, सट्टे का नम्बर लिखने वाले सब मुझे पहचनते हैं। मुझे "गुरू-गुरू" कहकर मेरी इज्जत करने लगेंगे। कोई और जगह बताएए।"

"अच्छा तो जा, हमारे मंत्री जी की विरोधी पार्टी के दफ्तर की निगरानी कर। कौन आता जाता है, यह नोट करते रहना। सिर्फ सात दिन के लिये। सातवें दिन उस पच्चीस साल पुराने फरारी को पकड़वाने आ जाना। एक फरारी की सवारी मिल जाये तो महकमे में कुछ नाम होगा।"
सात दिन? वह सिपाही आज तक वापस नहीं आया। क्यों आए? उसे उस राजनीतिक पार्टी के नेता ने चुनाव लड़ने का टिकट जो दे दिया। वह जीत गया तो महंगी गाड़ी फरारी पर सवार होकर ही आयेगा। वरना अपनी "फरारी" की सफाई देगा कि उसे बंधक बनाकर अज्ञात जनता के सामने फेंक दिया गया था।
गोविंद शर्मा
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