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Saturday, 19 May, 2012
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नया सवेरा
Sunday, December 18, 2011, 11:32 hrs IST
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असर की नमाÊा से फारिग होकर सदफ ने चाय बनाई। कप में डाली और बालकनी में जा ही रही थी कि फोन की घण्टी बज उठी। उसने फोन उठाया, "हैलो" कहा उधर से आवाज आई "सदफ मैं" यह तो वही आवाज थी जिस पर वो अपनी जान कुर्बान करती थी। दो साल के बाद इस आवाज को सुनकर सदफ के दिल के तार झनझना उठे। वो बोली "आरिफ आप बोल रहे हैं? बताओ आरिफ आप कैसे हैं? इतने दिन कहां थे?" उसने एक साथ ही कई सवाल कर डाले। जवाब में आरिफ ने केवल यही कहा कि "सदफ मैं बिलकुल ठीक हूं, और कल सवेरे घर पहुंच रहा हूं। आने पर तुम्हें सब बताऊं गा।" इतना कहकर फोन बन्द कर दिया। सदफ की समझ में नहीं आ रहा था कि वो इतनी बड़ी खुशी को कैसे व्यक्त करे।

साईमा अपने कमरे में सो रही थी। सदफ ने चाहा कि उसे झंझोड़कर उठाए और ये खबर उसे सुनाए। उसे बताए कि तुम रोज-रोज अपने पिता की तस्वीर से बातें करती हो न। उन्हें घर आने के लिए कहती हो। देखो वो सचमुच आ रहे हैं। जी भरकर उनसे बातें करना। उसे खयाल आया कि पांच साल की मासूम बच्ची क्या समझ पाएगी कि आज मैं कितनी खुश हूं। उसने सोचा कि खुशी नापने का कोई पैमाना होता तो वो भी अपनी खुशी नापती। अपनी इस बेवकू फाना-सी सोच पर वो हंस दी। इतनी प्यारी सी खबर के लिए उसने खुदा का शुक्र अदा किया और चाय का कप थामें बालकनी में आ गई।

आज वह बहुत खुश थी। चाय की चुस्कियां लेते-लेते वो अतीत में चली गई। किस तरह वो और आरिफ बालकनी में शाम की चाय पीते थे। दोनों का एक-सा शौक था कि चाय के साथ सूर्यास्त का आनन्द लेना। आरिफ के साथ गुजारे सब खूबसूरत पल उसे एक के बाद एक याद आने लगे। फिर वो भयानक पल भी याद आया जब आरिफ ऑफिस के काम से जर्मनी जा रहा था।

हंसता मुस्कुराता तीन साल की साईमा को प्यार करता हुआ सदफ को खुदा हाफिज कहते हुए वो चला गया था। रास्ते में उसके हवाई जहाज का हादसा हुआ और पूरे दो साल हुए उसका कहीं कोई पता नहीं चल पाया। सदफ इस हादसे को पूरी तरह भूल जाना चाहती थी। वो इस खुशी को भरपुर तरह से मनाना चाहती थी जो कल सवेरे उसे मिलने वाली थी। वो कल के इन्तजार में चेहरे पर मुस्कुराहट लिए सूरज के डूबने का दृश्य देख रही थी। अचानक उसके चेहरे की खूबसूरती में इजाफा हो गया था। कल की सदफ और आज की सदफ में जमीन आसमान का अन्तर देखा जा सकता था। वो जानती थी की कल आने वाले नये सवेरे के लिए सूरज का डूबना कितना जरूरी है। आज डूबते सूरज का लाल रंग उसे ऎसा लग रहा था कि जैसे दुल्हन का लाल घंूघट हवा में लहरा रहा हो।

कल इसी बालकनी मे उसकी सहेली रीमा ने उसे बहुत डांट सुनाई थी। रीमा को बचपन से ही गलतफहमी थी कि जो भी सूर्यास्त को दिलचस्पी से देखता है, उसकी खुशियां भी इसी तरह डूब जाती हैं। बल्कि कल रीमा ने गुस्से में यहां तक कह दिया था कि "तुम्हारी इसी आदत के कारण ही तुम्हारी खुशियां डूब गई हैं। तुम्हारा सुहाग दो साल से लापता है। फिर भी तुम अपनी इस आदत से बाज नहीं आ रही हो।" सदफ ने कई बार उसकी इस गलतफहमी को दूर करने का प्रयास किया था। सदफ ने कहा "रीमा ये चांद, सूरज, तारे जमीन, आसमान हैं, ये सारे खुदा के तोहफे हैं। ये सबके फायदे के लिए हैं। तुम मेरी खुशियों को सूरज को डूबने के साथ मत जोड़ा करो।

सदफ रीमा के बारे में सोच रही थी कि दरवाजे की घण्टी बज उठी। रीमा खड़ी थी। साईमा ने बालकनी की तरफ इशारा करते हुए कहा कि "आंटी मम्मी वहां हैं।" रीमा व्यंग्य में बोली, हां, व्यस्त होगी सूर्यास्त के दृश्य को निहारने में।"

रीमा बालकनी में आई और हमेशा की तरह समझाने लगी "ये क्या सदफ कल की डांट का तुम पर कोई असर नहीं हुआ" कहते हुए उसने सदफ के चेहरे पर नजर डाली तो वो मुस्कुरा रही थी। उसका चेहरा इतना सुन्दर लग रहा था कि हजारों खुशनुमा फूल उसके चेहरे पर खिल आए हों। उसके खूबसूरत होंठों पर भरपूर मुस्कुराहट थी। आंखों में प्रेम के दीपक झिलमिला रहे थे। कल तक सदफ के चेहरे पर बिछोह की तकलीफ, उसका दर्द साफ देखा जा सकता था। मगर आज यूं अचानक इतना बड़ा बदलाव। रीमा की समझ में कुछ नहीं आ रहा था।

तभी सदफ की हंसी की खनक उसके कानों से टकराई। उसने कहा "क्यों रीमा। तुम क्या कह रही थी?" रीमा ने होश संभालते हुए फिर से अपना लेक्चर शुरू किया। हमेशा तो सदफ उसका लेक्चर खामोशी से सुनती थी। वो जानती थी कि एक रीमा ही है जो उसे बहुत प्यार करती है। हम दोनों मां-बेटी का बहुत खयाल रखती है। मेरे दर्द को अपना दर्द समझती है। इसी हक से वो मुझे डांट भी देती है। आज वो रीमा की बात सुनकर मुस्कुरा रही थी और रीमा उसे देखकर तिलमिला रही थी। गुस्से में उसने कहा "सदफ।

मैं जा रही हूं। इस समय तुम सूर्यास्त का आनन्द उठाती हो तो मैं नहीं आऊं गी।" कहकर वो जाने के लिए जैसे ही पलटी सदफ ने उसका हाथ पकड़ लिया। रूक जाओ रीमा। आज मैं तुम्हें इतनी अच्छी खबर सुनाऊंगी कि तुम्हारी सब गलतफहमी दूर हो जाएगी। "देखो रीमा अभी-अभी...।" कहकर सदफ की जुबान रूक गई। खुशी के मारे उससे बोला नहीं जा रहा था। रीमा को ओर भी गुस्सा आया उसने कहा, "क्या अभी-अभी कह रही हो। जल्दी बोलो वरना मैं जा रही हूं।"

सदफ ने कहा, "देखो रीमा अभी थोड़ी देर पहले आरिफ का फोन आया था। "क्या?" कहकर रीमा अपने स्थान से उछल पड़ी। सदफ ने दोबारा कहना शुरू किया "हां, रीमा। आरिफ ने थोड़ी देर पहले मुझसे बातें की। वो ठीक-ठाक है। कल सवेरे घर पहुंच रहे हैं। मेरी जान, मेरी सहेली मैं बहुत खुश हूं। आज मैं सूर्यास्त की बहुत बेचैनी से प्रतीक्षा कर रही हूं।

मुझे जितना भरोसा सूरज के डूबने का है उतना ही कल सवेरे के आने का है। कल सूरज निकलेगा तो पूरी दुनिया रोशनी से नहा जाएगी। कल मेरे माथे पर मेरा अपना सूरज अपने सारे प्रकाश के साथ ऎसा निकलेगा कि मेरा सारा घर उसकी रोशनी से झिलमिला उठेगा। मेरे भाग्य पर आए काले बादलों को वो हमेशा के लिए समाप्त कर देगा। कल का सवेरा मेरे लिए नया सवेरा होगा।" कहते-कहते सदफ ने अपने सामने खड़ी साइमा को अपने से लिपटा लिया और आंसुओं की शक्ल में उसकी आंखों में खुशियों के झरने बहने लगे।
रीमा सोच रही थी कि ये आंसू बिछोह के हैं, वेदना के हैं, या कल नये सवेरे से मिलने वाली खुशियों के हैं।

शमशाद जलील "शाद"
अनुवाद: असद अली "असद"
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