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चिलम भरने की कला
Sunday, July 18, 2010, 10:48 hrs IST
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daily07
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चिलम भरने का व्यावहारिक फार्मूला बताने की अहमियत ही यह है कि आप उसे आधुनिक अर्थो में इस्तेमाल की जाने वाली चाटुकारिता से जोड़कर देखें। तंबाकू बनाकर चिलम भरने तक की पूरी प्रक्रिया एक अनुभव और कला का हिस्सा है। जाहिर है, आप किसी की चिलम भरने जा रहे हैं तो उसकी इच्छाएं, महžवाकांक्षाएं आदि का गहरा अध्ययन करना होता है। हर आदमी को चिलम भरने की कला नहीं आती। वह अपने समकालीनों में पिछड़ जाता है।

गांव से खबर आई है कि तिलोका राम नहीं रहे। अस्सी पार के थे। पिछली बार ही गया था, तो मेरी तेजी से लंबी होती बेटी को देखकर उन्होंने आशीर्वाद दिया था। उनकी बात में एक हास्य होता था, एक तंज भी। मेरी शहरी जिंदगी पर वे अक्सर तंज से बात करते थे। मुझसे अक्सर मजाक में टूटी फूटी हिंदी और अंग्रेजी मिलाकर बोलते थे। एक जमाने में उनके ऊंटगाड़ी हुआ करती थी। वे दूर-दूर से कुछ सामान लाया करते थे और बेचते थे। साबुत तंबाकू उनमें एक थी। तंबाकू की गुणवत्ता की उनको गहरी समझ थी। तंबाकू के साबुत डंठलों ओर पोटलियों को कूट पीस कर चिलम में भरने काबिल तंबाकू बनाने में भी उनको महारत हासिल थी। चिलम के लिए तंबाकू बनने की प्रक्रिया जिस दिन घर में होती थी, उस दिन बच्चों के उत्सव का दिन होता था। उन्हें दूर भेज दिया जाता ताकि उड़ती हुई धांस उनके गले तक नहीं जाए। जाहिर है उन्हें खेलने कूदने की आजादी होती।

हालांकि हमारी दिलचस्पी तंबाकू बनने की प्रक्रिया को देखने में ही होती। तंबाकू ओखली में कूटी जाती थी। उसमें गुड़ का मिश्रण किया जाता। फिर उसे नई चिलम में डाला जाता। चिलम में गले में एक ईट के टूटे हुए कंकर को रगड़कर गोल करके डाला जाता। उसकी गहराई से तंबाकू की खपत का सीधा रिश्ता था। चिलम के दूसरे दूसरे सिरे पर गीला कपड़ा ऎसे लपेट दिया जाता जैसे उसे कोई लुंगी पहनाई गई हो। फिर एक बुजुर्ग हमें आवाज लगाता कि चिलम के लिए आग चाहिए। जिसे वो खीरा कहते हैं। चिलम के माथे पर सुलगता हुआ कोयला रखा जाता। फिर तंबाकू टेस्टर बुजुर्ग के हाथ में थमाई जाती। वे बाई हथेली में अंगूठे से चिलम को दबाते और दाहिने हाथ की तीन अंगुलियां उसे कवर करती। दाएं हाथ का अंगूठा बाएं हाथ के अंगूठे पर चढ़ा रहता और फिर आंखें बंद करके आध्यात्म की मुद्रा में वे सुट्टा लगाते। पेट में खूब सारा धुंआ भरके उसे अंदर ही अंदर घुमाते। वापस बाहर निकालने के लिए नाक और मंुह दोनों काम आते। उस चेहरे के भाव देखकर यह अंदाजा लगाया जा सकता था कि तंबाकू और चिलम भरने की गुणवत्ता कैसी है?

चिलम भरने का यह मुहावरा इसीलिए जादुई है कि जो कद्र चिलम भरने वाले की होती है, वह दूसरे की नहीं। चिलम भरने का व्यावहारिक फार्मूला बताने की अहमियत ही यह है कि आप उसे आधुनिक अर्थो में इस्तेमाल की जाने वाली चाटुकारिता से जोड़कर देखें। तंबाकू बनाकर चिलम भरने तक की पूरी प्रक्रिया एक अनुभव और कला का हिस्सा है। जाहिर है, आप किसी की चिलम भरने जा रहे हैं तो उसकी इच्छाएं, महžवाकांक्षाएं आदि का गहरा अध्ययन करना होता है। हर आदमी को चिलम भरने की कला नहीं आती। वह अपने समकालीनों में पिछड़ जाता है।

आज शहरी किशोर और युवा शीशा का स्वाद चखते हैं, जो कि परम्परागत हुक्के का ही एक आभिजात्य रूप है। मुंबई में एक मित्र के घर इसी हुक्केनुमा यंत्र का रस लेने के लिए हमें चार घंटे इंतजार करना पड़ा क्योंकि उसकी कथित हर्बल तंबाकू का मिश्रण तैयार करने में जिस मित्र को महारत हासिल थी वह शूटिंग में व्यस्त था। उसके आने पर एक बार तैयार शीशा लगभग चार पांच-घंटे तक चलता रहा। मैंने उस दिन पाया कि मुंबई जैसे शहर में भी उस मित्र की कितनी बड़ी अहमियत सिर्फ इसलिए थी उसे नए जमाने की चिलम भरने का जादुई ज्ञान हासिल किया था।

राजनीति, खेल, सिनेमा, कारपोरेट सब जगह मेटाफर चिलम की अपनी अहमियत है। दरअसल बहुत लोग ऎसे भी हैं, जिन्हें चिलमभराई पसंद नहीं। लेकिन जैसा कि एक व्यंग्यकार मित्र के इस कथन में वजन था कि जो खुद ही अपनी चिलम भरकर पीना पसंद करते हैं, उन्हें भी यदि कोई एक दिन चिलम भरकर अपने हाथ से दे तो उसका एक कश लेने के बाद प्रतिक्रिया यही आएगी कि यार, तुम्हारी वाली तंबाकू का टेस्ट ज्यादा अच्छा है। जाहिर है, यह सब लिखते हुए प्रकारांतर से मैं अपने पाठकों की चिलम भर रहा हूं कि मेरी तंबाकू की कद्र करें। लेकिन जाते-जाते एक वैधानिक चेतावनी जरूरी है कि तंबाकू पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।

रामकुमार सिंह
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