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मुन्नार के जंगलों में...
Sunday, July 18, 2010, 10:45 hrs IST
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मुन्नार मुद्रापुझा, नलथन्नी और कुंडला नाम की तीन पहाडियों पर बसा है। पहाड़ों पर कभी ट्रेकिंग करते तो कभी गाड़ी के जरिए इधर-उधर घूमते ही चाय बागानों की सैर हो जाती है। यहां आस-पास के स्थानों पर खूबसूरत झीलें, जल प्रपात और चाय बागानों का सौंदर्य चप्पे-चप्पे पर बिखरा पड़ा है। यहां दक्षिण भारत की सबसे ऊंची अनामुड़ी चोटी भी है।

भारत की खोज करते-करते कोलम्बस भारत तो नहीं पहुंच पाया परन्तु उसने नई दुनिया की जरूर खोज कर दी। इसके बाद पुर्तगाली यात्री वास्को-डी-गामा ने भारत खोज का लक्ष्य तय करके जब यात्रा प्रारंभ की तो उसे बहुत सारी समस्याओं का सामना करना पड़ा परन्तु अंतत: उसने भारत को ढूंढ ही निकाला। कहा यह भी जाता है कि केरल के गरम मसालों की खुशबू ने ही वास्को—डी- गामा से भारत की खोज करवाई। जो भी हो इस बात से तो इनकार किया ही नहीं जा सकता कि वास्कोडीगामा के जरिए ही पहले पहल केरल के गरम मसालों का स्वाद सुदूर देशों तक पहंुचा। काली मिर्च, लौंग, इलायची, जायफल, दालचीनी, जावित्री, तेजपत्ता जैसे मसालों की यह प्रदेश खान है।....यहां चाय बागानों की भी भरमार है।

मीलों तक फैले चाय बागान ऎसे लगते हैं जैसे हरी-भरी मखमली कालीन धरती पर बिछाई हुई हो। ....केरल के इदुक्की जिले के प्रसिद्ध पर्वतीय स्थल मुन्नार की ओर हमारी गाड़ी आगे बढ़ रही है। गरम मसालों की सर्वाधिक खेती यहीं होती है। यह पूरा इलाका पहाड़ी है।....ड्राइवर बेहद सावधानी से गाड़ी पहाड़ों पर चढ़ा रहा है। गाड़ी से बाहर मीलों तक फैले चाय उद्यानों का मनभावन दृश्य देखते और इलायची की खुशबू महसूस करते हम दक्षिण भारत के पहाड़ों पर सैर की अनुभूति से ही रोमांचित हैं। यहां सड़क के किनारे मसालों की दुकानें भी थोड़े-थोड़े अन्तराल पर दिखाई देती हैं, पर्यटक इन्हीं से गरम मसालों की खरीद कर रहे हैं। ...समुद्र सतह से लगभग 1600 मीटर की ऊंचाई पर पश्चिमी घाट का बेहद खूबसूरत पर्वतीय स्थल मुन्नार अभी थोड़ी दूरी पर है। रास्ते में बहुत सी झीलें, जल प्रपात देखकर ही अनुमान हो जाता है कि यह जगह कितनी खूबसूरत है।

...लो पहुंच गए मुन्नार। पहाड़ों की ठंडक का अपना मजा है। घूमते-फिरते इस ठंडक को अनेक बार महसूस करता रहा हूं परन्तु यहां कुछ अलग बात है। हवा के झोंकों के साथ इलायची की खुशबू फिजाओं में जो है। ड्राइवर होटल में गाड़ी पार्क करता है। हम होटल मैनेजर से ही आस—पास के स्थानों के बारे में जानकारी लेते हैं। मुन्नार मुद्रापुझा, नलथन्नी और कुंडला नाम की तीन पहाडियों पर बसा है। पहाड़ों पर कभी ट्रेकिंग करते तो कभी गाड़ी के जरिए इधर-उधर घूमते ही चाय बागानों की सैर हो जाती है। यहां आस-पास के स्थानों पर खूबसूरत झीलें, जल प्रपात और चाय बागानों का सौन्दर्य चप्पे—चप्पे पर बिखरा पड़ा है। यहीं दक्षिण भारत की सबसे ऊंची अनामुड़ी चोटी भी है।

मित्र सुनील यहां के वन्य जीव अभ्यारण्य की सैर की राय देते हैं। हम सभी उनकी इस बात से सहमत हैं। दक्षिण भारत के हराविकुलम-राजमाला क्षेत्र का राष्ट्रीय वन्य प्राणी अभ्यारण्य और चिन्नूर वन्यप्राणी अभ्यारण्य में वनों का घनापन इतना है कि इसे देखकर अनजाना सा एक भय भी मन में प्रवेश करता है। हम अभ्यारण्य में दूर तक निकल आए हैं। जीव जंतुओं और वनस्पतियों के बीच यूं घूमना भला लग रहा है। लगता है भागम-भाग को छोड़ते ऎसे पल ही जिंदगी में आ जाएं तो कितना अच्छा हो परन्तु यह कोरी कल्पना है। जिस कंक्रीट के जंगल में हम रहते हैं, वहां किसी बात की सोचने की ही फुर्सत नहीं है... फिर भी जंगलों में यूं बेपरवाह घूमते हुए लगता है कि बचपन के दिन लौट आए हैं। तब कहां किसी बात की चिन्ता होती थी, जो अच्छा लगता वही करते। अब हर पल जैसे जिन्दगी की रेस बहुत कुछ करने से रोक देती है। कहीं हमसे कुछ ऎसा नहीं हो जाए, कुछ वैसा नहीं हो जाए। दूसरे से पिछड़ नहीं जाएं। नौकरी में ट्रेक से भटक नहीं जाएं....इतनी चिन्ताएं कि हर पल सजग रहता है मन। भीड़ के जंगल में हर आहट से चौकन्ने जैसे अपने आप से ही हम हर पल, हर क्षण दूर हुए जाते हैं।

"क्या सोचने लगे? प्रकृति के नजारों को देखो। देखो, इन जंगल के जीव जंतुओं को।" मुझे विचारों में खोए देखते जीपी शुक्ला ने कहा तो मैं विचारों के घने जंगल से फिर से मुन्नार लौट आया। नीरव वातावरण में पक्षियों की चहचहाट और झाडियों में सरसराते पशुओं की आहट को हम साफ सुन रहे थे कि कोई जंगली जानवर तेजी से झाडियों में लुप्त हो गया। यहां इस अभ्यारण्य में विशाल वृक्ष हैं। ऎसे पक्षी भी बहुतायत से दिखाई दे रहे हैं, जिन्हें पहले कभी देखा नहीं। पक्षी विज्ञान के बारे में ज्यादा जानकारी भी तो नहीं है, इसलिए उनकी प्रजातियों की पहचान भला हमें कैसे हो।

मुन्नार के आस-पास पहाड़ ही पहाड़ हैं। अभ्aयारण्य तो खैर घोçष्ात उद्यान है परन्तु यूं भी यहां इधर—उधर भ्रमण के दौरान जंगल की सैर लुभाती है। जल प्रपात, नदियां और पहाड़ के नीचे कुछ स्थानों पर ठहरा पानी तालाब की मानिंद। दूर तक नजर जाए तो चाय के बागान सुनियोजित हरियाली फैलाए। लगता है, प्रकृति यहां पर पूरी तरह से मेहरबान है। प्रकृति का सौन्दर्य यहां तरतीब से बिखरा पड़ा है।

सोते समय जीपी शुक्ला मिमिक्री करते चुटुकुलों का जैसे पिटारा ही खोल देते हैं। इन्हें सुनकर सभी लोटपोट हो रहे हैं। दिनभर की थकान हंसी में जैसे गायब हो गई। हास्य की यह उन्मुक्तता यात्रा के इन दिनों में ही होती है, अन्यथा तो चाहकर भी कहां हंस पाते हैं। राहुल सांकृत्यायन ने तो यायावरी को धर्म बताते पूरा इस पर घुमक्कड़ शास्त्र ही लिख दिया। यह सब यूं ही थोड़े ही है। सच में घूमने में जो सुकून है, वह किसी और में नहीं। आधी रात हो गई है और सभी एक दूसरे को शुभरात्रि कहते नींद की गोद में अपना सर रख देते हैं।

डॉ. राजेश कुमार व्यास
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