हमारे यहां ऎसा ही होता है, जिन क्षेत्रों के खिलाडियों को सबसे ज्यादा समझदार माना जाता है, वहां यदि कोई ऊलजुलूल हरकत करे तो उसे पागल चाहे मान लिया जाए, पर वह पूजनीय पागल होता है। तो फिर फिल्में क्यों अछूती रहें। फिल्म का नाम होता चार समझदार, तीन भोले भाले, तीन शरारती तो शायद फिल्म नहीं चलती। यह श्रेय जाता है फिल्म का नामकरण संस्कार करने वाले पंडित को, उसने नाम रखा "थ्री इडियट्स" और पता नहीं कितना का इडियटपना फिल्म के लिए बाहर आ गया। समझदार से इडियट बड़ा होता है। इसलिए शास्त्रों में लिखा है-इडियटम् प्रथम: वंदे! लोग हैं कि अपने लिये इडियट शब्द सुनकर गुस्सा हो जाते हैं या चुप हो जाते हैं। क्यों? जबकि यह सम्मान तो किसी-किसी को, कभी-कभी ही मिलता है।
मैं "फूल" "फुलिश" की बात नहीं करता। फूल तो काफी कूल और हल्का होता है। जब तक उसके साथ डैम या ब्लडी जैसा कोई शब्द जोड़ा न जाए, उसमें वजन ही नहीं होता। इडियट अपने में पूर्णता लिए होता है। मेरी मुश्किल यह भी है कि कुछ लोग बिना सोचे समझे किसी के लिए भी इडियट शब्द उपयोग में ले आते हैं। जबकि इडियट कहलाने के अधिकारी सिर्फ वे होते हंै, जिन्होंने यह सम्मान पाने के लिए त्याग किया हो, तपस्या की हो। उन्होंने देखा गांव में काफी लोग एक कुंए को घेरे खड़े हैं। पता चला कि इस गहरे कुएं में एक आदमी गिर गया है। "क्या वह जिन्दा है?" एक ने बताया-जब गिरा था, तब तो जिन्दा था, अब क्या है यह पता लगाने के लिए हम यहां इकठ्ठे हुए हैं। मर गया तो बचाव कार्याें में तेजी लाई जाएगी। जिन्दा है तो बेचारे को क्यों परेशान करें। बाहर भीष्ाण गर्मी है। भीतर अंधेरा है इसलिए नीचे तक कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा। टॉर्च की रोशनी भी नहीं पहुंच रही है। उन्होंने सुझाया-बिजली का एक लंबा तार लो। उसके आगे होल्डर में बल्ब लगाओ और नीचे लटका दो। बल्ब की रोशनी से .....। यह आइडिया तो बहुत पहले एडीसन ने दे दिया था। पर इसके लिए बिजली का होना जरूरी है। तुम लालटेन का जिक्र कभी मत करना। वह भी बल्ब की तरह परजीवी होती है। उसे भी तेल चाहिए। तेल राशन डिपो पर पहुंचने से पहले ही ब्ल्यू से ब्लैक हो जाता है। कुएं में सूरज की रोशनी कभी नहीं पहंुचती है। यह भी मत पूछना कि उसकी आवाज आ रही है क्या? यहां धरती पर खड़े लोग इतना बोल रहे हैं कि एक दूसरे की आवाज ही समझ में नहीं आती, वहां पाताल में गये व्यक्ति की कौन सुने?
घबराने वाले जीव नहीं थे वे। उन्होंने कहा-आपने वह कहावत तो सुनी ही होगी जहां न जाए रवि, वहां जाए कवि। रवि से रोशनी होती है, वह कुएं में नहीं जाता तो वहां किसी कवि को फेंक दो, कुआं रोशन हो जाएगा। इतना सुनते ही गांव वाले ने बड़े ध्यान से उन्हें देखा। सिर पर लंबे बाल, बेतरतीब मूंछों के साथ बढ़ी हुई दाढ़ी। बिल्कुल कवि लगते हैं। गांव वाला यह अनोखा आइडिया लेकर दूसरे लोगों की तरफ मुड़ा ही था कि वे खिसक लिए। अजीब अहमक है, मेरा आइडिया मुझ पर ही आजमाना चाहता है। मेरी जूती मेरे सिर। वे खिसक लिए तो बच गए। अब यह साबित हो गया है कि इडियट कौन होता है। वह नहीं होता, जिसकी भाष्ाा में इडियम की भरमार हो, इडियट वह होता है जिसके पास "आइडिया" की भरमार होती है, जो यहां-वहां, कहां-कहां "आइडिया" बांटता हो।
शेर (जंगल या चिडियाघर वाला नहीं) की तरह "आइडिया" भी पेटेंट नहीं होता है। इन पर हर कोई अपना बौद्धिक अधिकार मानता है। प्रेमी प्रेम प्रकट करने के लिए, याचक दान मांगने के लिए, महफिल में अपने को पढ़ा-लिखा साबित करने के लिए लोग किसी भी शायर का शेर मार देते हैं। अब इन शेरों के द्वारा वित्तमंत्री भी शिकार करने लगे हैं। वे अपने बजट भाष्ाण में शेर वहां बोलते हैं जहां टैक्स लगाने की घोष्ाणा हो या महंगाई कम होने का झांसा हो। यहां शेर चाकू छुरा हो जाता है। इसी तरह किसी का आइडिया हो, उसे लोग चुरा ही लेते हैं। शायद ही ऎसी कोई फिल्म बनी हो या किताब छपी हो जिसमें मेरे आइडिया का उपयोग न हुआ हो। उन पर मैंने मेरा आइडिया चुराने का मुकदमा नहीं किया, इसका एक कारण तो यह है कि मैं मुकदमा करके क्यों उनकी पब्लिसिटी करूं। दूसरा यह है कि दूसरे लोग मौलिक नहीं होते हैं। ऎसे भी आगे आ सकते हैं, जो कहें कि यह आइडिया तो हमारा था। एक लेखक ने मेरे आइडिया के साथ ही मेरे द्वारा रचित कहानी चुरा ली थी। मैंने उसे मुकदमा करने की धमकी दी तो उसने अपनी संस्था से एक बड़ा सा पुरस्कार दिलवा दिया। मुकदमा करने और उस आइडिया को अपना बताने के मेरे विचार की भ्रूण हत्या हो गई। मैं वैसे भी चुप रहता हूं। क्योंकि मेरे आइडिया कभी-कभी भयंकर हादसे भी घटित कर देते हैं। गलत परिणाम की जिम्मेवारी दूसरों पर पड़े, यह आइडिया नेताओं और अफसरों का नहीं मेरा है, जिसे वे सब अपना समझकर मान रहे हैं। मेरा यह शोधपत्र पढ़कर आप मान गए होंगे कि जिसके पास आइडिया होता है वही इडियट होता है। जैसे जिसके पास जिन्न हो, जिसके भीतर जिन्न घुसा हो या खुद जिन्न जैसा हो, वह जीनियस होता है। आइडिया मौलिक हो तो इडियट भी स्वरचित होता है, वह जीनियस से बड़ा होता है। अब तक तो हम आइडिया के दुरूपयोग को रोकने का आइडिया तो नहीं ढूंढ सके हैं, कम से कम इडियट शब्द का उपयोग तो सही करना शुरू कर दें। यदि हमारे पास कोई आइडिया है तो दूसरे कहें, उससे पहले ही हमें गर्व से कहना चाहिए कि हम इडियट हैं।
गोविंद शर्मा
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