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Wednesday, 08 February, 2012
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पैसे की रखवाली
Sunday, July 18, 2010, 10:38 hrs IST
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भारत की ग्राम विकास की कुछ महत्वपूर्ण योजनाएं, कवीन्द्र रवीन्द्रनाथ टैगोर की कल्पनाएं हैं, जिन्हें आजादी के कई वष्ाोü पूर्व अपने व्यक्तिगत स्तर अपने क्षेत्र के गांवों में ठोस रूप दिया था। उनके बारे में यह धारणा रही थी कि उनके पास काफी संपत्ति थी और वे बहुत ही धनवान थे। लेकिन वष्ाü 1914 में जब उन्हें नोबेल पुरस्कार मिला उस वष्ाü उनके उपर 30 हजार का कर्ज हो गया था। नोबेल पुरस्कार की राशि से न सिर्फ उन्होने इतना बड़ा कर्ज चुकाया बल्कि आयकर विभाग का लगभग 2700 रूपए बकाया थे उसे भी चुकता किया। फिर एक रूपए का स्टाम्प पेपर खरीदकर उन्होंने आयकर को माफ करने का आवेदन प्रस्तुत किया। इतना ही नहीं, शेष्ा बची राशि को कृçष्ा सहकारिता बैंक में लगा दिया जो हमेशा के लिए डूब गया।

यह कम आश्चर्य का विष्ाय नहीं है कि अमेरिकी नागरिक कभी विश्व में सबसे दरिद्र और भ्रष्ट कहे जाने वाले बांग्लादेश के ग्रामीण बैंक से कर्जü लेने लगे हैं, जो नोबेल विजेता मोहम्मद युनुस की माइक्रो फाइनेंसिंग कल्पना का यथार्थवादी रूप है। जो सबसे गरीब लोगों की पंक्ति में बैठी सबसे गरीब स्त्री को वित्तीय सहायता देता है। और उनकी प्रतिभा को सम्मान के साथ आर्थिक आजादी देता है। असल में इसकी धारणा भारतीय ग्रामीण विकास बैंकों की स्थापना से मिलती जुलती है जिसे सौ वष्ाü से भी अधिक का समय हो चुका है, लेकिन सहकारी बैंकों में लूट खसोट की नीयत होने के कारण उनकी छवि वैसी नहीं बन पाई। इसकी स्थापना का उद्देश्य गरीब मजदूर किसान और निर्घन उद्यमी, जो बडे-बड़े बैंकों तक नहीं पहंुच सकते हैं, उनको वित्तीय सहयोग दिलाना था। लेकिन परिणाम यह है कि सहकारी बैंकों के संस्थापक ही देर सबेर बैंको की राशि को खुर्द बुर्द करके सरकार को चूना लगा देते हैं और उसके बाद मुकदमों के अंतिम फैसले तक वे पूरी जिन्दगी जी चुके होते हैं और लुटे-पिटे गरीब बर्बाद हो चुके होते हैं। ऎसे में महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता ।

यदि नीयत साफ हो और देश एवं अपने समाज के प्रति आदर हो तो उसकी ध्वजा पूरे विश्व में उसी तरह फहराने लगती है जैसे बांग्लादेश के नोबेल विजेता मोहम्मद युनुस के ग्रामीण बैंक की ध्वजा अमेरिका जैसे समृद्ध देशों में फहराने लगी है। अभी दो वष्ाü पहले बांग्लादेश सबसे निर्घन और भ्रष्ट देशों में गिना जाता था लेकिन उसी देश के एक व्यक्ति की बैंकों को लेकर एक नई अवधारणा ने, अमेरिका ब्रिटेन जैसे देशों में महान बैंकों की धारणा को बदल दिया है। और स्थिति यह है कि "ग्रामीण" शब्द अमेरिका के न्यूयॉर्क, ओमाहा और वॉशिंगटन डीसी जैसे महत्वपूर्ण शहरों में सुनाई देने लगा है।

1983 में मो. युनुस ने बैंçंकंग के क्षेत्र मेंं एक नया प्रयोग शुरू किया था जिसके तहत अब तक अरबों रूपए बांटे जा चुके हैं और रिकॉर्ड के अनुसार 98 फीसदी वसूली दर्ज की गई है। यह कर्ज न सिर्फ बांग्लादेश के लोगों को दिया गया है बल्कि अमेरिका के ग्रामीण बैंक के तहत अरबों डॉलर अमेरिका के जरूरतमंदों को दिए जा चुके हैं। इसलिए इस बैंक की विश्वसनीयता और साख इस हद तक पहंुच गई है कि कम से कम ब्याज दर पर ऋण की सुविधा देने वाला यह अमेरिका का पहला बैंक है, जिसे ग्रामीण बैंक के नाम से जाना जाता है।

इस बैंक की सबसे बड़ी विशेष्ाता है कि यह सिर्फ प्रतिभावान महिलाओं को दिया जाता है। यदि किसी क्षेत्र में उनके पास हुनर है और उसके लिए उनको पूंजी चाहिए तो आसान ब्याज दर पर उनके लिए जरूरी कर्ज मुहैया करा दिया जाता है। प्रत्येक सदस्य को जिसे कर्ज दिया जाता है उसे हर सप्ताह साप्ताहिक बैठक में अपनी उपलब्घियों के बारे में बताना होता है और किसी भी स्तर पर आने वाली परेशानियों को बताना होता है ताकि उनको दूर करने का साझा प्रयास किया जा सके। इस प्रकार जितनी भी कर्ज लेने वाली महिलाएं हैं, उनका एक ग्रुप बन जाता है और आपसी सहयोग से सबको इतना लाभ होने लगता हेै कि बैंक से लिया गया कर्ज वापस हो जाता है। इस प्रकार के कर्ज से इस बात की गारंटी हो जाती है कि ऋण सही और जरूरतमंद çस्त्रयों को दिया गया है। इससे सबसे बड़ा लाभ होता है कि समाज में çस्त्रयों की आर्थिक निर्भरता बढ़ जाती है। उनका सम्मान बढ़ जाता है। यह भी çस्त्रयों के आर्थिक सशक्तिकरण की नई सोच है, जो किसी भी प्रकार के कानून बनाने से लाख गुना बेहतर है।

आज बड़े-बड़े बैंकों में यह कहा जा रहा है कि "आप अपने ग्राहकों को जानिए।" और वे इसे लेकर प्रचार करते दिखलाई दे रहे हैं। जबकि ग्रामीण बैंक में इन नियमों के तहत सबसे पहले ग्राहक को जांच कर ही ऋण उपलब्ध कराया जा रहा है। ऋण देने के बाद ग्राहकों को जानने की कोशिश नहीं की जाती। असल में देखें तो इस प्रकार का ग्रामीण बैंक एक समाज को जोड़ने के साथ सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा प्रदान करता है,जो इस देश में नहीं है। आज निजी बैंको की हालत यह है कि ऋण वसूली के लिए गुंडे पालने पड़ते हैं, जो जबरन घर-घर जाकर ग्राहकों को आतंकित कर उन्हें कभी-कभी तो आत्महत्या करने पर मजबूर कर देते हंै। उन बैंकों के खौफ से कोई कर्ज लेने से पहले कई बार सोचता है । उन्हें भय रहता कि न जाने कब बैंकों के गुंंडे सरेआम उस पगड़ी को न उछाल दें जिसे बचाए रखने के लिए उन्होंने कर्ज ले रखा है।

बडे-बड़े बैंक शहर के अमीरों के लिए कर्ज की व्यवस्था करते हैं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापार करना चाहते हैं। लेकिन अपने पड़ोस के गरीब को हिकारत से देखते हैं। जबकि ग्रामीण बैंक अपने जरूरतमंद पड़ोसियों का खास खयाल रखता है। इससे लाभ यह होता है कि इसकी वसूली के लिए गुंडे या किसी असामाजिक तत्वों का सहारा नहीं लेना पड़ता। डा. मो. युनुस का मानना है कि ग्रामीण बैंकिंग की इस धारणा को माइक्रो बंैकिंग भी कहा जा सकता है। इससे उन लोगों के लिए कर्ज की सुविधाएं मुहैया कराने की व्यवस्था की जाती है जो अति से भी अति गरीब हैं और जिन्हें किसी भी कीमत पर बड़े-बड़े बैंकों द्वारा कर्ज नहीं मिल सकता। भारत जैसे गरीब देशों की बात जाने दीजिए अमेरिका में भी 8 फीसदी ऎसे लोग हैं, जिनको किसी बैंक के आस-पास के भवनों की भी जानकारी नहीं है। लेकिन इनमें से लगभग 3500 ऎसी महिलाएं हैं जो अमेरिका के ग्रामीण बैंक से कर्ज लेकर अपनी आर्थिक स्थिति को सुधारने में लगे हंैं। एक अनुमान है कि 2013 तक यह ग्रामीण बैंक विश्व में बहुत बड़े-बड़े बैंको की तरह अपनी पहचान बना लेगा।

यह अजीब सा विरोधाभास है कि एक तरफ भारत चन्द्रमा पर पानी की खोज कर रहा है दूसरी और यहां के राजस्थान सहित बिहार, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश जैसे राज्य अफ्रीका के 26 गरीब देशों से भी अधिक गरीब हैं। लेकिन हर वष्ाü हम झूठे बयानोंं और प्रचारों में प्रदेश को अमेरिका से भी समृद्ध बनाते रहे हैं। हालांकि प्रदेश के नेताओं को जनता के साथ ऎसा भद्दा मजाक करते हुए शर्म भी नहीं आती। यह एक अजीब संयोग है कि बांग्लादेश के नोबल पुरस्कार विजेता मो. युनुस की तरह भारत के नोबेल विजेता रवीन्द्र नाथ टैगौर ने भी गरीब किसानों की आर्थिक सहायता के लिए नोबेल पुस्कार का कुछ हिस्सा एक ग्रामीण सहकारी बैंक को दे दिया था।

शोçष्ातों, ग्रामीण मजदूर और किसानों को लेकर उनके मन में कितनी पीड़ा थी उसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि भारत की ग्राम विकास की कुछ महत्वपूर्ण योजनाएं, कवीन्द्र रवीन्द्रनाथ टैगोर की कल्पनाएं है, जिन्हें आजादी के कई वष्ाोüं पूर्व अपने व्यक्तिगत स्तर अपने क्षेत्र के गांवों में ठोस रूप दिया था। उनके बारे में यह धारणा रही थी कि उनके पास काफी संपत्ति थी और वे बहुत ही धनवान थे। लेकिन वष्ाü 1914 में जब उन्हें नोबेल पुरस्कार मिला उस वष्ाü उनके उपर 30 हजार का कर्ज हो गया था। नोबेल पुरस्कार की राशि से न सिर्फ उन्हाेंने इतना बड़ा कर्ज चुकाया बल्कि आयकर विभाग का लगभग 2700 रूपए बकाया था उसे भी चुकता किया। फिर उन्होंने एक रूपए का स्टाम्प पेपर खरीद कर आयकर को माफ करने का आवेदन प्रस्तुत किया। इतना ही नहीं, शेष्ा बची राशि को कृçष्ा सहकारिता बैंक में लगा दिया जो हमेशा के लिए डूब गया। यह ऎतिहासिक तथ्य है कि गरीब किसानो को महाजनों के चंगुल से बचाने के लिए रवीन्द्र नाथ टैगोर ने देश के पहले कृçष्ा बैंक की कल्पना ही नहीं की बल्कि उसे व्यावहारिक रूप देने की पहल भी की। वे जानते थे कि सिर्फ साहित्य या कला के संबंध में मीठी-मीठी बातें करने से ही काम नहीं चलता। इसके लिए आर्थिक विकास भी जरूरी होता है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि इस ओर देश के किसी भी अर्थशास्त्री का ध्यान नहीं गया।

राधेश्याम तिवारी
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