आधुनिक राजस्थानी साहित्य के अग्रणी रचनाकार कीर्तिशेष चन्द्रसिंह बिरकाली "लू" व "बादली" जैसी काव्यकृतियों के कारण कवि रूप में जाने जाते हैं। चन्द्रसिंह ने कुछ कहानियां भी लिखीं, जिनमें लोक-जीवन की अलग अलग रूपों में अभिव्यक्ति हुई है। उनके जन्म-शताब्दी साल पर स्मरण के साथ "हमलोग" के पाठकों के लिए पांच छोटी कहानियां.....
सुभान तेरी कुदरत प्रभात का सुहावना पहर। चैत का महीना। फूटते फोग। कैर मोर से लदे-फदे। धरती पर पड़ी ओस जैसे मोती। लोरी-सी देते हवा के झीने झौंके। धरती की हरी साड़ी पर कशीदा-सा निकालती उगते सूरज की किरणें। जंगल में मंगल।
जगह-जगह हरिणों की टोलियां। काले हरिण आगे सरदार की तरह चलते। पीछे हरिणियां। उछल-कूद करते। चौकड़ी भरे तो लाहौरी कुत्तों को मात दे। झाडियों की ओट में लोमड़ी, पूंछ हिलाती घूमती। सियार और सियारी रात के रमे हुए, कोरे टीलों पर लौटते, किलोलें करते, रागनियां निकालते। कहीं खरगोश मखमल-सी घास पर रूई के फैल-से उड़ते नजर आते हैं तो कहीं आखिर में बैठे मस्ती करते हैं।
भांति-भांति की चिडिया चर-चर करती। कैरों पर गोले टूटते। सारी रोही चहचहाट करती। उसी वक्त एक तीतर खेजड़ी से उड़कर कोरे टीले पर नीचे उतरा। सामने दीमक से भरी पुरानी थेपड़ी नजर आई। डग खुली, गरदन उठी, चारों तरफ देखा। जंगल मे मंगल देखकर फूला। सृष्टि ने जीवन का संदेश दिया। खुशी का कोई पार नहीं। मगन होकर पूरे जोर से बोला। समूची रोही गूंजी-"सुभान तेरी कुदरत"। तीतर का बोलना हुआ, ऊपर उड़ते लक्कड़बाज की आंख चट उस पर पड़ी। पवनवेग से सरसप्प नीचे आया। वापस ऊंचा चढ़ा तो तीतर बाज के पंजे में था, दीमक थेपड़ी में। दूसरा तीतर बोला। रोही फिर गूंजी-"सुभान तेरी कुदरत"।
सब जन एक गरमी के दिन-शिखर दोपहर-आग जैसे जलती। लू के थपेड़े तन पर डाम-से लगते। सिगड़ी से तपते धोरे। बालू तपे सोने सी चमचमाती। आंखे चुंधियाती। रोही में जानवर झाडियों की ओट में सांसों की धौंकणी चलाते। रेवड़ और गायों के ग्वाले गांव को लौटते। इसी समय पण्डित जी हलुवे के लालच में आकर दूसरे गांव चले। तीन कोस की दूरी। आधी दूर से पहले पानी की लोट पी ली। ऊपर से तपती। रेत में पांव ऎसे लगता जैसे भोभर में चला गया हो। पण्डित जी कदम आगे बढ़ाए तो पीछे पड़े। ओठों पर पपड़ी। थूक सूखता।
गिरते-पड़ते मुश्किल से सामने वाली खेजड़ी तक पहुंचे। दूर ग्वाले की नजर पण्डित जी पर पड़ी। दीवड़ा बगल में दबाए भाग कर आया। पण्डित जी को जैसे राम मिल गया। दीवड़े की तरफ देख कर बूक मांडी। ग्वाला बोला-चमार हूं सा। पण्डित जी मुंह में जीभ फेर कर बोले-भाई सब जन एक है, शास्त्रों में लिखा है। ग्वाले ने दीवड़ा टेढ़ा कर दिया। पण्डित जी आधा गटक गए।
जान में जान आई। गांव नजदीक लिया। दूसरे दिन पण्डित जी टीका-टमका लगाकर यजमान के घर गए। संकरी गली में वही ग्वाला मिल गया। पण्डित जी बोले,"थोड़ा ठहर, मुझे जाने दे। कंबल समेट ले, मुझे मत छुआ देना। ग्वाला बोला-"सब जन एक है पण्डित जी, शास्त्रों में लिखा है।" पण्डित जी ने गरदन नीची कर उतावले कदमों से यजमान का घर नजदीक किया।
बाईजी की खैरात पौष का महीना-सूरज की उगाली-उत्तरी हवा-बिछौने से उठने की बात डंडे -सी लगती है। बाहर निकलते ही दांत बजते है। ऊंची-सी हवेली-आकाश से बातें करती- उसमें एक मोटे सरदार का वास। सरदार बहुत मिलनसार। राज में पासा।
एक अधबूढ़ा-सा भिखारी-घुटनों तक धोती तन पर- वह भी लीर-लीर - माथे पर पोतिया-भूखे पेट दांत बजते-डांफर को पीठ दे हवेली के सामने झांक कर पूरे जोर से बोलता है- "बाईजी की खैरात ओ बिलाला राजा।" उसी वक्त एक मोटर आई, हवेली के सामने ठहरी। उठती जवानी का अलबेला सरदार, मोटर से सीधा सीढियों पर सुनी-अनसुनी कर टप-टप ऊपर, ड्योढ़ी का दरवाजा खुला।
सामने राणीसा, मुजरा और मनुहार हुई। नीचे से फिर आवाज आई - "बाईजी की खैरात ओ बिलाला राजा।"सुनी अनसुनी कर दोनों महल के अंदर। ड्योढ़ी का रखवाला भिखारी को फटकारता है, "जाओ यहां से। यह राजा का महल है। वो सामने विदेशी कुत्ता दिख रहा है क्या। यदि खोल दिया तो खैरात-सी मिल जाएगी।" भिखारी उसकी बात सुनी -अनसुनी कर बोला- "झरोखे से झांको ओ बाई-सा। मेरी आंते कुलबुला रही है । बाई जी की खैरात ओ राणीसा।" भीतर से जोर से हंसी सुनाई पड़ी। चाय की प्याली खनकी। ड्योढ़ी का रखवाला फिर ललकारता है, "जाओ यहां से। कुछ नही मिलेगा यहां। दिखता नहीं यह राजा का महल है।"
भिखारी की आत्मा तड़प उठी- पूरे जोर से बोला-"नाई राजा भी मना नहीं करता। आप तो सचमुच राजा हो।" थोड़ी देर में सरदार ड्योढ़ी के बाहर-राणीसा भीतर-मुजरा किया -विदा हुए। भिखारी की आवाज आई- "बाई जी की खैरात ओ बिलाला राजा।" एक सर्रर के साथ मोटर पार। भिखारी के मुंह में उसका धुंआ और धुल। ड्योढ़ी के दरवाजे बंद हो गए।
कोरे घड़े का पानी कोरे घड़े का पानी मां। जीभ सूख रही है- रामू बोला। रामू किशन खाती का बड़ा बेटा। मां का लाडला। घर का उजाला। साथी-संगियों का चहेता। उम्र कोई पंद्रह-सोलह साल। गांव में खूबसूरतों में गिना जाता। गोरा छरहरा। बड़ी-बड़ी आंखें। आज तीन दिनों से सुन्नपात में। खाट के पास बैठी उसकी मां उसका मुंह ताक रही है। उसका कलेजा मुंह को आ रहा है। तभी रामू फिर बड़बड़ाने लगा। दोनों हाथ थाम उसे जगाया। थोड़ी देर बाद पानी मांगा। रूहे मटके से पानी की कटोरी भर उसके ओठों के लगाई। पानी मुंह में भर कुरला कर वापस थूकता बोला, "कोरे घड़े का पानी मां।"
"बेटा यही अच्छा है। एक-एक घूंट पी।" सुनी-अनसुनी कर रामु ने फिर आंखे बंद करली। थोड़ी देर में- "काका कहां हैं मां। गायें खेत में घुस गई होगी। पेमे को मारूंगा। जोहड़ में नहाकर आऊंगा।" फिर बड़बड़ाने लगा। रामू का काका वैद्य को लेकर शहर से वापस नहीं लौटा। गांव के सयाने समझदार लोग अपनी-अपनी बुद्धि से लौंग, दालचीनी, जावत्री देकर थक गए। कोई लाग-लपट बताए तो कोई कहे बच्चे के नजर लग गई। लोग आते हैं और देखकर लौट जाते है। खाट के पास बैठी मां मावडियांजी को मनाती है।
श्रेत्रपाल जी को धोकती है। रामदेवजी के मंदिर की पैदल जात बोलती है। माताजी के "आखा" दिखाती है। तभी रामू फिर कोरे घड़े का पानी मांगता है- "मां, मैं मरा। " मां की आंखों से आंसुओं की धारा बहने लगी । कटोरी ओठों के लगा कर कहती है - "ले बेटा।" पानी वापस थूकता है। "कोरे घड़े का पानी मां" कहकर फिर खाट पर गिर पड़ता है और आंखे बंद कर लेता है बेचारी मां करे तो क्या।
सारे देवी देवता मना कर थक गई। ओझा से झाड़ा दिलवा दिया। वैद्य आया नहीं। हे सांवरा, तेरी शरण। पल भर मां की आंख लगी रामू की आंखे खुली। दूर कोरिया घड़ा दीखा। फुर्ती से डब-डब लोटा भर, गट-गट पी, खाट पर आकर सो गया। जोर से बड़बड़ाने लगा। मां जगी। सामने देखा तो रामू चुप। हाथ लगाया। शरीर ठंडा टीप। दहाड़ मार कर मां भी उस पर पड़ गई। थोड़ी देर में वह भी ठंडी टीप।
बिल्ली का पंजा बेचारी कबूतरी कई दिनों से अकेली। छाती नीचे दो अंडे। इतना-सा परिवार। उस पर सारी आस। चार-पांच आड़े-तिरछे तिनकों से बना उसका घौसला। पड़ौसियों का प्यार जिससे उम्र के दिन तोड़ती।
इंतजार करते-करते आज सोने का सूरज ऊगा। नन्हे-नन्हे दो बच्चे उसकी आंखों के सामने। गुटरगूं से कमरा गूंजने लगा। खुशी का पार नहीं। मस्ती में झूमे। सुख के सागर में हिलोरे भरे। पिछले दुख गए पिछली गली। आज कबूतरी बहुत खुश। दिन छिपा। रात आई। चारों तरफ अंधेरा। पूर्ण शांति। आस-पास सब नींद में। कबूतरी आनंद में मगA दोनों बच्चे उसकी छाती के नीचे।
आधी रात कबूतरी की आंख लगी। बच्चे खिसक कर घौसले से नीचे पड़ गए। पीले बादल के चूने की बेला आई। कबूतरी की आंख खुली। घौसले में देखा तो फिर अकेली। आंखों के सामने अंधेरा छा गया। क्रोध में बावरी हो, पापी की पड़ताल में पवनवेग से उड़ी। सामने दीवार से टक्कर लगी- प्राण उड़ गए। सामने से आते हुए आदमी की नजर उस पर पड़ी। उसे उठाया तो उसके नीचे बिल्ली के पंजे का निशान नजर आया।
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