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Tuesday, 07 September, 2010
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मजाज के सौ साल
Sunday, July 11, 2010, 11:10 hrs IST
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मैंमजाज को जानता हूं उनके नाम से। उन्हें मानता हूं उनके काम से। उनको पहचानता हूं उनकी दर्दभरी जिंदगी के अंजाम से, वो अक्टूबर 1911 में लखनऊ के करीब एक छोटी-सी बस्ती रदौली में जन्मे और उसी लखनऊ में, जिसे वे खुद शहरे निगाहां (हसीनों का नगर) कहते थे, 5 दिसंबर 1955 में हमेशा के लिए रूखसत हो गए। उनका जीवन 45 साल की कमाल और जवाल की दास्तान है। इस दास्तान में अब कमाल कम नजर आता है। जवाल (पतन) से ज्यादा उनके चेहरे से नकाब उठाता है, कमाल से जवाल तक आने में उनकी यादों को 55 साल लग गए। उनके देहांत पर रघुपति सहाय फिराक ने लिखा था- दौरे हाजिर की शायरी में मजाज एक अजीबोगरीब हैसियत रखता है। वो एक बाण की तरह छूटा और फिजा की बुलंदियों में फूल सी जगमगाती चिंगारियां बिखेरकर बुझ गया, लेकिन ये चिंगारियां उसके मुख्तसिर से संग्रह में (आहंग) में हमेशा के लिए महफूज हो गई हैं।

मजाज मिर्जा गालिब की तरह यूं तो सिर्फ एक ही संकलन के शायर थे, लेकिन गालिब और मजाज में बहुत फर्क है। आदत के लिहाज से दोनों शराबी थे। तबीयत के लिहाज से दोनों इंकलाबी भी थे, लेकिन जहानत के लिहाज से मिर्जा सारा जहान थे और मजाज केवल अपनी प्रगतिशीलता का हिंदुस्तान थे। इसे यूं भी कहा जा सकता है मजाज अपने युग में अपनी तबियत से तरक्की पसंदाना थे और मिर्जा मजाज से सूफियाना थे। सूफी की दुनिया सिद्धांतों की धरती से बड़ी होती है। गालिब की तलाश इंसान की तलाश थी और मजाज की खोज उस इंसान में सीमाओं की पहचान थी। मजाज अपने युग की यादगार है। इस यादगार को मजाज के समकालीन प्रगतिशील शायर फैज अहमद फैज ने लिखा था- मजाज के आर्ट में थकान नहीं मस्ती है, उदासी नहीं सरखुशी है, वह दूसरों की तरह इंकलाब की गरज और ललकार नहीं था। ये इसका नगमानिगार था... ये सच है कि कई एक-सी बातों के बावजूद वो मिर्जा गालिब न थे, न बन सके। कुदरत ने उन्हें मजाज बनाकर भेजा था और मजाज होने की सीमाओं से न खुद बाहर निकल सके और न उनके सामाजिक हालात ने ऎसा होने दिया, अब वो सिर्फ वही हैं जैसे अपने पहले और आखिरी संग्रह में नजर आते हैं। उसमें वेे हुस्न के परिस्तार, तन्हाइयों के शिकार हैं, कई छोटी-बड़ी नौकरियां करने के बाद भी बेरोजगार हैं। पागलपन के दौरों के बीमार हैं, लेकिन इसके बावजूद अपने जमाने के मुशायरों का वकार हैं और जिगर मुरादाबादी की तरह शे"र सुनने वालों के दिलदार हैं। वो अपने साथ के शायरों में सबसे ज्यादा लोकप्रिय थे। इस लोकप्रियता में उनकी शायरी के साथ शख्सियत के कई और भी रंग शामिल हो गए थे।

इन रंगों में उनकी हाजिरजवाबी, लतीफागोई, पागल होने के दौरे, हुस्न परस्त होने के बावजूद किसी हमसफर के नहीं होने का अजाब, रात-दिन की शराबखोरी और आवारा मिजाजी का भी अमल दखल है। उनके लतीफे और खिलंदडेपन की बातें भी उनकी दौरों की तरह शायरों और महफिल के लोगों की जबान पर रहती थीं। एक बार जोश ने मजाक में कहा- मजाज, मैं हमेशा घड़ी देखकर पीना शुरू करता हूं और घड़ी देखकर ही खत्म कर देता हूं। मजाज ने जोश को जवाब दिया जनाब घड़ी अपने पास रखें। मैं तो घड़ा देखकर पीने का आदी हूं। जवाब के साथ उन्होंने रियाज खैराबादी का एक मशहूर शेर भी दोहराया- अच्छी पी ली, खराब पी ली, जैसी पाई शराब पी ली। यूं तो मजाज की छोटी सी दास्तान जिन्दगी में कई कच्चे-पक्के इश्क मिलते हैं, लेकिन साहिर की तरह कोई इश्क महबूबा से पत्नी नहीं बन पाया।

मजाज ने छोटे से जीवन में सिर्फ 25 साल शायरी की। जितनी मुद्दत उन्होंने शायरी की इतनी उम्र में मिर्जा गालिब सब कुछ लिख चुके थे जिस पर आज तक उनकी शोहरत आसमान को छू रही है। मजाज ने इस आसमान को तो नहीं छुआ, मगर अपने युग के आदमी को अपनी नजरों में रखा जो सदियों से सामाजिक नाइंसाफियों और शोषण का शिकार रहा है। उनकी शायरी का केंद्रीय विषय तो वही है जो उनके दूसरे प्रगतिशील साथियों का था। लेकिन मजाज ने चीख पुकार से खराब नहीं किया। एक गायक की तरह गाया है और दर्द से दर्शाया है इसका नमूना है, उनकी नज्म- इन महल की आड़ में निकला वो पीला माहताब। मजाज का शेर है जो उन्होंने गांधीजी की मौत पर कहा था-हिंदू चला गया न मुसलमां चला गया, इन्सान की तलाश में इंसा चला गया। अफसोस की बात है दूसरों में इंसान देखने वाला खुद अपने अंदर छुपे इंसान को तलाश नहीं कर पाया और यही मजाज का गम है।

निदा फाजली
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